यौन पीड़ितों के कपड़े जमा करती है ये महिला

  • 28 दिसंबर 2017
जम्प सूट इमेज कॉपीरइट ASIF SAUD
Image caption यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं के कपड़े दिखाती हुई जसमीन पाथेजा

पूरी दुनिया में यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं को कई सवालों का सामना करना पड़ता है और इन सवालों में सबसे पहला सवाल होता है, 'तुमने क्या कपड़े पहने थे?'

बैंगलुरू निवासी एक कलाकार और कार्यकर्ता जसमीन पाथेजा यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं के कपड़े जमा करती हैं जिससे दुनिया के इस बेतुके सवाल का जवाब दिया जा सके.

पाथेजा के घर का एक कमरा किसी म्यूज़ियम में तब्दील हो चुका है.

कमरे में हर तरफ़ ऐसे कपड़े दिखेंगे जो आम महिलाएं रोज़मर्रा में पहनती हैं लेकिन इन कपड़ों की अपनी-अपनी कहानी हैं.

दफ़्तरों में यौन उत्पीड़न से कैसे लड़ें महिलाएं?

'11 साल की उम्र में मेरा यौन उत्पीड़न हुआ'

इमेज कॉपीरइट Asif Saud
Image caption पाथेजा के घर का एक कमरा यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं के कपड़ों का एक म्यूजियम बन गया है

हर कपड़ा कुछ कहता है

जसमीन के घर में रखा लाल और काले रंग का जम्पसूट उन्हें उस महिला ने दिया जो बीते साल बेंगलुरू में हुई सामूहिक छेड़छाड़ का शिकार हुई थी.

पाथेजा बताती हैं, ''उस महिला ने बताया कि वह नए साल का जश्न मना रही थी तभी अचानक वहां मौजूद भीड़ पगला सी गई और महिलाओं के साथ छेड़छाड़ करने लगी.''

इसके बाद पाथेजा एक क्रीम रंग के कुर्ते को उठाती हैं जिस पर लाल और काले रंग का प्रिंट है, यह कुर्ता जिस महिला ने दिया था उसके साथ कोयंबटूर में एक ट्रेन में दुर्व्यवहार किया गया था.

''उस महिला ने बताया कि उसे उत्पीड़न की रिपोर्ट दर्ज करवाने से भी रोका गया.''

अब पाथेजा जिस गुलाबी रंग की ड्रेस को उठाती हैं वह उन्हें मॉन्ट्रियल से आई एक महिला ने दी थी.

पाथेजा बताती हैं, ''उस महिला ने मुझसे कहा कि अगर मैंने यह ड्रेस नहीं ली तो वह इसे फेंक देंगी क्योंकि यह ड्रेस उन्हें उनकी कमज़ोरी का अहसास दिलाती है.''

इन कपड़ों में हुआ था इनके साथ यौन उत्पीड़न

इमेज कॉपीरइट Asif Saud

कपड़े या उम्र देखकर नहीं होता उत्पीड़न

एक सफेद ड्रेस, एक स्विम सूट, एक शैम्पेन रंग का गाउन, एक जोड़ी पैंट और एक स्कूल यूनिफॉर्म - ऐसे बहुत से कपड़े हैं जो दिखाते हैं कि हर उम्र की महिला यौन उत्पीड़न की शिकार होती है.

पाथेजा बताती हैं, ''यह कभी मायने नहीं रखता कि आपने क्या पहना है. इस तरह की हिंसा के लिए कोई बहाना नहीं चल सकता. कोई महिला नहीं चाहती कि उसके साथ ऐसा हो.''

इसी के चलते उन्होंने अपने अभियान का नाम 'आई नेवर आस्क फ़ॉर इट' रखा है.

यौन उत्पी़ड़न के ख़िलाफ़ पाथेजा की यह लड़ाई लगभग डेढ़ दशक से चली आ रही है, जब वे पढ़ाई करने कोलकाता से बेंगलुरू आई.

