ये क़ानून लागू हुआ तो सस्ते में होगा इलाज!

  • 22 दिसंबर 2017
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हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज ने कहा है कि राज्य सरकार जल्द ही केंद्र के क्लीनिकल एस्टेबलिशमेंट क़ानून को लागू करेगी.

इस क़ानून का पहला मक़सद हर मेडिकल संस्थान का डिजिटल रजिस्टर बनाना है और यह इलाज में होने वाले खर्च की सीमा तय करने की बात भी करता है.

हरियाणा से पहले 10 राज्य और छह केंद्रशासित प्रदेश इस क़ानून को अपना चुके हैं, हालांकि उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तराखंड ने अभी तक इसे लागू नहीं किया है.

हमने स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय में 'क्लीनिकल एस्टेबलिशमेंट' की देखरेख करने वाली नेशनल काउंसिल के एडीडीजी डॉक्टर अनिल कुमार से पूछा कि क़ानून अपनाने और लागू करने में क्या फ़र्क है?

''इसका मतलब यह है कि राज्य सरकार इस क़ानून को मान तो चुकी है लेकिन ज़िला स्तर पर इसे लागू कराने के लिए ज़िम्मेदार रजिस्टरिंग अथॉरिटी और काउंसिल को या तो सरकारी गज़ेट के ज़रिए सूचित नहीं किया गया है और या फिर किसी विरोध के चलते मामला अदालत में लटका हुआ है.''

इसका सीधा सा मतलब यह है कि ज़मीनी स्तर पर इन राज्यों के मरीज़ों को इस क़ानून का कोई फ़ायदा नहीं मिल पा रहा.

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क़ानून के फायदे?

डॉक्टर कुमार के मुताबिक़ ''2010 में कुछ राज्यों की मांग पर बनाए गए इस क़ानून का पहला मक़सद हर ज़िले-शहर-कस्बे में चल रही हर तरह की मेडिकल संस्था का डिजिटल रजिस्टर बनाना है.''

इसमें अस्पताल, मैटरनिटी होम, नर्सिंग होम, डिस्पेंसरी, क्लीनिक, सेनेटोरियम, चिकित्सा केंद्र, आयुष दवाखाना, पैथोलॉजी लैब समेत ऐसी हर संस्था शामिल है जो बीमारी, चोट, शारीरिक विकार, असामान्यता, और गर्भावस्था के लिए जांच, इलाज और देखभाल की सुविधा मुहैया कराती हो.

इससे पहले बनाए गए क़ानूनों में इनमें से कई संस्थाएं छूट जाती हैं.

''इस क़ानून के ज़रिए सरकार पूरे देश में एक जैसी स्वास्थ्य सेवाएं और सुविधाएं मुहैया कराना चाहती है. साथ ही एक बार ये जानकारी मिल जाए तो सरकार के लिए कोई देशव्यापी योजना लागू करवाना बहुत आसान हो जाएगा क्योंकि सरकारी स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं. निजी क्षेत्र को शामिल करना ज़रूरी है.''

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यह रजिस्ट्रेशन ऑनलाइन हो सकता है

इसमें सिर्फ़ लाइसेंस रखने वाले मान्यता प्राप्त डॉक्टर और संस्थाएं ही रजिस्टर कर सकते हैं. यानी एक बार ये हर जगह लागू हो जाए तो नीम-हकीमों की छुट्टी.

बहुत से राज्यों ने अभी तक इस क़ानून को लागू नहीं किया है. जिसकी एक वजह मेडिकल एसोसिएशन का विरोध भी है.

आईएमए समेत बाक़ी एसोसिएशन इस क़ानून पर सवाल उठाते रहे हैं क्योंकि यह इलाज में होने वाले खर्च की सीमा तय करने की बात भी करता है.

डॉक्टर कुमार बताते हैं कि ''क़ानून के मुताबिक़ केंद्र सरकार, राज्य के साथ मिलकर बीमारियों और कार्यकलापों के खर्च की एक सीमा बना सकती है जिसे मानना उस राज्य के सभी अस्पतालोँ और डॉक्टरों के लिए ज़रूरी होगा.''

