एक बार में तीन तलाक़ बिल लोकसभा में पास

  • 29 दिसंबर 2017
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एक बार में तीन तलाक़ विधेयक (मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक) लोकसभा में गुरुवार को पारित हो गया. लंबी बहस के बाद बिल के ख़िलाफ़ सभी संशोधन खारिज कर दिये गये यानी इसे बिना किसी संशोधन के पास कर दिया गया. अब इसे राज्यसभा में पेश किया जायेगा.

विधेयक पर विपक्षी सदस्य 19 संशोधन प्रस्ताव लेकर आए थे, लेकिन सदन ने सभी को ख़ारिज कर दिया. तीन संशोधनों पर वोटिंग की मांग की गई और वोटिंग होने के बाद स्पीकर सुमित्रा महाजन ने परिणामों की घोषणा करते हुए कहा कि ये ख़ारिज हो गए हैं. इस बिल में तीन साल के जेल का प्रावधान है. बिल के अनुसार अगर कोई तलाक़ देता है तो उसे थाने से नहीं कोर्ट से जमानत नहीं मिलेगी.

इससे पहले, क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने हंगामे के बीच इसे लोकसभा में पेश किया.

इस पर बहस के दौरान उन्होंने कहा, "देश की महिलाएं बहुत पीड़ित हुआ करती थीं. 22 अगस्त 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताया था. आज सुबह मैंने पढ़ा रामपुर की एक महिला को तीन तलाक़ इसलिए दिया गया क्योंकि वो सुबह देर से उठी थी."

उन्होंने कहा, "महिलाओं की गरिमा से जुड़ा है तीन तलाक़. सुप्रीम कोर्ट से भी एक बार में तीन तलाक़ को असंवैधानिक बताया जा चुका है. उम्मीद थी कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद देश में स्थितियां बदलेंगी, लेकिन जहां इस साल 300 तीन तलाक़ हुए हैं वहीं सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद भी 100 तीन तलाक़ हुए हैं."

क़ानून मंत्री ने कहा, "इस्लामिक देश बांग्लादेश, मिस्र, मोरक्को, इंडोनेशिया, मलेशिया और पाकिस्तान में भी तीन तलाक़ को रेग्युलेट किया गया है. 1961 में बांग्लादेश में लाया गया था एक कानून. इसके अनुसार पत्नी को तीन तलाक़ लिखित देना होगा. अगर ऐसा नहीं किया तो उसे 1 साल की सज़ा दी जायेगी. 1961 के कानून के अनुसार पाकिस्तान में भी तीन तलाक़ या तलाक़-ए-बिद्दत में पत्नी को लिखित नोटिस देना होगा. अगर नियम न माने तो एक साल कैद और पांच हज़ार रुपये जुर्माना का प्रावधान है."

हम इस मामले को वोट के चश्मे से नहीं देख रहे हैं. सवाल सियासत का नहीं, हम इसे इंसानियत के चश्मे से देख रहे हैं. आरोप परिवार को तोड़ने का लगाया जा रहा है. लेकिन यह सवाल तब क्यों नहीं उठता जब तलाक़ देकर महिला को फुटपाथ पर रहने के लिए मजबूर किया जाता है.

क़ानून मंत्री की चार अपील

रवि शंकर प्रसाद ने कहा, "क्या सदन को खामोश रहना चाहिए? शरिया पर हस्तक्षेप नहीं करना चाहते. यह बिल केवल तीन तलाक़ या तलाक़-ए-बिद्दत पर है. लोकसभा देश की सबसे बड़ी पंचायत से अपील है इस बिल को सियासत की सलाखों से न देखा जाये. दूसरी अपील है कि इसे दलों की दीवार से न बांधा जाये. तीसरी अपील है कि इस बिल को मजहब के तराजू पर न तौला जाये. चौथी अपील है कि इस बिल को वोट बैंक के खाते से न परखा जाये. ये बिल है हमारी बहनों, बेटियों की इज्ज़त आबरू का."

