इन 8 बातों की वजह से कितने आक्रामक हो पाएंगे राहुल गांधी?

  • 4 जनवरी 2018
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कहा जा रहा है कि राहुल गांधी एक राजनेता के तौर पर साल 2017 में परिपक्व हो गए हैं, लेकिन क्या ये परिपक्वता 2018 में भी बरक़रार रहेगी?

आख़िरकार, वो कई बार एक-दो अंक हासिल कर चुके हैं, जब ये उम्मीद बंध जाती है कि वो अपने रूप में आ रहे हैं तब वो एक बार फिर से ग़लतियों, चुनावी हारों और विदेशी छुट्टियों के चक्र में फंस जाते हैं.

तो क्या वो इस बार अपने रूप में आ ही गए हैं? इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए पहले हमें ये देखना होगा कि उनमें बदला क्या है.

1. तर्कशील और स्पष्ट

पहले ये स्पष्ट ही नहीं हो पाता था कि राहुल गांधी कहना क्या चाह रहे हैं, वो मतदाताओं को आख़िर देना क्या चाहते हैं? फ़रवरी में उत्तर प्रदेश चुनावों में और दिसंबर में गुजरात चुनावों में राहुल गांधी की रैलियों से ये फ़र्क़ स्पष्ट हो जाता है.

उत्तर प्रदेश में वो एक बात से दूसरी बात पर भटक रहे थे. वो अपनी कहानियों में ही खोए हुए लग रहे थे. ऐसी अस्पष्टता मन में सवाल पैदा करती थी कि वो आख़िर कहना क्या चाह रहे हैं? लेकिन अब जो नए राहुल गांधी हैं वो अचानक से स्पष्ट हो गए हैं.

राहुल क्या कहना चाह रहे हैं, गुजरात में इस बात को लेकर कोई संशय नहीं था. वो विकास और अर्थव्यवस्था के मुद्दों पर मोदी सरकार पर निशाना साध रहे थे. सुबह के समय में वो मंदिरों में हाज़िरी दे रहे थे.

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2. सुसंगत

राहुल गांधी की पहचान ऐसे व्यक्ति के रूप में बन गई थी जो बिना वजह इधर-उधर जाते रहते थे. कभी किसी दलित के घर में तो कभी किसी ध्यान केंद्र में.

वो कई दिनों तक यूं ही ग़ायब हो जाते. अपने विचारों और भाषणों में भी वो असंगत दिखाई देते थे.

उन्होंने उत्तर प्रदेश चुनावों के दौरान इसमें सुधार शुरू किया था. 2016 के मध्य में उन्होंने उत्तर प्रदेश में लगातार यात्राएं की और बस एक बात ही कही- किसानों को क़र्ज़माफ़ी मिलनी चाहिए.

और इसके बाद वो कई महीनों के लिए ग़ायब हो गए. फिर अखिलेश यादव के बड़े भैया के रूप में एक सुनियोजित गठबंधन के तहत अवतरित हुए.

हालांकि गुजरात चुनावों में राहुल गांधी ने स्वयं मोर्चा संभाला और वो ऐसे नेता के रूप में दिखे जो गुजरात को लेकर गंभीर है. अपनी रैलियों की बीच में वो इधर-उधर भी नहीं गए.

पिछले कई नव वर्षों की पूर्व संध्या की तरह इस बार राहुल गांधी ने यूरोप की उड़ान नहीं भरी. वो इस साल गोवा में अपनी मां सोनिया गांधी के साथ शांतिपूर्ण समय बिता रहे हैं.

हालांकि गोवा की छुट्टियां भी चौबीस घंटे काम करने वाले के तौर पर पेश किए जा रहे नेता की छवि के आड़े आ सकती हैं. लेकिन यूरोप न जाना इस दिशा में सही शुरुआत कहा जा सकता है.

