ब्लॉग: क्या जिग्नेश जैसे नेता हिंदुत्व की राजनीति के लिए ख़तरा हैं?

  • 7 जनवरी 2018
महाराष्ट्र में प्रदर्शन इमेज कॉपीरइट PUNIT PARANJPE/AFP/Getty Images

यू-ट्यूब पर आप वो वीडियो देख सकते हैं जिनमें भगवा झंडे लहराते हुए लोगों की भीड़ 'जय भीम' लिखे नीले झंडे लेकर चलने वालों को दौड़ा दौड़ा कर मार रही है, उनकी गाड़ियों के शीशे चकनाचूर किए जा रहे हैं और फिर पुलिस की मौजूदगी में दोनों तरफ़ से पथराव हो रहा है.

दलितों के ख़िलाफ़ वो कौन सा दबा हुआ ग़ुस्सा था जो पुणे के पास भीमा कोरेगाँव में फूटा? ये सबको मालूम था कि जिस स्थान पर दलित विजय का जश्न मनाने 1927 में बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर पहुँचे थे वहाँ हर साल की तरह इस बार भी दलित संगठन इकट्ठा होंगे.

इसके बावजूद दलितों और हिंदुत्ववादी संगठनों में झड़प को रोकने के कोई उपाय क्यों नहीं किए गए जबकि केंद्र और राज्य में एक हिंदुत्ववादी पार्टी सत्ता में है? पिछले डेढ़ साल से महाराष्ट्र के कई शहरों में निकले मराठों के मूक मोर्चे की अंतिम परिणति पुणे के पास भीमा कोरेगाँव में हुई है.

वहाँ दलित समुदाय के हज़ारों हज़ार लोग चितपावन ब्राह्मण पेशवा की फ़ौज पर 'अछूत' महार सैनिकों की विजय की 200वीं जयंती मनाने के लिए पिछले साल के आख़िरी दिन इकट्ठा हुए थे.

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विचारधारात्मक गर्भनाल

दलित-विरोधी हिंसा भड़काने के लिए जिन दो लोगों के ख़िलाफ़ पुलिस ने आपराधिक मामले दर्ज किए हैं वो पुणे और आसपास की हिंदुत्ववादी राजनीति के प्रमुख चेहरे हैं.

इनमें से एक 85 बरस के संभाजी भिडे हैं जिनके बारे में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनने से पहले कह चुके हैं कि "हम जब समाज जीवन के लिए कार्य करने के संस्कार प्राप्त करते थे तब हमारे सामने भिडे गुरु जी का उदाहरण प्रस्तुत किया जाता था."

इन दोनों अभियुक्तों की विचारधारात्मक गर्भनाल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी रही है. संभाजी भिडे 1984 तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक थे.

हिंदुत्ववादी संगठन हमेशा हिंदू समाज को एकजुट करने और जातीय विभेद ख़त्म करने की बात कहते रहे हैं. फिर भीमा कोरेगाँव में दलितों को हिंदुत्ववादियों की तरफ़ से खुली चुनौती क्यों दी गई?

दलितों और ग़ैर-दलित हिंदुओं के बीच तनाव को कम करने की बजाए कुछ लोगों ने पास के ही एक गाँव में मध्यकाल की दलित विभूति गोविंद गायकवाड़ की समाधि में लगे बोर्ड को तोड़ दिया.

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मूक मोर्चों की राजनीति

दलित मानते हैं कि जब औरंगज़ेब ने छत्रपति शिवाजी के बेटे छत्रपति संभाजी महाराज के शव के टुकड़े टुकड़े करवाए तो इलाक़े के सवर्ण मुग़लों के डर से उनका अंतिम संस्कार करने को तैयार नहीं हुए थे. गोविंद गायकवाड़ ने शव के टुकड़ों को एकत्र करके उनका अंतिम संस्कार किया.

पर मराठा इस कहानी को ग़लत बताते हैं और कहते हैं कि दरअसल मराठों ने ही छत्रपति संभाजी महाराज का अंतिम संस्कार किया.

सवाल बना हुआ है कि दलितों और हिंदुओं के बीच के इस द्वंद्व को हवा देने का काम हिंदुत्व की राजनीति करने वालों ने ही क्यों किया? यही नहीं इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के मुताबिक़ अखिल भारतीय ब्राह्मण महासंघ जैसे संगठनों ने पुलिस से दलितों को एकजुट होने की अनुमति न देने की अपील भी की थी.