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Image caption विदेश राज्य मंत्री एम जे अकबर

इस्लाम खतरे में नहीं

विदेश राज्य मंत्री एम जे अकबर ने तीन तलाक़ पर बिल लाने को ऐतिहासिक मौका बताया. उन्होंने कहा, "यह ऐतिहासिक इसलिए है क्योंकि देश की 9 करोड़ मुस्लिम महिलाओं की तकदीर से जुड़ा है."

उन्होंने एक किस्सा सुनाया.

एक पत्रकार थीं ताया जिनकिन. अंग्रेज़ी अख़बार द गार्डियन की रिपोर्टर. यह बात 1960-61 की है. उन्होंने जवाहर लाल नेहरू से प्रश्न किया कि आपकी सबसे बड़ी कामयाबी क्या है.

जवाहर लाल ने कहा, "हिंदू कोड बिल."

ताया जिनकिन ने फिर पूछा, "क्या मुसलमान औरतों का हक नहीं था बदलाव का."

जवाहर लाल ने जवाब दिया, "वक्त सही नहीं था."

"मेरे मन में पिछले 40 सालों से यह सवाल है कि वक्त कब सही आयेगा."

"लोगों को यह बताया जाता है कि इस्लाम ख़तरे में है. शरीया को बर्बाद किया जा रहा है. मैं मुसलमान के नाते बोलना चाहता हूं कि जो कलमा पढ़ा है तो वो किस हैसियत से यह कह सकता है कि इस्लाम खतरे में है. लेकिन आपने आज़ादी से पहले देश तोड़ने के लिए इस्तेमाल किया और आज समाज तोड़ने के लिए, ज़हर ये फ़ैलाया जा रहा है. केवल कुछ मुसलमान मर्दों की जबरदस्ती खतरे में है."

"शरीया क्या है? शरीया का असल मायने क़ानून नहीं है. इसका मतलब जरिया या रास्ता है. रास्ता फलसफा था लेकिन कानून बनाने वाले इंसान थे. सुन्नियों में कम से कम शरीया के चार स्कूल हैं. चारों के अपने अपने लोग अलग अलग हैं. एक हैं इमाम अबू हनीफ़ा, दूसरे इमाम मालिकी, तीसरे इमाम शाफ़ई और चौथे इमाम हंबल हैं. चार किस्म के क़ानून हैं. ये कहना कि क़ानून नहीं बदले जा सकते, ग़लत है. कानून को इज्तेहाद की बुनियाद पर तब्दील किया जाना चाहिए."

"कानून लोगों के भले के लिए बनता है. ये क़ानून तलाक़ के ख़िलाफ़ नहीं है, ये केवल तीन तलाक़ के ख़िलाफ़ है."

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Image caption कांग्रेस की सांसद सुष्मिता देव

स्थायी समिति में भेजे जाने की मांग खारिज़

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा, "सरकार के बिल में कुछ खामियां हैं. हर कोई महिलाओं के अधिकार के पक्ष में है. बिल को संसद की स्थायी समिति को भेजा जाये."

हालांकि सरकार ने इसे ख़ारिज कर दिया. रविशंकर प्रसाद ने कहा कि जो सुझाव है वो संसद में ही दे दें.

असम से सिल्चर से कांग्रेस की सांसद सुष्मिता देव ने क़ानून मंत्री से सवाल पूछा, "अगर आप इसे अपराध बनायेंगे और पति को जेल भेजेंगे तो महिला और उसके बच्चे का का भरण-पोषण कौन करेगा? अगर महिलाओं का ख्याल है तो क्या महिला आरक्षण विधेयक भी सरकार संसद में लाएगी? सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में तीन तलाक़ को प्रतिबंधित कर दिया है. अगर मुस्लिम महिलाओं के उत्थान का विचार है तो मुस्लिम महिलाओं के लिए एक फंड बनाया जाये जो पति के जेल जाने की स्थिति में उसके भरण पोषण के लिए इस्तेमाल किया जाये."

