वो खत जो सावित्रीबाई फुले ने ज्योतिराव को लिखे थे

  • 3 जनवरी 2018
सावित्री बाई फुले इमेज कॉपीरइट Sandhya Nare Pawar
Image caption सावित्री बाई फुले को भारत की पहली शिक्षिका माना जाता है

"यहाँ एक अनहोनी हो चुकी है. गणेश नाम के एक ब्राह्मण को पोथी-पुराणों से बहुत लगाव है. और वह गांव-गांव घुमकर पंचांग बताकर अपना गुज़ारा चलाता है."

"उसे यहाँ गांव में सारजा नाम की एक लड़की से प्यार हुआ है. अब वह गणेश से छह महीने पेट से है. यह बात गांववालों को समझने पर कुछ बदमाश लोगों ने इन दोनों को पीटते हुए गांव के गलियों में घुमाया. वह उन्हे जान से मारने जा रहे थे. लेकीन मैं वहां भाग कर पहुंच गई, उन लोगों को अंग्रेज़ सरकार का डर दिखाया और उन दोनों को बदमाशों के चंगुल से छुडाया. लेकीन भीड़ की मांग थी की वह ब्राह्मण और वह नीच जाती की लड़की गांव छोड़ कर जाएं, जिसे उन दोनों ने मान लिया....."

इस खत की तारीख़ 3 जनवरी 2017 या 1917 की नहीं है. इस खत की तारीख है 29 अगस्त 1868.

शहरों में रहने वाले चुनिंदा लोगों को छोड़ कर भारत के ग्रामीण इलाकों में आज भी इंटर कास्ट मैरिज आसान बात नहीं है. इंटर कास्ट मैरिज को विरोध करनेवाली खाप पंचायतें, जाति पंचायतें, ये व्यवस्थाएं आज भी कार्यरत हैं.

ऑनर किलिंग के नाम पर आज भी हत्यायें होती है. शादी से पहले मां बनना, शादी के पहले गर्भधारण करना आज भी कलंकित माना जाता है. स्त्री-पुरुष के बिच की प्रेमभावना पर आज भी जाति, धर्म, विवाह इस तरह के बंधन कायम हैं.

ऐसी स्थिति में 1868 में इंटरकास्ट मैरिज और विवाहपूर्व गर्भधारण, ये चीजें तत्कालीन समाज को मृत्यूदंड की सजा फरमाने लायक गंभीर लगा.

इसमें कोई अचरज की बात नहीं. इसमें अचरज की बात यही है कि एक 37 साल की महिला ये खब़र सुनते ही तुरंत उठ गई और भागते हुए घटनास्थल पर पहुंच गई. इतना ही नहीं, उसने वहां पर जमी भीड़ को अंग्रेज़ सरकार का डर दिखा कर उस दंपती को छुड़ाया और उनकी जान बचा ली.

भीड़ का सामना करते हुए उस दंपती के साथ डटकर खड़ी रहनेवाली महिला का नाम था सावित्रीबाई फुले.

इंटरकास्ट मैरिज और विवाहपूर्व गर्भधारणा को सावित्रीबाई गुनाह नहीं मानती, उस लड़की को सावित्रीबाई कलंकित नहीं मानती. इसी लिए वह उस दंपती के साथ खड़ी रहती हैं.

क्या आप फ़ातिमा शेख़ को जानते हैं?

इमेज कॉपीरइट Sandhya Nare Pawar

सावित्रीबाई फुले के खत

ज्योतिराव फुले को लिखे सावित्रीबाई फुले के इस खत से हमे यह घटना पता चलती है. सावित्रीबाई ने जो खत ज्योतिराव फुले को लिखे, उनमें से तीन खत आज उपलब्ध हैं. इनमें से पहला खत 1856 का, दूसरा खत 1868 का और तीसरा खत 1877 का है. ये तीनों खत सावित्रीबाई के व्यक्तित्व के अलग अलग पहलुओं पर रोशनी डालते हैं.

