ब्लॉगः 'हम सिख मंदिर की जगह पहुंच गए शिव मंदिर'

  • 30 दिसंबर 2017
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Image caption गुरुद्वारा नानकशाही

मैं पहली दफ़ा बांग्लादेश आई थी और वो ढाका की एक सुस्त शाम थी. सोचा क्यूँ न कुछ लम्हे चुराकर ढाका शहर ही देख लूँ- एक ऐसा शहर जो कभी भारत का ही हिस्सा था.

वहाँ का नानकशाही गुरुद्वारा जहाँ गुरु नानक आकर रहे थे, ढाकेश्वरी मंदिर और औरंगज़ेब के परिवार से जुड़ा लाल बाग़ देखने का मेरा ख़ास मन था.

सो मैं होटल के फ्रंट डेस्क पर गई और पूछा मुझे नानकशाही गुरुद्वारा जाना है, थोड़ा गाइड कर सकते हैं.

'गुरुद्वारा क्या होता है?'

मेरे सवाल के जवाब में सामने वाले शख़्स के चेहरे पर अजीब सा लुक था, जिसे अंग्रेज़ी में 'ब्लैंक लुक' कहते हैं.

मैंने एक दो बार दोहराया लेकिन चेहरे पर वही खामोशी, वही शून्य.

मैंने बात को ज़रा बदलते हुए कहा- "गुरुद्वारा यानी सिखों का धर्म स्थान, सिख मंदिर."

सुनकर उसके चेहरे पर पहले से मौजूद कन्फ़्यूजन और गहरा गया. कहा- "गुरुद्वारा?, मैं नहीं जानता गुरुद्वारा क्या होता है?

उसके चेहरे पर जो कशमकश थी अब वो मेरे चेहरे पर भी थी.

मैंने दोबारा कोशिश करते हुए कहा- "सिख धर्म के बारे में जानते हैं? नानकशाही तो ढाका का ऐतिहासिक गुरुद्वारा है."

सत्तर साल बाद खुला गुरुद्वारा

गुरुद्वारे में ब्रितानी विदेश मंत्री को पड़ी 'डाँट'

मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारों में भोंपू क्यों?

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Image caption नानकशाही गुरुद्वारा में लगी शिला लेख

उसने हिचकिचाते हुए कहा, "मैं लोगों को ढाका घुमाने ले जाता हूँ लेकिन मुझे नहीं पता कि गुरुद्वारा क्या होता है या सिख धर्म क्या होता है."

मैं सन्न सी चुपचाप अपने कमरे में लौट आई. मैं हैरत में थी कि उस पढ़े लिखे शख़्स को अलग-अलग धर्मों के बारे में जानकारी नहीं थी.

क्योंकि मैं भारत से सटे बांग्लादेश में थी तो मैं शायद ये मानकर ही बैठी थी कि यहाँ दोनों देशों की साझी विरासत से जुड़ी चीज़ों के बारे में लोगों को पता ही होगा.

लेकिन ऐसा था नहीं. देर शाम तक कमरे में बैठी मैं यही सोचती रही.

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Image caption ढाका में बने पार्क में लगी महात्मा गांधी और रविंद्रनाथ टेगौर की प्रतिमाएं

सिख मंदिर की जगह पहुँचे शिव मंदिर

ख़ैर मैं उसी शख़्स के पास दोबारा गई और सुबह के लिए टैक्सी के इंतज़ाम की गुज़ारिश की.

सुबह टैक्सी तो मिली ही साथ में वो व्यक्ति भी था. उसने कहा मैं आपको शहर घुमा सकता हूँ.

ज़ाहिर है पहला स्टॉप था नानकशाही गुरुद्वारा. सही ठिकाना न टैक्सी वाले को पता था, न मेरे गाइड को. मैं तो ख़ैर थी ही अजनबी शहर में.

गूगल बाबा ने बताया कि गुरुद्वारा ढाका यूनिवर्सिटी में है. पर सही ठिकाने पर जाने के लिए आज भी इंसानों की ज़रूरत पड़ती है.

अपनी आधी-अधूरी बांग्ला में मैंने एक छात्र से पूछा, "ए सिख मौंदिर टा कोथाए".....................

जब उसकी बताई जगह पर पहुँचे तो सामने शिव मंदिर मिला. ज़ाहिर है बताने वाले ने सिख मंदिर को शिव मंदिर समझा होगा.

मेरे साथ आए होटल वाले साहब ने कहा, "मैंने पूरा ढाका घूमा है पर ये शिव मंदिर मैंने पहली बार देखा है. आ ही गए हैं तो देख ही लेते हैं."