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3. दूसरों ने हार मान ली है

यदि किसी क्रिकेट टीम के तीन सबसे अच्छे खिलाड़ी ख़राब फॉर्म में हों, ब्रेक ले लें या रिटायर हो जाएं तो चौथा सबसे अच्छा खिलाड़ी अपने आप बेहतर दिखने लगता है.

पिछले कुछ महीनों में नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में गिरती अर्थव्यवस्था और जीएसटी के क्रियान्वयन की वजह से गिरावट आई है.

अरविंद केजरीवाल ने हथियार डाल दिए हैं और एक तरह से उन्होंने 2019 की दौड़ से आम आदमी पार्टी को बाहर ही कर लिया है.

राष्ट्रीय राजनीति में नीतीश कुमार एक और खिलाड़ी थे जो मज़बूत प्रतिद्वंदी दिख रहे थे लेकिन उन्होंने भी बीजेपी से हाथ मिला लिया है.

एक और जहां बाकी नेताओं का ग्राफ़ गिर रहा था, राहुल गांधी में हुए सुधार उन्हें बेहतर नेता को रूप में दिखाने लगे.

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4. बीजेपी राहुल को बेहद गंभीरता से ले रही हैः

पिछले कुछ महीनों से बीजेपी राहुल गांधी को बहुत गंभीरता से ले रही है, ये अचानक हुआ है. बीजेपी ये जोख़िम सोच समझकर उठा रही है.

अर्थव्यवस्था की वजह से मोदी की लोकप्रियता कुछ कम हुई है, इस माहौल में बीजेपी ने राहुल गांधी और कांग्रेस पर ध्यान केंद्रित कर दिया है ताकि दोनों पार्टियों के बीच फ़र्क़ दिखाया जा सके.

बीजेपी पर जब नोटबंदी को ख़राब तरीके से लागू करने, अर्थव्यवस्था गिराने, किसानों की आमदनी में सुधार न करने के आरोप लग रहे हैं, वो मतदाताओं का ध्यान राहुल गांधी और कांग्रेस की ओर खींचकर मानों पूछ रही है, क्या कांग्रेस आपके लिए बेहतर विकल्प है?

हालांकि इस रणनीति के उल्टे परिणाम भी हो सकते हैं. यदि भाजपा राहुल गांधी का मज़ाक बनाने से उन्हें गंभीरता से लेने तक पहुंच गई है तो इससे यही मतलब निकलता है कि राहुल गांधी मायने रखते हैं.

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5. स्पष्ट संदेश

पहले ये पता नहीं था कि राहुल गांधी और उनकी पार्टी के मुद्दे क्या हैं.

लेकिन 2017 में राहुल गांधी ने ये स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस मतदाताओं को क्या देगी और वो बीजेपी से अलग कैसे है.

कांग्रेस का मुख्य ध्यान अभी भी लेफ्ट ऑफ़ सेंटर (मध्यमार्गी), कल्याणकारी अर्थव्यवस्था, किसानों के लिए क़र्ज़माफ़ी की वकालत और ग्रामीण कल्याण पर अधिक ख़र्च का समर्थन हैं.

गुजरात में तो वो यहां तक पहुंच गए कि उन्होंने कॉर्पोरेट जगत के लोगों (अडानी और टाटा) का नाम तक ले दिया और मोदी पर उनका समर्थन करने का आरोप जड़ दिया.

उसी सयम हिंदुत्व से निपटने की एक स्पष्ट नीति, भेल ही ये नीति सही हो या नहीं हो लेकिन एक नीति है तो सही- हिंदुत्व के जाल में नहीं फंसना, मुसलमानों को लुभाते हुए नहीं दिखना, हिंदू प्रतीकवाद करना ताकि ये दर्शाया जा सके कि कांग्रेस हिंदुओं के ख़िलाफ़ नहीं है.

अब धर्मनिरपेक्षता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को बहुलवाद के रूप में दिखाया जा रहा है.

