नज़रिया: सोनिया गांधी को इतिहास कैसे याद करेगा?

  • 27 दिसंबर 2017
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चुनाव हारने के बाद प्रधानमंत्री पद छोड़ते हुए मनमोहन सिंह ने कहा था कि मीडिया या विपक्ष के मुक़ाबले इतिहास उनका नरमी से मूल्यांकन करेगा.

लेकिन इतिहास सोनिया गांधी का कैसे मूल्यांकन करेगा?

सोनिया गांधी करीब 20 साल तक कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद पर रहीं जो उसके इतिहास में किसी अध्यक्ष का सबसे लंबा कार्यकाल था. उनकी उल्लेखनीय कहानी से दूर रहना मुश्किल है.

कैम्ब्रिज में राजीव गांधी से उन्हें प्रेम हुआ, एक हमले में सबसे पहले उन्होंने अपनी सास को खोया और फिर अपने पति को. इसके बाद भी वह कुछ समय राजनीति से दूर ही रहीं.

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Image caption मनमोहन सिंह को बनाया प्रधानमंत्री

विदेशी मूल का हल्ला

जब लगा कि कांग्रेस पार्टी का ढलान शुरू हो गया है तब परिवार के वफ़ादारों के दबाव में उन्होंने पार्टी अध्यक्ष का पद संभाला. इसके बाद उन्होंने पार्टी को केंद्र की सरकार में पहुंचाया और लगातार दो बार सफलतापूर्वक गठबंधन सरकार बनवाई.

यहां तक कि उन्होंने सत्ता छोड़कर मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया. विपक्ष ने बार-बार उन पर विदेशी मूल का कहकर हमला किया. इसके बावजूद यूरोप में पैदा हुईं और पली-बढ़ीं सोनिया गांधी को इतिहास भारतीय राजनीति पर एक बड़ी छाप छोड़ने के लिए याद किया जाएगा.

चतुर नेताओं की टीम के सहयोग से सोनिया गांधी ने दो गठबंधन सरकार बनाने में कामयाबी पाई. इसमें कोई शक नहीं कि यह एक बड़ी उपलब्धि थी क्योंकि कांग्रेस ने अब तक कुछ ख़ास गठबंधन नेता नहीं देखे थे.

मोदी के भारत को दिखाते हुए इतिहासकार सोनिया गांधी के युग को भी देखेंगे क्योंकि यह संभव ही नहीं होता अगर यूपीए-2 इतनी अलोकप्रिय न हुई होती. साथ ही सोनिया गांधी की अध्यक्षता में कांग्रेस ने जनता के बीच में ख़ुद को पुनर्जीवित नहीं किया. इसने सत्ता में ऐसा व्यवहार किया कि वही चुनावों में देश की इकलौती बड़ी पार्टी बनी रहेगी.

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अध्यक्षता में पार्टी ऊपर गई, फिर नीचे आई

जब सोनिया गांधी ने 1998 में कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभाला तब लोकसभा में पार्टी की 26 फ़ीसदी या कहें 141 सीटें थीं. 2009 में यह बढ़कर 206 (38%) हो गईं लेकिन जब उन्होंने पार्टी की कमान छोड़ी तब यह संख्या 46 है. यानी सदन में कांग्रेस की उपस्थिति मात्र 8 फ़ीसदी है.

सोनिया गांधी ने सीताराम केसरी से जब कार्यभार लिया था तब कांग्रेस की प्रदेश विधानसभाओं में 4,067 में से 1,136 सीटें उसके पास थीं लेकिन 2017 में 4,120 सीटों में से उसके पास केवल 785 हैं.

उनके पद संभालने के बाद 1998 में हुए आम चुनावों में पार्टी का वोट शेयर 26 फ़ीसदी था. तब से 2009 तक पार्टी का वोट शेयर 26 से 29 फ़ीसदी के बीच रहा. 2014 में पहली बार यह 20 फ़ीसदी से नीचे आ गया.

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ये आंकड़े बताते हैं कि सोनिया गांधी पार्टी का भाग्य बदलने में असमर्थ थीं और अध्यक्ष की प्रसिद्धि ऐतिहासिक रूप से कम हो रही थी.

गुजरात या उत्तर प्रदेश या फिर मध्य प्रदेश में सोनिया की अध्यक्षता में पार्टी पीछे गई. उसने कभी भी बीजेपी या क्षेत्रीय पार्टियों को कड़ी टक्कर नहीं दी.

लेकिन आप उनको इस बात का श्रेय दे सकते हैं कि उनको जिन राज्यों में सरकार मिली थी उसमें कांग्रेस गिरी नहीं. लेकिन यह सिर्फ़ 2014 तक ही था.

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प्रधानमंत्री की शक्ति कम कर दी

सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बना दिया लेकिन उनके मंत्रियो ने प्रधानमंत्री के राजनीतिक अधिकार को कम कर लगातार 10 जनपथ की दौड़ लगानी शुरू कर दी.

