ग़ालिब के अनसुने और मज़ेदार क़िस्से

  • 27 दिसंबर 2017
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उर्दू के जाविदां शायर मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग ख़ान ग़ालिब ने आज ही दुनिया को अलविदा कहा था. उर्फ़-ए-आम में जो मिर्ज़ा ग़ालिब या चचा ग़ालिब के नाम से मशहूर हैं.

ग़ालिब के बारे में प्रोफ़ेसर मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद कहा करते थे कि शायरी अलग रही, ग़ालिब को तख़ल्लुस के मामले में भी तमाम शायरों पर सबकत हासिल है. 'ग़ालिब' ये तख़ल्लुस मिर्ज़ा की शायरों को सचमुच ज़ेब देता है, उसके मिज़ाज की तर्जुमानी करता है.

विडम्बना है कि ग़ालिब की पैदाइश उनके ननिहाल आगरा में एक दौलतमंद ख़ानदान में हुई, उनकी शादी दिल्ली के और ज़्यादा दौलतमंद ख़ानदान की लड़की से हुई मगर होशमंद होने के बाद फिक्र-ए-माश का साया ग़ालिब पर बराबर बना रहा. जिन्दगी मुश्क़िल से मुश्क़िलतर होती रही मगर ग़ालिब ने उम्मीद और काविश का दामन न छोड़ा.

अंदर और बाहर की जद्दोजहद के बीच ग़ालिब की शायरी और लतीफ़े दोनो सैर-ए-जहां करते रहे.

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मरते दम तक हाज़िर-जवाब

मजाज़ की तरह ग़ालिब की हाज़िर-जवाबी और बज़लासंजी भी मुश्क़िल से मुश्क़िल वक़्त में, यहां तक कि बिस्तर-ए-मर्ग़ पर भी क़ायम रही.

आख़िरी दिनों में जब तबीयत बहुत बिगड़ती तो अपनी मौत की आरज़ू में मरने की मुकर्रर करते थे. उन दिनों शायरों में ये आम चलन था.

एक बार ऐसा ही कर रहे थे तो किसी ने कहा कि इंशा-अल्लाह ये तारीख़ भी ग़लत साबित होगी.

इस पर ग़ालिब ने अपने मख़सूस अंदाज़ में कहा- ''देखो औल-फौल न बको. ये तारीख़ ग़लत हुई तो मैं सर फोड़ कर मर जाऊंगा.''

आख़िरी वक़्त में दिल्ली में ज़बरदस्त महामारी फैली. उनके चहेते शागिर्द मजरूह ने अपने एक ख़त में इसकी बड़ी मार्मिक तफ़्सील लिखी तो ग़ालिब ने तंज़ भरे लहजे में जवाब लिखा- ''भई कैसी वबा? जब सत्तर बरस के बुड्ढे-बुढ़िया को न मार सकी.''

आख़िरी दिनों में ग़ालिब के जिस्म में शदीद दर्द रहता था और वो बिस्तर पर लेटे रहते थे. उठने की सकत नहीं थी. एक दिन दर्द से कराह रहे थे. मजरूह आए और देखा तो उनके पैर दबाने लगे.

ग़ालिब ने उन्हें ऐसा करने से मना किया तो मजरूह बोले, 'आपको बुरा लग रहा है तो आप मुझे पैर दबाने की मज़दूरी दे दीजिएगा.' इस पर ग़ालिब ने कहा, 'ठीक है.'

पैर दबाने के बाद जब मजरूह ने अपनी मज़दूरी मांगी तो ग़ालिब दर्द के बावजूद हंसते हुए बोले- ''कैसी उजरत भाई. तुमने मेरे पांव दाबे, मैने तुम्हारे पैसे दाबे. हिसाब बराबर.''

'ग़ालिब का अंदाज़-ए-बयां और...'

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दिल-आज़ारी से गुरेज़

ग़ालिब किसी का दिल तोड़ने में यक़ीन नहीं रखते थे.