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6. कोई भूल नहीं

मध्य 2017 तक राहुल गांधी ख़ूब गलतियां कर रहे थे या ऐसी बातें कह रहे थे जो उन्हें अपरिपक्व दर्शा रहीं थीं. जैसें कि उन्होंने यूपी में आलू फ़ैक्ट्री का बयान दिया. दरअसल वो आलू चिप्स की फ़ैक्ट्री की बात करना चाह रहे थे.

बीजेपी हमेशा से ऐसी ग़लतियों का फ़ायदा उठाती रही है. वो अभी भी ग्रामीण मतदाताओं के सामने अंग्रेज़ी के बहुत से शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, और जैसा कि हमने उनकी हाल की अमरीका यात्रा में देखा, वो अंग्रेज़ी में ही ज़्यादा सहज भी दिखते हैं. लेकिन कम से कम ऐसी मामूली ग़लतियां अब रुक गई हैं.

7. व्यंग्य का इस्तेमाल

चुटकुलों के निशाने पर होने के बजाए राहुल गांधी अब प्रभावशाली तरीके से व्यंग्य का इस्तेमाल अपनी बात रखने के लिए कर रहे हैं.

लोग अचरज में हैं कि उनके ट्वीट और वन लाइनर कौन लिख रहा है.

ये मुद्दा नहीं है क्योंकि नरेंद्र मोदी समेत तमाम प्रमुख नेताओं के पास सोशल मीडिया प्रबंधकों, शोधकर्ताओं और लेखकों की टीम होती है.

लेकिन राहुल ने इस सवाल का भी मज़ाक बना दिया जब उन्होंने अपने कुत्ते पीडी को दिखाते हुए कहा कि वो उनके ट्वीट्स लिख रहे हैं.

इससे उनका मानवीय पक्ष भी सामने आया. वो मोदी को भी उन्हीं की भाषा में जवाब दे रहे हैं. जीएसटी के लिए उन्होंने गब्बर सिंह टैक्स कहा.

व्यंग्य के इस्तेमाल से राहुल गांधी एक स्मार्ट नेता के रूप में सामने आ रहे हैं क्योंकि व्यंग्य संवाद का एक प्रभावशाली माध्यम है.

स्टैंड अप कॉमेडियन की लोकप्रियता इस बात का सबूत है. यहां तक औसत दर्ज के कॉमेडियन भी लोकप्रिय हो जाते हैं.

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8. पार्टी के भीतर अधिक आज़ादी

राहुल गांधी एक नेता के तौर पर अधिक परिपक्व नज़र आ रहे हैं क्योंकि वो आत्मविश्वास दिखा रहे हैं, हो सकता है कि वो पार्टी में उन्हें मिली अधिक भीतरी आज़ादी की वजह से हो.

पार्टी अध्यक्ष बनने से पहले ही उन्होंने मणिशंकर अय्यर को निलंबित कर दिया था जो दर्शाता है कि उन्हें उनकी मां ने पूरी आज़ादी दे दी है.

यहां तक की गुजरात चुनावों में भी रणनीति बनाने में उनकी बात ही ज़्यादा सुनी गई. अहमद पटेल जैसे पुराने रक्षाकवच नेताओं की भूमिका तक कम कर दी गई.

इसी अधिक आज़ादी के साथ राहुल गांधी के पास अधिक नियंत्रण दिखता है और ये उनके व्यक्तित्व में भी नज़र आ रहा है. अब वो एक ज़बरदस्ती के नेता नहीं लग रहे हैं.

वो व्यक्ति जिसने कभी कहा था कि सत्ता ज़हर है अब चुनाव जीतने की बातें कर रहे हैं, देर से ही सही.

नरेंद्र मोदी तक पहुंचने में राहुल गांधी को अभी भी लंबा फ़ासला तय करना है, लेकिन उन्होंने कम से कम शुरुआत तो कर ही दी है.

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