क्या पाकिस्तान से ऊब गया है अमरीका?

  • 2 जनवरी 2018
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अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान को धोखेबाज़ और झूठा करार दिया है. उन्होंने कहा कि पिछले 15 सालों में पाकिस्तान को अरबों डॉलर की सहायता दी गई और ये मूर्खतापूर्ण फैसला था.

ट्रंप ने सोमवार को ट्वीट किया था, "अमरीका ने पिछले 15 सालों में पाकिस्तान को 33 अरब डॉलर से ज्यादा की मदद दी और उसने बदले में झूठ और छल के सिवाय कुछ नहीं दिया. वह सोचता है कि अमरीकी नेता मूर्ख हैं. हम अफ़ग़ानिस्तान में जिन आतंकवादियों को तलाश रहे हैं, उन्होंने उन्हें पनाह दी. अब और नहीं."

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ट्रंप के इस बयान ने पाकिस्तान में तहलका मचा दिया है. मंगलवार को वहां कैबिनेट की आपात बैठक बुलाई गई है और बुधवार को सुरक्षा समिति भी बैठ रही है. पाकिस्तान के लोग भी सोशल मीडिया के ज़रिए ख़ासी नाराज़गी जता रहे हैं.

ट्रंप के बयान के मायने क्या?

न्यूयॉर्क में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार सलीम रिज़वी ने बताया कि डोनल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान को खरी-खोटी सुनाते हुए चेताया है कि आर्थिक मदद का सिलसिला अब जारी नहीं रहेगा. माना जा रहा है कि इस ट्वीट में उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी फ़ौजियों पर हमले करने वाले पाकिस्तानी समर्थन हासिल हक्कानी नेटवर्क की ओर इशारा किया है.

उन्होंने कहा, ''अमरीका का कहना है कि पाकिस्तान अफ़ग़ान तालिबान और दूसरे ऐसे समूहों को अपने यहां पनाह दिए हुए है. और वो इससे पहले भी कई बार पाकिस्तान से कहते रहा है कि वो अपने यहां आतंकी गुटों को पनाह देना बंद करे.''

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''लेकिन ये पहला मौका नहीं है जब ट्रंप ने पाकिस्तान की आलोचना की है. हाल में जारी अमरीका की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति में कहा गया था कि हम पाकिस्तान पर आतंकवादी समूहों को ख़त्म करने के प्रयासों में तेज़ी लाने के लिए दबाव डालेंगे क्योंकि किसी भी देश का आतंकवादियों के लिए समर्थन नहीं हो सकता.''

नोटिस पर था पाकिस्तान?

इसके अलावा पिछले साल अगस्त में दक्षिण एशिया को लेकर जारी अपनी नीति में भी ट्रंप ने पाकिस्तान को चेताया था कि वो अपने देश से आतंकी गुटों को निकाल बाहर करे.

रिज़वी ने कहा, ''नए साल पर आया ट्रंप का ट्वीट इसलिए भी पाकिस्तान के लिए कड़ी चेतावनी है कि 22 दिसंबर को माइक पेंस ने अफ़ग़ानिस्तान दौरे पर बग़राम फ़ौजी अड्डे पर अमरीकी सैनिकों को संबोधित करते हुए कहा था कि अमरीका ने पाकिस्तान को नोटिस पर रखा हुआ है.''

उन्होंने कहा था, ''पाकिस्तान ने तालिबान और दूसरे चरमपंथी समूहों को अपने यहां सुरक्षित ठिकाने मुहैया कराए हैं. और अब वो समय बीत चुका है. अमरीका ने अब पाकिस्तान को नोटिस पर रखा है.''

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पाकिस्तान के रक्षा मंत्री खुर्रम दस्तगीर ने ट्रंप के इस ट्वीट के जवाब में आधिकारिक बयान देते हुए कहा है, "हम अपनी मातृभूमि की रक्षा करने में पूरी तरह सक्षम हैं. पाक सेना और नागरिकों ने आतंकवाद के ख़िलाफ़ जंग में भारी बलिदान किया है"

वहीं, पाकिस्तान ने मंत्री ख़्वाज़ा आसिफ़ ने कहा, ''हम जल्द ही अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप के ट्वीट का जवाब देंगे. हम दुनिया को सच बता देंगे. तथ्यों और कल्पना के बीच का फ़र्क बता देंगे.''

पाकिस्तान में उथल-पुथल?

ट्रंप के इस ट्वीट के बाद पाकिस्तान ने मंगलवार को कैबिनेट की आपात बैठक बुलाई है और बुधवार को राष्ट्रीय सुरक्षा समिति की मीटिंग भी बुलाई गई है.