तज़्किरा-ए-ग़ौसिया में एक वाक़या मिर्ज़ा ग़ालिब और मिर्ज़ा रजब अली बेग सुरूर की मुलाक़ात का रकम है. इससे पता चलता है कि ग़ालिब इंसानी सतह पर कितने बुलंद थे.

वाक़या कुछ यूं है कि सुरूर ग़ालिब से मिलने आए. तआरूफ़ ठीक से नहीं हो पाया था इसलिए ग़ालिब जान नहीं पाए कि ये लखनऊ वाले सुरूर हैं.

उन दिनों सुरूर की किताब फ़साना-ए-अजायब की बड़ी धूम थी. दौरान-ए-गुफ़्तगू सुरूर ने ग़ालिब से पूछा- ''मिर्ज़ा साहब, उर्दू किस किताब की उम्दा है?'' ग़ालिब ने फ़ौरन कहा- ''चार दरवेश की.''

अब सुरूर ने पूछा- ''फ़साना-ए-अजायब की कैसी है?''

ग़ालिब ने बेसाख़्ता जवाब दिया- ''अजी लाहौल बिला कूवत, इसमें लुत्फ़-ए-ज़बान कहां, एक तुकबन्दी और भठियारख़ाना जमा है.''

बाद में जब ग़ालिब को पता चला कि सामने वाला ख़ुद मुसन्निफ़ फ़साना-ए-अजायब यानी रजब अली बेग सुरूर थे तो उन्होंने दिल से अफ़सोस किया और अज़ीज़ों को कोसा कि ज़ालिमों, पहले क्यों नहीं बताया.

अगले दिन अपने एक परिचित को लेकर सुरूर के पास मामला सुलझाने के लिए पहुंचे. वहां पहुंच कर सबसे पहले उन्होने निहायत ख़ुश-अख़लाक़ी से, सुरूर से दुआ-सलाम की और इसके बाद अपने साथ गए आदमी से फ़साना-ए-अजायब की तारीफ़ पर ताऱीफ़ करने लगे- 'जनाब मौलवी साहब, रात में मैंने फ़साना-ए-अजायब को बग़ौर देखा तो उसकी ख़ूबी-ए-इबारत और रंगीनी का क्या बयान करूं! निहायत ही फ़सीह-ओ-बलीग़ इबारत है. मेरे क़यास में तो न ऐसी उम्दा नस्र पहले हुई न आगे होगी, और क्योंकर हो? इसका मुसन्निफ़ अपना जवाब नहीं रखता.'

इस तरह की बातें बनाकर ग़ालिब ने न सिर्फ सुरूर की आबरू रखी बल्कि दूसरे दिन अपने घर पर उनकी दावत भी की. बक़ौल ग़ालिब दिल-आज़ारी से बड़ा कोई गुनाह नहीं.

ग़ालिब को समझना है, फ़ेसबुक पर बाबर से मिलें

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ग़ालिब की मौत की पहली ख़बर

ग़ालिब की मौत की ख़बर 17 फरवरी 1869 को सबसे पहले दिल्ली के उर्दू अख़बार अकमल-उल-अख़बार ने छापी थी.

इसी के बाद ग़ालिब की मौत की ख़बर अवामोन्नास में तेज़ी से फैलना शुरू हुई. जबकि हैरत की बात ये है कि ग़ालिब की मौत 15 फरवरी को दोपहर बाद हो चुकी थी.

अकमल-उल-अख़बार दिल्ली से 1866 में शुरू हुआ था और इसके संपादक मुंशी बिहारीलाल मुश्ताक़ थे. ये वही अख़बार था जिसमें आगे चलकर हकीम अजमल खां ने अपने सियासी ख़यालात का इज़हार पहले-पहल किया.

अकमल-उल-अख़बार ने ग़ालिब की मौत की ख़बर को ग़ालिब की वफ़ात शीर्षक से बड़ी अहमियत देकर छापा था.

ग़ालिब के लिए एहतराम और अक़ीदत इस ख़बर में साफ़ महसूस की जा सकती है. ख़बर की उर्दू इस तर्ज़ की है जैसे कोई अलिफ-लैलवी दास्तान बयान की जा रही हो.