सावित्रीबाई न सिर्फ़ भारत की पहली महिला टीचर हैं, बल्कि वे एक स्वतंत्र व्यक्तित्व की क्रांतिकारी महिला भी थीं. ये इन खतों से हमे पता चलता है. घर से बाहर निकालकर सामाजिक कार्य करनेवाली महिला, साथ में समय से आगे देखनेवाली, मानवाधिकार के बारे में बोलनेवाली एक संवेदनशील महिला से ये खत हमें परिचित कराते हैं.

जो खत हमने ऊपर पढ़ा, वह ज्योतिराव फुले को लिखा सावित्रीबाई का दूसरा खत है. ये खत उन्होंने अपने मायके नायगांव से लिखे थे. तीसरा खत उन्होंने पुणे के पास के जुन्नर गांव से लिखा है. साल 1876 और 1896 इन सालों में महाराष्ट्र में दो बड़े अकाल हुए. 1876-77 का अकाल एक भीषण अकाल माना जाता है. इस अकाल में सावित्रीबाई 'सत्यशोधक समाज' संगठन के कार्यकर्ताओं के साथ घूमकर लोगों की सहायता कर रही थीं.

इमेज कॉपीरइट Sandhay Nare Pawar

1876 का अकाल

ये काम करते हुए 20 अप्रैल 1877 को जुन्नर से सावित्रीबाई लिखती हैं, "1876 साल ख़त्म होने पर अकाल की तीव्रता बढ़ गई और जानवर धरती पर गिरकर मरने लगे, लोगों को खाना नहीं, जानवरों को चारा नहीं, इसके सिवाय कई लोग घर छोड़कर दूसरे इलाकों मे जा रहे हैं. कई लोग अपने बच्चों को और जवान लड़कियों को बेच कर जा रहे हैं. नदियां, नाले सूख गए हैं. पेड़ सूख गए हैं. ज़मीन बंजर हो चुकी है. कई लोग भूख और प्यास से मर रहे हैं. ऐसी भयानक परिस्थिति यहां पर है."

असल में सावित्रीबाई फुले ने खत लिखे, यही बात ही समय से आगे चलने की एक मिसाल थी. उस वक्त पत्नी का पति को खत लिखना आम बात नहीं थी. महिलाओं तक पढ़ना-लिखना ही नहीं पहुंचा था, उस वक्त सावित्रीबाई अपने पति को खत लिख रही थीं. उन खतों में वह पारिवारिक बातों के बजाय सामाजिक कामों के बारे में लिख रही हैं.

इन खतों को हम बारिकी से पढ़ें तो हमें समझ में आ जाएगा कि ये सिर्फ़ पति-पत्नी के बीच का पत्राचार नहीं है बल्कि एक ही कार्य में सहभागी दो लोगों का संवाद है.

इमेज कॉपीरइट Google
Image caption गूगल ने ये डूडल बनाकर सावित्रीबाई फुले को याद किया था

दलित भी इंसान हैं...

सावित्रीबाई ने 1856 मे लिखा हुआ पहला खत यही दर्शाता है. ये खत लिखते वक्त सावित्रीबाई अपने मायके नायगांव में हैं. वहां पर सावित्रीबाई का छोटा भाई उन्हें ये कह रहा है कि आप पती-पत्नी शूद्रों के लिए काम कर के अपनी कुल मर्यादा का उल्लंघन कर रहे हो.

सावित्रीबाई इस बारे में ज्योतिराव को खत में लिखती हैं, "मैंने उसकी बात का खंडन करते हुए कहा, भाई तुम्हारी बुद्धि ब्राह्मणों की सीख से दुर्बल हो गई है. तुम बकरी, गाय इन को प्यार से पाल लेते हो, नागपंचमी पर नाग को दूध पिलाते हो. महार-मांग (दलित) तुम्हारे जैसे मानव हैं. उनको तुम अस्पृश्य समझते हो इसकी वजह बताओ, ऐसा सवाल मैंने उससे किया."

निंदा से डरे बिना काम करते रहना चाहिए, सावित्रीबाई इसी सिद्धांत पर यकीन करती थीं. मानवता का धर्म माननेवाली सावित्रीबाई का व्यक्तित्व इन खतों से उजागर होता है. इसीलिये ये खत एक महत्वपूर्ण सामाजिक और ऐतिहासिक दस्तावेज़ है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)