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Image caption भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी

तीन तलाक़ से तीन अत्याचार

भाजपा सासंद मीनाक्षी लेखी ने कहा, "तलाक़ दुखद प्रक्रिया है जिसका परिणाम औरतों को ताउम्र सताता रहता है."

"क्यों बनाते हैं हम ऐसे रिश्ते जो पल दो पल में टूट जाते हैं, वादा तो करते हैं ताउम्र साथ निभाने का लेकिन हल्की सी आंधी में बिखर जाते हैं."

"तलाक़-ए-बिद्दत में समझौता की गुंजाइश कहां है? जब तीन तलाक़ हो गया तो समझौता कहां है. सुप्रीम कोर्ट के 22 अगस्त को इसे गैरक़ानूनी करार देने के बाद भी तलाक़-ए-बिद्दत रुका नहीं. इसमें क्षण भर में महिला को बदहाली में लाकर सड़क पर खड़ा कर दिया. तीन तलाक़ से तीन अत्याचार होता है. पहला राजनीतिक दूसरा आर्थिक और तीसरा सामाजिक."

"22 देशों में वर्षों से ये बदलाव हो चुका है लेकिन भारत में नहीं हुआ. यहां महिलाओं के अधिकारों के साथ सियासत खेली जाती है."

"सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद भी तलाक़-ए-बिद्दत यानी तीन तलाक़ दिया जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट का डिक्री क़ानून है. इसके बावजूद क्या महिलाएं ऐसे प्रत्येक मामले के बाद क्या सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दर्ज कर सकती है. इसलिए संसद में इसके क़ानून की ज़रूरत पड़ी. ज़रूरत तो है मुस्लिम लॉ को कोडिफाइ किया जाये."

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Image caption असदुद्दीन ओवैसी

राष्ट्रीय जनता दल के सांसद जयप्रकाश यादव ने कहा कि "इस मसले पर मुस्लिम पर्सनल बोर्ड से मशविरा और सहमति की कोशिश की जानी चाहिए. पति जेल में, पत्नी घर में, बच्चों की परवरिश कौन करेगा. सकारात्मक पहल होना चाहिए."

हैदराबाद से एआईएमआईएम के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, "संसद को इस मसले पर क़ानून बनाने का कोई क़ानूनी हक नहीं है क्योंकि ये विधेयक मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है. ये संविधान के अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है. सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही तलाक-ए-बिद्दत को रद्द कर दिया है."

"देश में पहले से क़ानून हैं, घरेलू हिंसा निवारण अधिनियम है, आईपीसी है. आप वैसे ही काम को फिर से अपराध घोषित नहीं कर सकते. इस बिल में विरोधाभास हैं. ये बिल कहता है कि जब पति को जेल भेज दिया जाएगा, तब भी सहवास का अधिकार बना रहेगा. उसे भत्ता देना होगा."

"ये कैसे संभव है कि जो आदमी जेल में हो और भत्ता भी अदा करे. आप कैसा क़ानून बना रहे हैं. मंत्री जी ने शुरुआत में ही कहा कि बिल पर मशविरा नहीं किया गया है. अगर ये बिल पास हो जाता है तो मुस्लिम महिलाओं के साथ नाइंसाफ़ी होगी. लोग अपनी पत्नियों को छोड़ देंगे."

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"देश में 20 लाख ऐसी महिलाएं हैं, जिन्हें उनके पतियों ने छोड़ दिया है और वो मुसलमान नहीं हैं. उनके लिए क़ानून बनाए जाने की ज़रूरत है. इनमें गुजरात में हमारी भाभी भी है. उन्हें इंसाफ़ दिलाए जाने की ज़रूरत है. ये सरकार ऐसा नहीं कर रही है."

केरल से मुस्लिम लीग के सांसद मोहम्मद बशीर ने कहा, ये विधेयक संविधान के अनुच्छद 25 का उल्लंघन है. ये विधेयक पर्सनल लॉ में अतिक्रमण करता है

बीजू जनता दल के सासंद भृतहरि महताब ने कहा, इस बिल में कमियां हैं. इस बिल में कई विरोधाभास हैं.

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