ग़ालिब और फ़िराक़

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ग़ालिब की वफ़ात

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलय्ही राजि'ऊन

फ़ुग़ाँ अज़ ज़माना-ए-ग़द्दारे, आह अज़ रोज़गार-ए-नाहंजारे!

हर रोज़ नया रंग दिखाता है, हर दम दाम-ए-ग़म में फंसाता है. इस मुहीत-ए-आफ़त की मौज बला-ख़ेज़ है,

इस वादी-ए-हौलनाक की हवा फ़ितना-अंगेज़ है, इस का आब सराब, इस की राहत जुज़्व-ए-जराहत, इस की राफ़त सर्माया-ए-सदाक़त,

इस की शकर ज़हर-आलूद, इस की उम्मीद आरज़ू-ए-फ़र्सूदा. हर रोज़ मह्ल-ए-हयात को सरसर-ए-ममात से गिराता है,

हर दम महफ़िल-ए-सुरूर से सदा-ए-मातम उठाता है. फूल इधर खिला, उधर गिर पड़ा. लाला लिबास-ए-रंगीन में यही दाग़ दिल पर रखता है.

ग़ुंचा ख़ून-ए-जिगर से परवरिश पाता है. बुलबुल नौहा-गर-ए-चमन है और मुर्ग़-ए-सहर-ख़ाँ असीर-ए-महन!

क्या अजब गर आसमाँ दर-पए-आज़ार है. भला इस से क्या तवक़्क़ो'-ए-आसूदगी जिस का ख़ुद गर्दिश पर मदार है.

देखो बैठे-बिठाए क्या आफ़त उठाई है, किस मुंतख़िब-ए-रोज़गार की जुदाई दिखाई है. नख़्ल-ए-बरोमंद से म'आनी को बाद-ए-ख़िज़ाँ से गिराया, मेह्र-ए-सिपेह्र-ए-सुख़न-दानी को ख़ाक में मिलाया,

जो ख़ुसरो के बाद मुल्क-ए-सुख़न का ख़ुसरो-ए-मालिक-रिक़ाब था, उस का नामा-ए-उम्र तै हुआ. जो मैदान-ए-सुख़न-वरी का शहसवार था, उस का रख़्श-ए-ज़िंदगी पै हुआ.

उन हज़रत की किन किन ख़ूबियों का ज़िक्र किया जाए. दरया कूज़े में क्यूँकर समाए. हुस्न-ए-ख़ुल्क़ में अख़्लाक़ की किताब. 'अमीम-उल-अश्फ़ाक़ी में लाजवाब.

ख़ूबी-ए-तहरीर में बेनज़ीर. साफ़ी ज़मीर, जादू तक़रीर. फ़ारसी ज़बान में लासानी, उर्दू-ए-मुअल्ला के बानी.

अफ़सोस जिस का शहबाज़-ए-ख़याल ताइर-ए-सिद्रा-शिकार हो, वो पंजा-ए-गुर्ग-ए-अजल में गिरिफ़्तार हो.

इस ग़म से सब की हालत तबाह है. रोज़ यही इस मुसीबत में सियाह है. अब तौज़ीह-ए-इज्माल ओ तफ़्सील-ए-मक़ाल है. वाज़ेह हो के जनाब-ए-मरहूम दो तीन महीने से साहिब-फ़िराश रहे. ज़ो'फ़ ओ नक़ाहत के सदमे सहे.

आठ दिन इंतिक़ाल से पहले खाना पीना तर्क फ़रमाया. इस दुनिया-ए-फ़ानी से बिलकुल दिल उठाया. ता आँके 15 फ़रवरी 1869 रोज़-ए-दोशंबा दोपहर ढले इस ख़ुर्शीद-ए-औज-ए-फ़ज़्ल-ओ-कमाल का ज़वाल हुआ.

(लेखक क़िस्सागो और स्वतंत्र पत्रकार हैं, जिन्होंने लखनऊ के ऐतिहासिक नवल किशोर प्रेस पर शोधकार्य किया है)

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