उत्तर प्रदेश में क्या वाक़ई ज़रूरी है योगी का यूपीकोका?

  • 23 दिसंबर 2017
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Image caption उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य में संगठित अपराध को रोकने के मक़सद से लाए गए यूपीकोका विधेयक को विधानसभा में विपक्ष की ग़ैरमौजूदगी में ही पारित करा लिया, लेकिन विधान परिषद में उसे कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है.

विपक्ष जहां इस क़ानून में राजनीतिक द्वेष की आशंका देख रहा है वहीं जानकारों का कहना है कि यूपी में अपराध रोकने के लिए मौजूदा क़ानून ही पर्याप्त हैं, सिर्फ़ उन्हें ठीक से क्रियान्वित करने की ज़रूरत है.

विपक्ष का आरोप है कि सरकार इस क़ानून को राजनीतिक विरोधियों के दमन के मक़सद से ला रही है जबकि सरकार का तर्क है कि मौजूदा क़ानून उतने कठोर नहीं हैं या फिर वो इतने पर्याप्त नहीं हैं जो कि इस तरह के अपराध पर नियंत्रण लगा सकें.

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सज़ा-ए-मौत तक हो सकती है

सरकार का दावा है कि मौजूदा क़ानूनों के तहत भी अपराधियों पर कार्रवाई हुई है, यूपीकोका को क़ानून बनाकर इसका और विस्तार किया जाएगा. विधानसभा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि अपराधी सरकार की कार्रवाई से इस क़दर डरे हुए हैं कि वो अपनी ज़मानत नहीं करा रहे हैं या फिर दूसरे राज्यों की जेलों में जाने की कोशिश कर रहे हैं.

दरअसल, यूपी में बीजेपी के नेतृत्व में जब से सरकार बनी है, क़ानून व्यवस्था के मुद्दे पर उसे सदन के भीतर और बाहर आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा है. लेकिन सरकार अपनी पीठ थपथपाने के लिए सैकड़ों मुठभेड़ और उनमें मारे गए दर्जनों कथित अपराधियों का आंकड़ा पेश करती है.

सरकार ने छह महीने पूरे करने पर बताया था कि इस दौरान राज्य में 420 मुठभेड़ हो चुकी हैं जिनमें 15 अपराधी मारे जा चुके थे और ये भी कि सिलसिला बदस्तूर जारी है.

मुठभेड़ और उनमें मारे गए लोगों की बड़ी संख्या के चलते राज्य सरकार को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का नोटिस भी मिल चुका है.

यूपीकोका विधेयक में संगठित अपराध को विस्तार से परिभाषित किया गया है जिसमें अपहरण, जबरन ठेके हथियाना, ज़मीन पर कब्ज़ा करना, अवैध वसूली से लेकर मादक पदार्थों और मानव तस्करी तक को रखा गया है.

इन सब अपराधों के लिए कड़ी सज़ा और जुर्माने का प्रावधान है. सज़ा की अधिकतम सीमा मृत्युदंड तक निर्धारित है.

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राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के ख़िलाफ़?

इलाहाबाद हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील ज़फ़रयाब जिलानी कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में न तो अपराध संगठित हैं और न ही अपराधों को रोकने के लिए क़ानून की कोई कमी है.

वो कहते हैं, "सरकार सीधे तौर पर तो कह नहीं सकती कि ये क़ानून मुसलमानों के ख़िलाफ़, दलितों के ख़िलाफ़ या फिर उन लोगों के लिए है जो उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं. हमारे सामने टाडा का उदाहरण है जिसमें पुलिस ही व्यक्ति को अपराधी ठहरा देती थी और लोग उस अपराध में 15-15 साल तक जेलों में रहे जो उन्होंने किया ही नहीं था."

जिलानी के मुताबिक़ यूपी में महाराष्ट्र या फिर किसी अन्य राज्य की तरह अपराध संगठित तरीक़े से नहीं होते हैं और न ही उनका कोई बहुत अंतरराष्ट्रीय या दूसरे राज्यों के गिरोहों से संबंध है.

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'मौजूदा क़ानून नाकाफी नहीं, लेकिन कमियां हैं'

लेकिन उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक रह चुके प्रकाश सिंह कहते हैं कि संगठित अपराध किसी राज्य की सीमा में नहीं बँधे हैं और इस तरह के अपराधों से निपटने के लिए ख़ुद केंद्र सरकार को क़ानून बनाने की ज़रूरत है.

प्रकाश सिंह कहते हैं, "जब अपराधी तेज़ गति से चल रहा है तो क़ानून को भी अपना दायरा बढ़ाना होगा. मौजूदा क़ानून कम नहीं हैं लेकिन कुछ-न-कुछ उनकी कमज़ोरियां ज़रूर हैं जिनकी वजह से अपराधियों के ख़िलाफ़ इतनी कठोर कार्रवाई नहीं हो पाती और अपराधी इसी का फ़ायदा उठाते हैं."

यूपीकोका विधेयक में संगठित अपराध के चलते किसी की मौत होने की स्थिति में मृत्युदंड या आजीवन कारावास की व्यवस्था है. साथ ही न्यूनतम 25 लाख रुपये के अर्थ दंड का प्रावधान है.

विधेयक में संगठित अपराध के मामलों के तेजी से निस्तारण के लिए विशेष अदालत के गठन का भी प्रावधान है.

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'ऐसे कठोर क़ानून की क्या ज़रूरत?'

विधेयक के मुताबिक प्राधिकरण के अध्यक्ष गृह विभाग के प्रमुख सचिव होंगे. इसके अलावा तीन अन्य सदस्य अपर पुलिस महानिदेशक (कानून व्यवस्था), अपर पुलिस महानिदेशक (अपराध) और विधि विभाग के विशेष सचिव स्तर के अधिकारी शामिल होंगे, जो सरकार की ओर से मनोनीत होंगे.

लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार सुभाष मिश्र कहते हैं कि इतने आनन-फ़ानन में ऐसे विधेयक की कोई ज़रूरत नहीं थी.

उनके मुताबिक, "दरअसल, सरकार क़ानून-व्यवस्था पर काफी घिरी हुई है. मुख्यमंत्री अपराधियों को रोज़ धमकी भले ही देते हों, अपराध कहीं से कम नहीं हो रहे हैं. और ये जो अपराध हो रहे हैं, उनके लिए यूपीकोका की नहीं बल्कि आईपीसी और सीआरपीसी ही पर्याप्त हैं."

सुभाष मिश्र कहते हैं कि संगठित अपराध के तौर पर देखा जाए तो यूपी में नक्सल समस्या इतनी विकट नहीं है, डकैतों का भी लगभग ख़ात्मा हो चुका है, पूर्वांचल की कथित माफ़ियागिरी शांत पड़ चुकी है, अपराधी क़िस्म के लोग या तो जेलों में हैं या फिर सदन में. फिर ऐसे कठोर क़ानून की क्या ज़रूरत?

बहरहाल, राज्य सरकार ने दो तिहाई बहुमत के चलते विधानसभा में तो इस विधेयक को पारित करा लिया है लेकिन विधान परिषद में उसे विपक्ष के कड़े विरोध के चलते फ़िलहाल प्रवर समिति के पास भेजना पड़ा है.

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