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ज़ाहिर है अस्पतालों को इस पर एतराज़ है

आईएमए (इंडियन मेडिकल एसोसिएशन) के अध्यक्ष डॉक्टर के के अग्रवाल को लगता है कि क़ानून का मक़सद धोखेबाज़ डॉक्टरों और अस्पतालों पर लगाम लगाना होना चाहिए. खर्च तो अस्पताल ख़ुद ही तय कर लेंगे.

उन्होंने कहा कि ''हम ख़ुद ही ऐसी कोशिश कर रहे हैं कि लोगों के लिए इलाज का ख़र्च वहन करने लायक हो जाए और दवाइयां सस्ती मिलें. हम दवाइयों को 20 फ़ीसदी तक सस्ता करने की कोशिश कर रहे हैं. साथ ही हम लोगों को जागरूक बनाने के लिए भी काफ़ी काम कर रहे हैं.''

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लेकिन सरकार अपने इरादे पर क़ायम है

नेशनल काउंसिल ने 3000 मेडिकल कार्यकलापों की एक सूची तैयार की है जिसे राज्यों के पास भेज दिया गया है. राज्यों से सलाह मांगी गई है कि उनके लिए कितना खर्च जायज़ है.

डॉक्टर कुमार के मुताबिक़ ''वे अभी तक राज्यों के जवाब का इंतज़ार कर रहे हैं.''

केंद्र सरकार क़ानून बना सकती है लेकिन राज्यों को उसे मानने के लिए मजबूर नहीं कर सकती क्योंकि स्वास्थ्य राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है.

राज्यों को पूरा हक़ है कि वे इस क़ानून को जैसे का तैसा लागू कर दें या फिर इसमें अपने हिसाब से सुधार करके लागू करें. मानने की मजबूरी नहीं है तो राज्य इसकी अनदेखी भी कर सकते हैं जैसा कि हो भी रहा है.

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इस क़ानून से फ़िलहाल और कोई फ़ायदा नहीं मिलता.

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कोई ग़ैर ज़रूरी टेस्ट नहीं करा सकता

डॉक्टर कुमार बताते हैं कि ''हमने 227 बीमारियों के लिए स्टैंडर्ड ट्रीटमेंट गाइडलाइंस बनाई हैं जिन्हें मानना उन राज्यों के लिए ज़रूरी है जो इसे लागू कर चुके हैं. इन दिशानिर्देशों के बाद कोई भी डॉक्टर या अस्पताल उन निर्देशों से हटकर फ़ालतू के टेस्ट नहीं करा सकता. इससे भी पैसे की बचत होती है.''

वह आगे कहते हैं, ''दूसरे, क़ानून मानने वाले क्लीनिक और अस्पतालों के लिए साफ़ तौर पर शुल्क की घोषणा करना ज़रूरी है. इससे फ़ायदा ये होता है कि अगर एक अस्पताल किसी इलाज के लिए एक लाख का खर्च दिखा रहा है लेकिन दूसरा पच्चीस हज़ार में ही करने के लिए तैयार है तो मरीज़ों को पता लग जाता है कि कौन ग़लत पैसे ले रहा है.''

इसके अलावा क़ानून इमरजेंसी में दिए जाने वाले प्राथमिक उपचार को लेकर भी काफ़ी सख़्त है.

पैसे न हों, तब भी इलाज

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डॉक्टर कुमार के मुताबिक़, ''अगर कोई इमरजेंसी की हालत में किसी अस्पताल या क्लीनिक पहुंचता है तो प्राथमिक मदद मुहैया करवाना उस अस्पताल, क्लीनिक वगैरह के लिए ज़रूरी है. भले ही मरीज़ के पास पैसे न हों. कोई इलाज करने से मना नहीं कर सकता.''

उनके मुताबिक, ''इलाज भी तब तक दिया जाना ज़रूरी है जब तक मरीज़ की हालत स्थिर न हो जाए. इसके बाद ही वहां का स्टाफ़ मरीज़ को आगे रेफ़र कर सकता है. अगर कोई अस्पताल ऐसा करने से मना करे तो मरीज़ ज़िला मजिस्ट्रेट के पास शिकायत दे सकता है. क़ानून मानने वाले राज्यों में इसे लागू करवाने की ज़िम्मेदारी डीएम पर ही होती है.''

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