पाकिस्तान ये कहता रहा है कि जो रकम अमरीका उसे देता है, वो कोई आर्थिक मदद नहीं बल्कि आतंकवाद के ख़िलाफ़ जारी जंग में होने वाले पाकिस्तान के खर्च की भरपाई है. लेकिन अमरीका का मत है कि पाकिस्तान कुछ चरमपंथियों पर तो कार्रवाई करता है लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी और भारतीयों पर हमला करने वाले आतंकियों के ख़िलाफ़ कोई कदम नहीं उठाता.

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भारत का भी यही आरोप है कि पाकिस्तान ऐसे तत्वों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के बजाय उन्हें औज़ार के रूप में इस्तेमाल करता है. अमरीका में रिपब्लिकन सीनेटर ग्रैंड पॉल ने भी ट्रंप के कड़े रुख़ का स्वागत किया है.

लेकिन अमरीका के रुख़ में इस तल्ख़ी के मायने क्या हैं? क्या अमरीका और पाकिस्तान के बीच सारे रिश्ते ख़त्म हो चुके हैं? क्या 'मजबूरी की ये दोस्ती' अब दम तोड़ रही है? क्या वाक़ई ट्रंप के इस बयान की वजह भारत की कूटनीतिक कोशिशें हैं?

ट्रंप को रकम का पता नहीं था?

इस बारे में बीबीसी संवाददाता वात्सल्य राय ने डेलावेयर विश्वविद्यालय (अमरीका) के प्रोफ़ेसर मुक्तदर ख़ान से बातचीत की. ख़ान ने कहा कि अभी तक हम लोग को ये सबक सीख लेना चाहिए कि डोनल्ड ट्रंप के ट्वीट और बयानात के पीछे कोई गहरी सोच या रणनीति नहीं है. उन्हें जब कोई ख़बर मिलती है तो वो उस पर तुरंत प्रतिक्रिया देते हैं.

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उन्होंने कहा, ''मेरा अनुमान ये है कि 9/11 हमलों के बाद पिछले दस साल में पाकिस्तान को अमरीका की तरफ़ से 33 अरब डॉलर की जो आर्थिक मदद दी गई, उसकी रकम के बारे में ट्रंप को अंदाज़ा नहीं था. जैसे ही उन्हें इस बात का अहसास हुआ कि इतनी भारी रकम दी गई और इस दौरान पाकिस्तान के एबटाबाद में सैन्य ठिकाने से चंद मील दूर ही ओसामा बिन लादेन छिपे हुए थे, तो उन्हें गुस्सा आ गया और ये ट्वीट कर दिया.''

''लेकिन एक बात तो सही है कि चुनाव से पहले या बाद में, पाकिस्तान को लेकर डोनल्ड ट्रंप का रवैया बदला नहीं है. ट्रंप प्रशासन में कुछ लोग मानते हैं कि पाकिस्तान की तरफ़ से जो थोड़ा-बहुत समर्थन मिलता है, वो अमरीका की विदेश नीति के लिए अहम है. लेकिन शायद ट्रंप इस तरह से नहीं सोचते. उन्हें जब पता चला कि इतनी भारी रकम अमरीका की तरफ़ से पाकिस्तान को दी गई है और कुछ ख़ास नफ़ा उसे नहीं हो रहा है तो उन्होंने ये कड़ा बयान दे दिया. इससे पहले भी उन्होंने इस तरह के बयान दिए हैं लेकिन ये वाला सीधा ट्वीट था.

अमरीका की पाकिस्तान नीति बदली?

पाकिस्तान ने इस ट्वीट को गंभीरता से लिया है, इसके संकेत वहां होने वाली बैठकों से मिल रहे हैं तो क्या माना जा सकता है कि पाकिस्तान को लेकर अमरीका की नीति बदल रही है?

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इसके जवाब में उन्होंने कहा, ''देखिए, पाकिस्तान को लेकर अमरीका के रुख़ में बदलाव आ गया है. भारत और पाकिस्तान को लेकर अमरीका की नीति साफ़ दिख रही है. भारत और अमरीका अपने रिश्ते पहले से ज़्यादा मज़बूत और बेहतर बनाने के बहाने खोज रहे हैं. पाकिस्तान और अमरीका की बात करें तो अमरीका बहाने खोज रहा है उसके साथ अपने रिश्ते ख़त्म करने के.''

क्या ये अमरीका की पाकिस्तान को आख़िरी चेतावनी है?