वहाँ से पूछते-पुछाते आख़िरकार हम नानकशाही गुरुद्वारे पहुँचे.

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गुरु नानक का बसेरा

भारत में देखे कई गुरुद्वारों से ये कहीं छोटा था लेकिन श्रद्धालुओं में इसकी बड़ी मान्यता है.

गुरुद्वारे में लगी पट्टी के मुताबिक़ गुरु नानक यहाँ 1504 में आए थे. ये गुरुद्वारा भाई नत्था ने बनाया था जो छठवें सिख गुरु के समय ढाका आए थे. इसे 1630 में पूरा किया गया.

सालों तक इसकी देखभाल ठीक से नहीं हुई. 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद इसकी मरम्मत का काम शुरू हुआ.

2011 में जब मनमोहन सिंह बतौर प्रधानमंत्री ढाका आए थे तो उनकी पत्नी गुरशरण कौर मत्था टेकने नानकशाही गुरुद्वारे आई थीं.

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Image caption 2011 में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पत्नी गुरशरण कौर नानकशाही गुरुद्वारा में मत्था टेकने आई थीं

हर शुक्रवार लगता है लंगर

ख़ैर वापस अपनी कहानी पर लौटूँ तो मैं आख़िरकर गुरुद्वारे पहुँच चुकी थी.

वहाँ की देखरेख करने वाले व्यक्ति से मैंने अपनी आधी अधूरी बांग्ला में बात करने की कोशिश की ही थी कि वो मुझसे हिंदी में बात करने लगा.

उन्होंने बताया कि हर तीन महीने पर भारत से दो लोग यहाँ आते हैं.

ये लोग गुरुदवारे की देखभाल करते हैं और हर शुक्रवार को लंगर भी लगता है जहाँ हिंदू, मुसलमान और यहाँ बसे चंद सिख परिवारों के लोग भी आते हैं.

पर बहुत ही साफ़गोई से उन्होंने बताया, "हम यहाँ काफ़ी अकेले पड़ जाते हैं. यहाँ ज़्यादा सिख परिवार नहीं है. इसलिए तीन महीने बाद लौट जाते हैं."

ढाका और ढाकेश्वरी मंदिर

मेरे साथ आए होटल वाले शख़्स ने भी गुरुद्वारे के दर्शन किए. मैंने उन्हें सिख धर्म और गुरुद्वारे के बारे में बताया और गुरुदवारे में मिलने वाले प्रसाद के बारे में भी.

वहाँ के केयरटेकर को अलविदा कह हम ढाका में आगे बढ़ गए. गुरुद्वारे के दायरे में थी तो एक तरह से मैं उनकी गाइड थी. उसके बाद वो मेरे गाइड बने.

वे मुझे ढाकेश्वरी मंदिर ले गए. कुछ लोग कहते हैं कि ढाकेश्वरी मंदिर के नाम पर ही ढाका शहर का नाम पड़ा. ये एकमात्र मंदिर है जिसे बांग्लादेश के राष्ट्रीय मंदिर का दर्जा हासिल है.

Image caption ढाकेश्वरी मंदिर के नाम पर ही ढाका शहर का नाम पड़ा

दो अजनबी बने दोस्त

मेरे गाइड मुझे शहीद मीनार, बांग्लादेशी संसद और उसके बाद ऐतिहासिक लाग बाग़ भी ले गए जिसे औरंगज़ेब के बेटे ने 1678 में बनवाना शुरू किया था जब वो बंगाल में आकर रुके थे.

चंद ही घंटों में सब कुछ देख लेने की दौड़ में मेरे होटल वाले दोस्त ने मेरी पूरी मदद की. हाँ, इन चंद घंटों में दो अलग-अलग देशों के दो लोग अजनबी से दोस्त जैसे ही हो गए थे.

इसके बाद वहाँ से सीधे मैं अपने दफ़्तर चली गई .

शाम को जब मैं होटल पहुँची तो होटल वाला वो शख़्स मेरे पास आया और मेरा शुक्रिया अदा करने लगा. मैंने पूछा शुक्रिया किस बात का.

जवाब आया- आज आपकी नज़र से मैंने अपने ही देश और शहर को एक नए नज़रिए से देखा.

मेरे चेहरे पर हल्की से मुस्कुराहट आ गई और अलविदा कह मैं वहाँ से चली आई.

उस दिन सुबह-सवेरे जल्दी उठ, नींद की थोड़ी सी कुर्बानी दे, ढाका की छोटी सी यात्रा मेरे लिए यादगार बन गई.

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