रजनी के इस दांव का बीजेपी के लिए क्या है संकेत?

  • 31 दिसंबर 2017
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सुपरस्टार रजनीकांत के राजनीति में आने के फ़ैसले से दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु में आधी सदी पुरानी द्रविड़ सियासत का तेवर और कलेवर बदल सकता है.

हालांकि यह राजनीति में उनकी कामयाबी पर निर्भर करेगा.

पिछले दो दशकों से हां-ना करते हुए आख़िरकार साल 2017 के अंतिम दिन रजनीकांत ने राजनीति में आने का फ़ैसला कर ही लिया.

रजनीकांत ने कहा कि अब बदलाव का वक़्त आ गया है. रजनीकांत की इस घोषणा से उनके प्रशंसकों और जो द्रविड़ राजनीति का विरोध करते हैं उनके बीच उम्मीद जगी है.

अभी तमिलनाडु की राजनीति में करने के लिए बहुत कुछ है. रजनीकांत और कमल हासन जैसे फ़िल्म स्टार इस मौक़े को बखूबी समझते होंगे.

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अन्नद्रमुक की अंदरूनी सियासत

प्रदेश की शक्तिशाली नेता जयललिता के निधन के बाद से राज्य की राजनीति में खालीपन है.

जया एक ताक़तवर नेता थीं और वो अपनी शर्तों पर केंद्र सरकार को भी नचाती रही हैं.

जयललिता और रजनीकांत में जो एकमात्र समानता है वो यह है कि दोनों की पृष्ठभूमि सिनेमा है.

राजनीतिक विश्लेषक बीआरपी भास्कर का कहना है, "द्रविड़ राजनीति से आने वाली जयललिता के नहीं होने की भारपाई रजनीकांत करे देंगे ऐसा सोचने के लिए कोई ख़ास वजह नहीं है. जयललिता की मौत के बाद से प्रदेश की द्रविड़ राजनीति में भारी उथल-पुथल है. हम कह सकते हैं कि यह बदलाव का पहला चरण है और अभी लंबी दूरी तय करनी है."

जयललिता के निधन के बाद से अन्नाद्रमुक में नियंत्रण को लेकर उनकी क़रीबी सहयोगी शशिकला और सत्ता की बागडोर संभाले ई पलनीसामी और ओ पन्नीरसेल्वम के बीच भारी खींचतान है.

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द्रविड़ राजनीति

राजनीतिक विश्लेषक केएन अरुण कहते हैं, ''जब जयललिता नहीं हैं और उनकी अन्नाद्रमुक पार्टी में निराश करने वाली गुटबंदी है, ऐसे में रजनीकांत के लिए राजनीति में प्रवेश करने का ये एक माकूल मौक़ा है.''

द्रविड़ राजनीति के दूसरे खेमे के दिग्गज और द्रमुक सुप्रीमो एम करुणानिधि भी ख़राब सेहत से जूझ रहे हैं. करुणानिधि जयललिता के मुख्य प्रतिद्वंद्वी रहे हैं.

करुणानिधि की द्रविड़ राजनीति की ज़िम्मेदारी उनके बेटे एमके स्टालिन के कंधों पर है.

लेकिन एमके स्टालिन के सामने भी कम समस्याएं नहीं हैं. स्टालिन को उनके भाई एमके अलागिरी ही चुनौती दे रहे हैं.

भास्कर कहते हैं, "स्टालिन के सामने भी समस्याएं हैं, लेकिन उन्होंने ख़ुद को द्रविड़ राजनीति के उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित किया है. अब देखना है कि द्रविड़ राजनीति किस करवट बैठती है. यह वक़्त बताएगा कि क्या द्रविड़ राजनीति की ज़मीन सिनेमा की दुनिया से आने वाले खिसका पाते हैं या नहीं."

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राजनीतिक ज़मीन

रजनीकांत ने आध्यात्मिकता और राजनीति का हवाला दिया है.

उनके इस संदर्भ से उस बीजेपी में भी उम्मीद की किरण गई होगी जो तमिलनाडु में सालों से राजनीतिक ज़मीन हासिल करने के लिए जूझ रही है.

हालांकि रजनीकांत के आध्यात्मिकता के संदर्भ को अरुण किसी भी रूप में असामान्य नहीं मानते हैं.

अरुण कहते हैं, "रजनीकांत आध्यात्मिक प्रकृति के इंसान हैं. द्रविड़ संस्कृति के बावजूद तमिलनाडु में आध्यात्मिकता की एक मजबूत ज़मीन रही है जिसे बीजेपी कभी दोहन नहीं कर पाई. संभव है कि रजनीकांत अपने पक्ष में इसे इस्तेमाल कर पाएं."

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काडर बनना मजबूरी होगी...

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक मालन अरुण की दलील को अलग तरह से देखते हैं.

मालन कहते हैं, "रजनीकांत उस इमेज से बाहर निकलना चाहते हैं जिसमें उन्हें बीजेपी के करीबी के तौर पर देखा जाता है. हकीकत तो ये है कि वे बीजेपी, कांग्रेस और विजयकांत की डीएमडीके की तरह सभी द्रविड़ विरोधी वोटों को अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश करेंगे. अन्नाद्रमुक से भी अपनी नई पार्टी में लोगों को लाने की यकीकन कोशिश की जाएगी. बेशक वे द्रविड़ पार्टियों के सामने बड़े चैलेंजर की तरह उभरने जा रहे हैं."

पर कड़वा सच यह है कि सियासत में सफलता पूरी तरह से प्रशंसकों के दम पर नहीं मिल सकती. प्रशंसकों के लिए पार्टी काडर बनना मजबूरी होगी.

अरुण कहते हैं, "रजनीकांत को विशुद्ध राजनेता की तरह गतिविधियों का समन्वय करना होगा. अगर वो ऐसा नहीं कर पाते हैं तो राजनीतिक जवाबदेही को निभाना आसान नहीं होगा."

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मतदान केंद्र से रेस

दिलचस्प है कि रजनीकांत ने 2021 में तमिलनाडु में होने वाले विधानसभा चुनाव में सभी 234 सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कही.

ज़ाहिर है इसके पहले वो अपनी पार्टी को खड़ा करेंगे. अगले साल स्थानीय निकाय के चुनावों में उन्होंने हिस्सा नहीं लेने की बात कही है.

एक सुपरस्टार के लिए राजनीतिक दांव चलना एक फ़िल्म रिलीज़ की तरह ही होता है.

फ़िल्म की कामयाबी का निर्धारण बॉक्स ऑफिस पर होता है और सियासी क़िस्मत की रेस मतदान केंद्र से शुरू होती है.

अगर रजनीकांत अभिनेता से नेता बनने में कामयाब हो जाते हैं तो तमिलनाडु की 50 साल पुरानी द्रविड़ राजनीति के स्वरूप में बदलाव तय है.

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