प्रधानमंत्री को अधिक शक्तिशाली बनाने की जगह उन्होंने राष्ट्रीय सलाहकार परिषद बनाकर उन्हें और कमज़ोर कर दिया.

यूपीए-2 आने तक यह अराजकता में बदल गया. मंत्री प्रधानमंत्री से अधिक ताकतवर हो गए और ख़ुद फ़ैसले लेने लगे. सोनिया गांधी के स्वास्थ्य में सुधार के बावजूद यूपीए-2 अस्त-व्यस्त हो गया और राहुल गांधी उस समय खड़े नहीं हो पाए.

आख़िरकार यूपीए-2 धड़ों में बंट गया और कांग्रेस पार्टी बिखरकर ज़मीन पर आ गई.

यूपीए-2 के साथ क्या हुआ यह सब जानते हैं लेकिन अविश्वसनीय रूप से सोनिया गांधी को छोड़कर हर किसी को इसके लिए दोष दिया गया. प्रधानमंत्री का बॉस होते हुए उन्होंने बिना ज़िम्मेदारी के ताकत का इस्तेमाल किया. प्रधानमंत्री ने झटका सहा जबकि वह बच गईं.

असल में सोनिया गांधी को मुश्किल से ही कभी दोषी ठहराया जाता है. मनमोहन सिंह का ना बोलने के लिए उपहास उड़ाया जाता है लेकिन सोनिया गांधी भी बहुत कम बोलती थीं और यह महसूस ही नहीं होता था कि उनकी भी एक सार्वजनिक पहचान है. जब ज़रूरत पड़ती थी वह तब चुनावी भाषण देती थीं लेकिन यूपीए-2 या पार्टी के ढलान के वक़्त उन्हें ख़ुद के बचाव की ज़रूरत महसूस नहीं हुई और न ही इसके लिए किसी ने उन्हें कहा.

सोनिया गांधी की यह राजनीतिक ज़िम्मेदारी थी कि वह अपनी पार्टी की सरकार के बचाव में आतीं. अगर उनकी बीमारी ने उन्हें रोका था तो उन्हें चाहिए था कि वह पार्टी की लगाम राहुल गांधी या किसी और को देतीं.

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पुराने सिपाहियों से राहुल खेमे की लड़ाई

राहुल गांधी की उपाध्यक्ष से अध्यक्ष पद पर पदोन्नति राहुल की तुलना में सोनिया गांधी को लेकर अधिक आश्चर्यचकित करता है. हम राहुल को बीते कुछ वर्षों से कांग्रेस पार्टी के चेहरे के तौर पर देख रहे हैं. अगर 2011 में सोनिया गांधी के अस्वस्थ होने के बाद से नहीं, तो कम से कम 2013 से, जब राहुल ने उपाध्यक्ष पद संभाला था.

मनमोहन सिंह ने सरकार की तरफ़ से सभी नुक़सानों को ख़ुद झेला जबकि उनका अपने मंत्रियों पर भी बस नहीं था. वहीं, राहुल गांधी ने भी ऐसी चीज़ों का सामना किया जबकि उनके पास पूरी शक्ति भी नहीं थी.

पिछले सालों की एक सबसे अहम राजनीतिक कहानी जो नहीं कही गई, वह यह थी कि सोनिया गांधी के पुराने सिपाहियों और राहुल गांधी कैंप के नौजवानों के बीच टकराव जारी था.

कांग्रेस के युवा नेता निजी तौर पर बताते हैं कि पार्टी के पुराने सिपाही उन्हें स्वतंत्रता और ज़िम्मेदारियां नहीं देते हैं. राहुल गांधी के पास बहुत से अच्छे या बुरे विचार थे जो उनकी मां के पुराने सिपाहियों की ओर से गिरा दिए गए और न ही उन्होंने पार्टी की विफ़लताओं को स्वीकार किया था.

सोनिया और राहुल दोनों अपनी तरह से पार्टी चलाने की कोशिश कर रहे हैं. फ़ैसले लेने की रफ़्तार दिन-ब-दिन घटती जा रही है. पार्टी न ही आगे बढ़ रही है और न ही पीछे जा रही है. इसका एक ख़ास उदाहरण इस साल हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव हैं, शायद यह आख़िरी प्रमुख अवसर था जब पुराने सिपाही राहुल गांधी की किसी योजना के रास्ते में आए थे.

पार्टी को पुनर्जीवित करने में असमर्थता, यूपीए-2 का दो फाड़ होना और पार्टी के नेतृत्व में देरी जैसे तीन कारणों से आज के मीडिया और विपक्ष के मुकाबले इतिहास सोनिया गांधी का अधिक गंभीरता से मूल्यांकन करेगा.

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