वे कहती हैं, ''ऐसा नहीं है कि कोलकाता में महिलाओं के साथ उत्पीड़न नहीं होता था, लेकिन बेंगलुरू में मैं नई थी. मैं महज़ 23 साल की थी और मेरा परिवार भी यहां मेरे साथ नहीं था जो मेरी सुरक्षा कर सके.''

जसमीन की आवाज़ में तक़लीफ़ झलकती है, ''यह वो वक़्त था जब सड़क पर होने वाले उत्पीड़न को महज़ छेड़छाड़ कहकर निपटा दिया जाता था, माना जाता था कि लड़के तो छेड़छाड़ करते ही हैं और लड़कियों को उसे सहना ही पड़ता है. इन घटनाओं को सामान्य बनाने की कोशिश की जा रही थी. लोग मानते ही नहीं थे कि कुछ ग़लत हो रहा है. समाज की मौन सहमति के चलते ऐसी घटनाएं लगातार हो रही थीं.''

आवाज़ उठाने वाली महिलाएं बनीं 'पर्सन ऑफ़ द ईयर'

छेड़ा ही तो है, बलात्कार तो नहीं किया...

इमेज कॉपीरइट Asif Saud
Image caption पाथेजा कहती हैं कि यौन उत्पीड़न का कोई बहाना या माफ़ी नहीं हो सकती

कहीं से तो शुरुआत करनी होगी

जसमीन ने फ़ैसला किया कि वे इस मौन को तोड़ने के लिए आवाज़ उठाएंगी जिससे समाज इसकी अनदेखी न कर सके.

''एक दिन मैंने सभी छात्राओं को एक कमरे में बुलाया और उनसे ऐसे शब्दों की सूची बनाने के लिए कहा. सिर्फ़ तीन मिनट में हमारे सामने बुरे अनुभवों की लंबी फेहरिस्त थी.''

ये नतीजे हैरान करने वाले नहीं थे, सार्वजनिक स्थानों पर सभी लड़कियां इस तरह का उत्पीड़न झेलती हैं, जिसमें भद्दी टिप्पणियों से लेकर जबरन छूना या नोच-खसोट शामिल है.

इस पर सवाल उठाइए तो बताया जाता है कि ग़लती महिलाओं की ही है - उसने ज़रूर भड़काऊ कपड़े पहने होंगे, उसके कपड़ों में से शरीर दिख रहा होगा, वह देर रात तक बाहर रही होगी, शराब पी रखी होगी या वो ख़ुद लोगों को ऐसे संकेत दे रही होगी.

आसान शब्दों में कहें तो वो चाहती होगी कि उसके साथ ऐसा हो.

'यौन उत्पीड़न की घटनाएं सामने लाने का सबसे सही समय'

इमेज कॉपीरइट Asif Saud
Image caption ब्लैंक नॉइस के तहत यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं ने अपने अनुभव साझा किए

डर के माहौल में बड़ी होती हैं महिलाएं

पाथेजा की नाराज़गी अब उनके शब्दों में सुनाई दे रही है, ''लड़कियों को हमेशा सतर्क रहने की हिदायत दी जाती है, हमें ऐसे डर के माहौल में पाला जाता है जहां हर कदम फूंक-फूंक कर रखना पड़े. हमें बताया जाता है कि हमारे साथ उत्पीड़न होने का मतलब है कि हम पूरी सतर्कता नहीं बरत रहे थे. कहे कोई कुछ भी लेकिन उसमें छिपा संदेश हमेशा यही होता है.''

इसी डर का 'सामना' करने के लिए जसमीन ने 2003 में 'ब्लैंक नॉइस' की शुरुआत की.

''हमारा मानना है कि दोषी ठहराने से शर्मिंदगी बढ़ती है, शर्मिंदगी से अपराध का अनुभव होता है, अपराध का अनुभव होने से हम और खामोश हो जाते हैं, और इस खामोशी से ही यौन उत्पीड़न को बढ़ावा मिलता है.''

यौन उत्पीड़न की सबसे बड़ी वजह खुले में शौच- - BBC News हिंदी

इमेज कॉपीरइट Asif Saud
Image caption लाल रंग का यह कुर्ता एक विधवा महिला ने दिया था, हिंदू धर्म में विधवा महिलाएं लाल रंग पहनने से बचती हैं, इस महिला को यह कुर्ता पहनने की वजह से परेशान किया गया था.

