ब्लॉग: इज़्ज़त बचाने के नाम पर हक़ छीनने की साज़िश

  • 20 दिसंबर 2017
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स्त्रियों का शरीर युद्ध का ऐसा मैदान नहीं है जहाँ उनकी ही 'रक्षा' के नाम पर शंभूलाल जैसे लोग अपने 'धर्मयुद्ध' लड़ें और बेगुनाह मासूम लोगों का खून बहाएँ.

मुज़फ्फरनगर दंगों से लेकर हादिया मामले, सैफ-करीना की शादी और 'पद्मावती' फ़िल्म से जुड़े विवाद तक में 'स्त्रियों की प्रतिष्ठा' बचाने के नाम पर ही ख़ूनी नफ़रत फैलाई गई. शंभूलाल रेगर ने भी 'लव जिहाद' के ही नाम पर ही पश्चिम बंगाल से आए 48 वर्षीय प्रवासी मजदूर मोहम्मद अफ़राज़ुल को मार डाला.

स्त्रियों को धार्मिक, जातीय और सांस्कृतिक प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर उनकी 'रक्षा' करने के नाम पर पुरुषों के युद्ध लड़ने और हिंसा करने की यह परंपरा नई नहीं है. पहले किसी वस्तु की तरह स्त्रियों को दाँव पर लगाना, फिर उनके नाम पर युद्ध करने और विजयी होने पर उन्हें 'ट्रॉफ़ी' के तौर पर हासिल करने की मिसालों से इतिहास पटा पड़ा है.

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चीरहरण का प्रतिशोध

पुरातन ग्रंथों को उठाकर देखें तो 'स्त्री रक्षा' के नाम पर प्रचारित पितृसत्ता का पाखंड साफ़ दिखता है. जो पांडव द्रौपदी के चीरहरण का प्रतिशोध लेने के लिए महाभारत जैसा महायुद्ध लड़ते हैं, जिन्हें धर्मराज कहा जाता है उस युधिष्ठिर ने द्रौपदी को जुए में हारकर उसे चीरहरण तक पहुँचाया था.

'पद्मावती' फिल्म का विरोध कर रहे करनी सेना के कार्यकर्ता न सिर्फ रानी पद्मावती और खिलजी के एक काल्पनिक स्वप्न दृश्य को लेकर नाराज़ हैं बल्कि फिल्म में रानी पद्मावती के एक गाने और नाचने के भी खिलाफ हैं.

पद्मावती खुद संगीत और नृत्य की शौक़ीन थी या नहीं, इस पर इतिहासकारों की अलग-अलग राय हो सकती है पर करनी सेना ने अपना फ़तवा जारी करते हुए घोषणा कर दी की नृत्य 'राजपूत' महिलाओं की प्रतिष्ठा के खिलाफ है.

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'लव जिहाद'

मुज़फ़्फरनगर में हुए 2013 के दंगों की वजह ढूंढने पर यही पता चला था कि दंगे के पीछे भी अपने समुदाय की महिला के साथ हुई छेड़छाड़ का बदला लेने की मंशा थी.

अफ़राज़ुल की हत्या के बाद अपनी 'हिंदू बहनों' के लिए जारी किया गया शंभूलाल का संदेश इस कड़ी का नया अध्याय है. इस संदेश में शंभूलाल ने हिंदू बहनों को 'लव जिहाद' करने वालों से सावधान रहने को कहा है.

'लव जिहाद' के ख़िलाफ़ झंडा उठाकर देश भर में ज़हर फैला रहे ये स्वघोषित वीर दरअसल स्त्रियों के नाम पर निर्णय लेकर उनके ही अस्तित्व को नकार रहे हैं.

भारतीय संविधान के तहत हर बालिग़ भारतीय स्त्री अपने निर्णय स्वयं ले सकती है. उसे किसी हिंदू के साथ रहना है या मुसलमान के साथ या फिर अकेले, इसका फ़ैसला करना उसका हक़ है.

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पुलिस और प्रशासन

स्त्री गाना चाहती है, नाचना चाहती है या चुपचाप खाली बैठना चाहती है, इस बात का फ़ैसला क्या उनकी जाति की सेनाएँ करेंगी?

भारत में स्त्रियों की संवैधानिक स्वतंत्रता पर हावी जातीय-सांप्रदायिक सनक एक अहम मुद्दा है. किसी भी अन्य नागरिक की तरह मुसीबत में फंसने पर स्त्रियों की मदद के लिए पुलिस और प्रशासन का एक पूरा अमला मौजूद है.

असंतुष्ट होने पर वह सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर सकती हैं और अदालतों का दरवाज़ा भी खटखटा सकती हैं इसलिए स्त्रियों की 'रक्षा करने' के नाम पर साम्प्रदायिक ज़हर फैलाते हुए उनकी स्वतंत्र निर्णय क्षमता को ख़ारिज करने की साज़िश को समझा जाना चाहिए.

स्त्रियों की सामाजिक-शारीरिक गति को नियंत्रित करने के इन प्रयासों के पीछे से झांकती पितृसत्ता का चेहरा साफ़ नज़र आता है जिसे नई पीढ़ी की पढ़ी-लिखी लड़कियों से उस तरह की चुनौती मिलती नहीं दिख रही है जिसकी उम्मीद एक सभ्य और आधुनिक समाज से की जाती है.

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