''लेकिन जब तक आतंकवाद का सिलसिला जारी है और अफ़ग़ानिस्तान तालिबान को पाकिस्तान में कोई जगह मिलती रहेगी, जब तक कि अमरीका को ज़रूरत है, ये दौर यूं ही चलता रहेगा. आप अगर पाकिस्तान की विदेश और आर्थिक नीति को गौर से देख रहे हैं तो अंदाज़ा होगा कि वो अमरीकी सुरक्षा सहायता पर अपने निवेश और हित की निर्भरता कम करते हुए उसे चीन की तरफ़ मोड़ रहा है.''

मजबूरी की रिश्तेदारी?

ख़ान ने बताया, ''तो ये आगे भी तय है कि डोनल्ड ट्रंप हो या फिर कोई और, दोनों के बीच रिश्ते बहुत मज़बूत नहीं होंगे. इसकी वजह ये है कि संबंधों को दूसरे स्तर पर ले जाने की कभी कोशिश ही नहीं की गई. ट्रेड की बात करें या टूरिज़्म की, पाकिस्तान ने कोई ख़ास तरक्की नहीं की है. साल 1979 से वो मजबूरी की रिश्तेदारी के बूते चल रहा था. और अब अमरीका में तंग आ गए हैं लोग.''

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Image caption पूर्व अफ़गान राष्ट्रपति हामिद करजई ने ट्रंप के इस ट्वीट का समर्थन किया है

''इसके अलावा अमरीका फ़र्स्ट पॉलिसी को ट्रंप के अलावा दूसरे लोगों का भी समर्थन मिल रहा है. अमरीका में बसे गोरे लोग और यहां तक कि जिन लोगों को अमरीका में बसे 25-30 साल हो चुके हैं, वो भी अमरीका फ़र्स्ट का पक्ष ले रहे हैं. ऐसे में पाकिस्तान को जाने वाली सहायता को लेकर बार-बार सवाल उठते रहेंगे और इन सवालों का जवाब पाकिस्तान की तरफ़ से आना होगा, वो भी शब्दों में नहीं बल्कि कदमों के ज़रिए.''

क्या मोदी की नीति का असर है?

ख़ान के मुताबिक जब ओसामा बिन लादेन को मारा गया था तो अमरीका ने इस बारे में कोई जानकारी पाकिस्तान के साथ सांझा नहीं की थी. इस घटना के बाद पाकिस्तान ने भी हल्ला मचाया था कि उसकी संप्रभुता से खिलवाड़ किया गया है और उसे ये बर्दाश्त नहीं होगा. लेकिन बराक ओबामा उस समय दूसरे कार्यकाल में थे और ये साफ़ हो गया था कि अमरीका, पाकिस्तान पर भरोसा नहीं कर रहा था.

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''और जब दो मुल्क़ों के बीच भरोसा नहीं होता तो दिक्कतें होना स्वाभाविक है. जैसे कि अमरीका और इसराइल के बीच है या अमरीका और ब्रिटेन के बीच है. कुछ हद तक अमरीका और सऊदी अरब के बीच भी है. लेकिन ओबामा कूटनीति के मोर्चे पर दक्षता रखते थे, ऐसे में वो इस तरह के बयान खुलेआम नहीं देते थे लेकिन ट्रंप खुलकर बोल देते हैं.''

पाक पर और हथौड़ा चलेगा?

''फ़िलहाल अमरीका और इसराइल, यरूशलम के मामले में ख़िलाफ़ वोट देने की वजह से भारत से थोड़ा ख़फ़ा होंगे, ऐसे में भाजपा का ये दावा कि ये उसकी कोशिशों का नतीजा, इस बात में दम कम है. अमरीका, पाकिस्तान को तालिबान के लेंस से देखता है या फिर अफ़ग़ानिस्तान में जारी अपनी जंग के लेंस से देखता है जबकि भारत को वो चीन की लेंस से देखता है.''

लेकिन अमरीका के इस कड़े बयान के बाद पाकिस्तान पर कितना असर होगा? ब्रह्म चेल्लानी ने ट्वीट किया है, ''जिस राशि को रोकने पर अमरीका विचार रहा है, उससे पाकिस्तान को कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ेगा क्योंकि चीन और सऊदी अरब उसके साथ हैं. अमरीका को पाकिस्तान से गैर-नाटो सहयोगी का दर्जा वापस लेना चाहिए और स्टेट प्रायोजित आतंकी नेटवर्क के पीछे की ताक़त पर चोट करनी चाहिए, जो असल में उसकी फ़ौज है!''

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