गुजरात कैबिनेट: क्या रूठे तबकों को मना पाएगी भाजपा?

  • 26 दिसंबर 2017
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गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान कहा जा रहा था कि सत्ताधारी बीजेपी से पाटीदार समेत कई तबके नाराज़ हैं. हालांकि बीजेपी को यहां जीत मिली. इस जीत के बाद लोगों की नज़र बनी हुई थी कि इस बार की सरकार में कितने नए चेहरे शामिल होते हैं और रूठे तबकों को मनाने की कितनी कोशिश होती है.

मंगलवार को विजय रूपाणी के नेतृत्व में नई सरकार ने शपथ ले ली. रूपाणी कैबिनेट में 20 मंत्रियों को शपथ दिलाई गई है. नियमों के हिसाब से सात और मंत्री बनाए जा सकते हैं.

गुजरात की राजनीति को क़रीब से देखने वाले वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत दयाल को लगता है कि इस कैबिनेट में 10 फ़ीसदी चेहरे योग्यता पर और बाक़ी 90 फ़ीसदी जाति के आधार पर आए हैं. उनका कहना है कि बहुत कमज़ोर मंत्रिमंडल बनाया गया है.

प्रदेश के एक और वरिष्ठ पत्रकार अजय उमट जातीय समीकरण से इनकार नहीं करते, लेकिन यह भी जोड़ते हैं कि कैबिनेट को संतुलित रखने की कोशिश की गई है.

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सभी समुदायों को जगह देने की कोशिश

इस बार के चुनाव में पाटीदारों की नाराज़गी से बीजेपी को नुक़सान होने की बात कही जा रही है. कैबिनेट में छह पाटीदारों को जगह दी गई है.

अजय उमट के मुताबिक़, छह ओबीसी, तीन क्षत्रिय, दो दलित और तीन आदिवासी तबके के मंत्रियों को शपथ दिलाई गई.

एनडीटीवी इंडिया में राजनीतिक संपादक अखिलेश शर्मा के मुताबिक़ जिस तरह जाति के मुद्दे पर यह चुनाव लड़ा गया है, बीजेपी के लिए यह ज़रूरी था कि वह जातीय समीकरण को ध्यान में रखकर कैबिनेट चुने.

उन्होंने कहा कि पार्टी ने क्षेत्रीय समीकरण को भी ध्यान में रखा है. कहा जा रहा है कि पटेलों को ज़्यादा सीटें दी गईं, लेकिन यह भी ग़ौर करने वाली बात है कि बीजेपी के पास सबसे ज़्यादा विधायक भी तो पटेल समुदाय से ही चुनकर आए हैं. इसके अलावा हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि पिछले रूपाणी मंत्रिमंडल में भी जातीय संतुलन का ध्यान रखा गया था.

पिछले रूपाणी मंत्रिमंडल में भी पाटीदारों को दूसरा सबसे बड़ा प्रतिनिधित्व दिया गया था. रूपाणी ने सौरभ पटेल को हटा दिया था लेकिन सौराष्ट्र को तब भी कई मंत्री मिले थे. पुरुषोत्तम सोलंकी के रूप में कोली समुदाय के भी एक नेता भी पिछले मंत्रिमंडल में मौजूद थे.

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किस आधार पर मंत्रियों का चुनाव?

मंत्रिमंडल में शामिल नाम भी बहुत सोच-समझकर चुने गए.

सौरभ भाई पटेल को वापस लाया गया है. माना जा रहा है कि उन्हें लाने के पीछे बीजेपी की रणनीति व्यापारियों की नाराज़गी दूर करने की है क्योंकि वह व्यापारियों और शहरी समुदाय में काफ़ी लोकप्रिय हैं.

सौराष्ट्र जहां पाटीदारों की नाराज़गी के चलते बीजेपी को 14 सीटें गंवानी पड़ीं, वहां से तीन कद्दावर नेताओं को लाया गया है जिनमें से एक लेउवा और दूसरे कड़वा पटेल हैं.

सौरभ पटेल के अलावा दूसरा बड़ा नाम आर सी फ़लदू का है जिन्हें नरेंद्र मोदी और अमित शाह का क़रीबी माना जाता है. वो लेउवा पटेल हैं.