सड़क पर जाकर महिलाओं से जानकारी मांगी

'आई नेवर आस्क फ़ॉर इट' के हिस्से की तरह काम करने वाले 'ब्लैंक नॉइस' का मक़सद महिलाओं के अनुभव इकट्ठे करना है. क्योंकि किसी भी डर का सामना करने की दिशा में पहला कदम उसके बारे में बात करना है.

इसके लिए उन्होंने बेंगलुरू और अन्य शहरों में महिलाओं और लड़कियों से बात करनी शुरू की और उनसे कहा कि वे अपने अनुभव लिखकर दें.

जसमीन के मुताबिक़ ''जब एक इंसान अपना अनुभव लिखता है तो दूसरों को भी ऐसा करने के लिए बढ़ावा मिलता है.''

जल्दी ही उनका व्हाइट बोर्ड जानकारी से भर गया. महिलाओं के नाम, उम्र, उत्पीड़न की घटना, क्या हुआ, कहां हुआ, किस वक़्त हुआ, उन्होंने क्या पहना था, उन्होंने क्या किया और उन्हें क्या करना चाहिए था.

एक महिला ने लिखा कि उसे एक अधेड़ उम्र के शख़्स ने बस में परेशान किया तो उसने अपनी सीट बदल ली.

एक स्कूल जाने वाली लड़की ने लिखा कि दो आदमी साइकिल से उसका पीछा कर रहे थे वहीं एक अन्य महिला ने लिखा कि उसे कई शहरों में कई मौक़ों पर ग़लत तरीके से छुआ गया.

'मैं दो घंटे के लिए मर्द बनना चाहती हूं'

महिला सांसदों का होता है यौन उत्पीड़न

इमेज कॉपीरइट Asif Saud
Image caption यह कपड़ा घरेलू हिंसा की शिकार एक महिला का है, उस महिला ने बताया कि यह ड्रेस उसका पति लाया था और जिस दिन उसने यह पहना उसी दिन उसके पति ने उसे मारा था.

महिलाओं का साझा दर्द है उत्पीड़न

इन अनुभवों को लिखने वाली 14 से 16 साल की लड़कियां भी थीं और 30 से 40 साल की या उससे बड़ी महिलाएं भी.

लगभग सभी महिलाओं ने अपने अनुभव में यह बताना ज़रूरी समझा कि उन्होंने उत्पीड़न के वक़्त क्या कपड़े पहने थे.

पाथेजा बताती हैं कि यहीं से उन्हें यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं के कपड़े जमा करने का विचार आया.

''हमने देखा कि लड़कियां बाद में अपने कपड़ों पर काफ़ी विचार करती हैं, वे अक्सर बतातीं कि मैंने लाल स्कर्ट पहनी थी या मैंने जींस पहनी थी या मैं स्कूल यूनिफॉर्म में थी. इसके बाद ब्लैंक नॉइस ने ख़ुद ही यह सवाल पूछना शुरू कर दिया कि 'तुमने क्या पहना था?'

जसमीन आगे कहती हैं, ''और इसके बाद अगर मेरे सामने यह सवाल आए कि क्या मेरी किसी ग़लती से ऐसा हुआ, क्या मैंने इसके लिए कोई ग़लत संदेश भेजा तो मेरा बिल्कुल सीधा जवाब होता है - नहीं. कोई लड़की चाहती नहीं है कि उसके साथ ऐसा हो.''

''लेकिन हमने लोगों से कहा कि वे उन कपड़ों को याद रखें, उन्हें हमारे पास लेकर आएं क्योंकि उन कपड़ों से वे यादें जुड़ी हैं, ये यादें ही उनके उत्पीड़न की गवाह हैं, और उनकी आवाज़ हैं.''

यह कहानी उस सिरीज़ का हिस्सा है जिसमें भारतीय महिलाओं के बराबरी के लिए किए जा रहे संघर्ष को बताया जा रहा है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए