पाकिस्तान के ख़िलाफ़ अमरीकी सख्ती का भारत को कितना फ़ायदा?

  • 2 जनवरी 2018
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पाकिस्तान पर चरमपंथियों को पनाह देने का आरोप लगाते हुए सोमवार को अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने आर्थिक मदद पर सवाल उठाए. उन्होंने पाकिस्तान को धोखेबाज़ और झूठा करार दिया.

ट्रंप ने ट्वीट कर कहा, ''अमरीका ने पिछले 15 सालों में पाकिस्तान को 33 अरब डॉलर से ज़्यादा की मदद दी और उसने बदले में झूठ और छल के सिवाय कुछ नहीं दिया. वह सोचता है कि अमरीकी नेता मूर्ख हैं. हम अफ़ग़ानिस्तान में जिन आतंकवादियों को तलाश रहे हैं, उन्होंने उन्हें पनाह दी. अब और नहीं."

अमरीकी राष्ट्रपति के इस ट्वीट पर पाकिस्तान ने भी प्रतिक्रिया दी. पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख़्वाजा आसिफ़ ने अपने ट्वीट में कहा है कि जल्द ही राष्ट्रपति ट्रंप के ट्वीट का जवाब दिया जाएगा. उन्होंने कहा, "हम दुनिया को सच बता देंगे. तथ्यों और कल्पना के बीच का फ़र्क़ बता देंगे."

पाकिस्तान को लेकर अमरीका के इस रुख से भारत को कूटनीतिक स्तर पर क्या फायदा हो सकता है? और अगर हां, तो कितना और किस तरह?

इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने के लिए बीबीसी संवाददाता ब्रजेश मिश्र ने सामरिक मामलों के जानकार सुशांत सरीन से बातचीत की.

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क्या ये अमरीका की पाकिस्तान को आख़िरी चेतावनी है?

पढ़िए, उनका नज़रिया

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भारत को ये फ़ायदा ज़रूर हो सकता है कि पाकिस्तान पर दहशतगर्दी पर लगाम लगाने का दबाव बनेगा. अमरीका की ओर से पाकिस्तान पर जो दबाव बन रहा है उसकी असल जड़ में अफ़ग़ानिस्तान है.

अमरीका का कहना है कि अफ़ग़ानिस्तान में चरपंथियों के ख़िलाफ़ उसका सैन्य अभियान इसलिए पूरी तरह सफल नहीं हो पा रहा है, क्योंकि पाकिस्तान गुपचुप तरीके से इन चरमपंथियों की मदद कर रहा है.

लेकिन 'गुड और बैड टेररिस्ट' की जो परिभाषा पाकिस्तान गढ़ता रहा है, ये अब आगे चल नहीं सकता है.

अगर पाकिस्तान उन चरमपंथी संगठनों पर हाथ डालता है जो अफ़ग़ानिस्तान में सक्रिय हैं और उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करता है तो वो भारत या कश्मीर में सक्रिय उन संगठनों को दहशतगर्दी की खुली छूट नहीं दे सकता.

भारत लगातार दुनिया को बता रहा है कि पाकिस्तान स्थित चरमपंथी संगठन उसकी ज़मीन पर गड़बड़ी कर रहे हैं. यही नहीं भारत ने पाकिस्तान के साथ सीधी बातचीत की भी यही शर्त रखी है कि वो चरमपंथी संगठनों को पनाह देना बंद करे.

अब अमरीका के कहने पर या दबाव में ही सही पाकिस्तान वो सारी चीज़ें करना शुरू कर दे जो भारत चाहता है उनसे तो फिर दोनों देशों के बीच बातचीत न होने की एक बड़ी मुसीबत टल जाएगी और संबंध बेहतर हो सकते हैं.

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मेरे ख़्याल से ये पाकिस्तान पर भी निर्भर करता है कि वो ट्रंप की बात को कैसे लेता है. सिर्फ फंडिंग ही ऐसी एक चीज़ नहीं है जिससे पाकिस्तान इस पर मजबूर हो जाए. पाकिस्तान अपना बचाव करेगा, आरोपों से नकारेगा और अमरीका को ललकार भी सकता है कि आप फंड रोक दीजिए. हम उसके बिना भी जीवित रह सकते हैं.

हालांकि मेरे ख़्याल से ये अमरीका का ये पहला कदम होगा. अगर ये एक चेतावनी है और एक्शन की दिशा में अमरीका का पहला कदम है तो ये माना जा सकता है कि आगे चलकर ऐसे और भी कदम उठाए जाएंगे और पाकिस्तान की चरमराती अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ेगा.

ऐसे में ये पाकिस्तान को सोचना पड़ेगा कि क्या वो घास खाने को तैयार है या घास का जो स्वाद है उसे कुछ और देर के लिए मुल्तवी करेगा. दूसरी चीज़ उनको सोचनी पड़ेगी कि तालिबान और दहशतगर्दी को लेकर उनकी पॉलिसी क्या है. क्या वो दुनिया की मजबूत अर्थव्यवस्थाओं और दूसरे मुल्कों से अपने रिश्ते बरकरार रखना चाहता है या फिर तालिबान जैसी एक मध्यकालीन सोच और चरमपंथी संगठनों के साथ रिश्ते बनाए रखने में उसकी दिलचस्पी है. पाकिस्तान को इस पर फैसला लेना होगा. इसके लिए अमरीका को दो-चार कदम और उठाने होंगे.

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अमरीका पाकिस्तान को लेकर जो कदम उठा रहा है वो अपने हितों के लिए कर रहा है. अमरीका ने पाकिस्तान को जो फंड दिया उसके बदले उम्मीद की थी कि वो चरमपंथी संगठनों के खिलाफ एक्शन लेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

ये बात याद रखनी होगी कि अमरीका अपने हित में ही सारे कदम उठाएगा. उसका फ़ायदा अगर भारत को होता है तो ये सिर्फ संयोग की बात होगी. कुछ चीज़ों में भारत और अमरीका के हित मिलते हैं वहां तालमेल बिठाया जाएगा तो भारत को फ़ायदा मिल सकता है.

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