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पूरे मंत्रिमंडल में सिर्फ़ एक महिला

सौराष्ट्र से आने वाली विभावरी दवे मंत्रिमंडल में शामिल अकेली महिला हैं. वो राज्य के पार्टी अध्यक्ष जीतू वाघाणी के क्षेत्र भावनगर से आती हैं.

मछुआरों की नाराज़गी दूर करने के लिए पुरुषोत्तम सोलंकी हैं जो कोली समुदाय के सबसे बड़े नेता हैं.

इसके अलावा तीन आदिवासी नेताओं को जगह दी गई है जिसमें गणपत वसावा भी शामिल हैं जो पहले भी कैबिनेट मंत्री रहे हैं.

वरच्छा के किशोर कनानी पाटीदार आंदोलन के गढ़ से आते हैं.

बीजेपी को कई समुदायों की नाराज़गी का अंदाज़ा है, इसी का नतीजा है कि कैबिनेट में दक्षिण गुजरात से पांच और सौराष्ट्र से पांच मंत्रियों को शामिल किया गया है. मध्य गुजरात को सिर्फ़ दो मंत्री पदों पर संतोष करना पड़ा है.

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ग्रामीण इलाक़ों की नुमाइंदगी कम क्यों?

इस कैबिनेट में 70 फ़ीसदी शहरी और 30 फ़ीसदी मंत्री ग्रामीण इलाक़ों से आते हैं.

प्रशांत दयाल बताते हैं, ''ग्रामीण इलाक़ों का प्रतिनधित्व कम है क्योंकि बीजेपी के पास ग्रामीण इलाक़ों से ज़्यादा विधायक ही नहीं हैं.''

इसी से जुड़े आंकड़े देते हुए अजय उमट बताते हैं, ''गुजरात के 33 ज़िलों में से सात ज़िलों में बीजेपी का एक भी प्रत्याशी नहीं जीता वहीं आठ ज़िलों से एक-एक प्रत्याशी विधानसभा पहुंचे हैं.''

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रूपाणी सरकार के लिए कई बड़ी चुनौतियां

हालांकि सबको ख़ुश करने की मंशा से बनाई गई इस कैबिनेट के लिए आगे का सफ़र आसान नहीं होगा.

प्रशांत दयाल के मुताबिक़ ''सबसे बड़ी चुनौती तो राज्य में पार्टी का नेतृत्व ही है. जिन दो लोगों को मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री बनाया गया है, उन्हीं के राज में गुजरात में जन आंदोलन खड़ा हुआ. तीनों युवा नेताओं के साथ इन दोनों नेताओं के संबंध अच्छे नहीं हैं. ऐसे में नाराज़ समुदायों के साथ संवाद करना इन नेताओं के लिए बड़ी चुनौती होगी.''

अखिलेश शर्मा बताते हैं, ''बीजेपी के सामने एक बड़ी चुनौती 2019 में सभी 26 लोकसभा सीटों को वापस हासिल करना भी है ऐसे में पार्टी पूरी कोशिश करेगी कि सभी वर्गों को साथ लेकर चले. लेकिन सिर्फ़ नुमाइंदगी देने से यह नहीं हो पाएगा, विजय रूपाणी को इन समुदायों के मुद्दों पर काम करने की ज़रूरत होगी.''

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'जल्द हो सकता है विस्तार'

एक और समस्या का ज़िक्र करते हुए प्रशांत दयाल कहते हैं कि स्कूलों के निजीकरण और बढ़ी फ़ीसों का मामला रूपाणी सरकार के लिए बड़ा सवाल बनने वाला है. प्रशांत का मानना है कि अब तक शिक्षा मंत्री रहे भूपेंद्र सिंह चुडासमा बड़े नेता हैं. इस समय उन्हें बदलना बीजेपी के लिए बड़ा जोखिम हो सकता है इसलिए संभावना है कि शिक्षा विभाग वापस चुडासमा के पास जाए.

ऐसे में वह जल्दी ही कैबिनेट के विस्तार की संभावना भी जताते हैं.

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अजय उमट के मुताबिक़, मार्च से मई के बीच में राज्यसभा का चुनाव आ रहा है क्योंकि अरुण जेटली, मनसुख भाई मांडविया और पुरुषोत्तम भाई रुपाला की सदस्यता पूरी हो रही है. एक बार राज्यसभा के उम्मीदवारों का फ़ैसला हो जाए तो कैबिनेट का विस्तार किया जा सकता है.

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