इस सवाल का जवाब जानने के लिए महाराष्ट्र के कई शहरों और क़स्बों में निकाले गए मूक मोर्चों की राजनीति को समझना होगा.

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दलित-विरोधी

हाथों में भगवा झंडे लहराते हुए लाखों मराठों के मूक मोर्चे पिछले डेढ़ बरस से मीडिया की सुर्ख़ियाँ बनते रहे थे. लोग महाराष्ट्र के छोटे-बड़े शहरों, क़स्बों में सड़कों पर निकल पड़ते थे. बिलकुल मौन और अनुशासित. कोई नारा हवा में नहीं गूँजता था. कोई भाषण नहीं होता था.

शहर के प्रमुख मार्गों से होकर गुजरने वाले इन मौन जुलूसों का नेतृत्व स्कूली लड़कियाँ करती थीं. ये मौन क्रोध अहमदनगर ज़िले के कोपरडी गाँव में 13 जुलाई 2016 को एक मराठा किशोरी के साथ हुए बलात्कार और हत्या के बाद उबल पड़ा था.

बलात्कार के आरोपी दलित थे और मराठा समाज उन्हें कड़ी से कड़ी सज़ा दिलवाने के लिए आंदोलन कर रहा था. मगर फिर इस आंदोलन में दलित-विरोधी माँगें लगातार मुखर होती चली गईं.

ख़ास तौर पर जो प्रमुख माँगे सामने आईं - सरकारी नौकरियों में मराठों को आरक्षण मिलना चाहिए और अनुसूचित जाति-जनजाति क़ानून में बदलाव किए जाने चाहिए ताकि इसका 'ग़लत इस्तेमाल' न हो सके.

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Image caption मराठी फ़िल्म 'सैराट' का पोस्टर

मराठी फ़िल्म 'सैराट' पर विवाद

ये ठीक वैसा ही था जैसे 1994 में उत्तर प्रदेश के शिक्षा संस्थानों में पिछड़े वर्ग के छात्रों को आरक्षण देने के मुलायम सिंह सरकार के फ़ैसले के ख़िलाफ़ समूचे उत्तराखंड (तब वो उत्तर प्रदेश का हिस्सा था) में आंदोलन की लहर फूट पड़ी थी और लोगों ने नारा लगाया था - हमें हमारा उत्तराखंड दो, हम अपनी आरक्षण नीति ख़ुद लागू करेंगे.

यूँ तो वो आंदोलन पृथक उत्तराखंड राज्य के लिए था पर उसमें मायावती और कांशीराम जैसे दलित नेताओं और मुलायम सिंह जैसे पिछड़े वर्ग के नेताओं के ख़िलाफ़ खुलेआम जातिवादी नारे लगाए जाते थे. इसी कारण दलित समाज का बड़ा हिस्सा उत्तराखंड आंदोलन का हिस्सा नहीं बन पाया.

बहरहाल, मराठों और दलितों के बीच तनाव का ये दृश्य सड़कों पर बाद में दिखाई दिया — इससे पहले इस द्वंद्व को मराठी फ़िल्म 'सैराट' के ज़रिए निर्देशक नागराज मंजुले ने सिनेमा के पर्दे पर उतारा. सैराट अप्रैल 2016 में रिलीज़ हुई थी. ये एक खाते पीते मराठा ज़मीदार परिवार की लड़की और एक दलित लड़के की दुखांत प्रेम कहानी थी.

प्रेम विवाह को लड़की का परिवार स्वीकार नहीं करता और अंत में लड़की और उसके पति की हत्या कर दी जाती है. इस फ़िल्म के रिलीज़ होते ही मराठा-दलित द्वंद्व पर सार्वजनिक बहस छिड़ गई थी. मराठा असंतोष को कई तरह से विश्लेषित करने की कोशिश की गई.

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चुनावी नुक़सान का अंदेशा

कुछ विश्लेषकों ने इसे किसानों का असंतोष बताया है जो क़र्ज़ में दबकर कई जगहों पर आत्महत्या कर रहा है तो कई बार मराठा आंदोलन को आरक्षण की व्यवस्था ख़त्म करने की एक व्यापक योजना का हिस्सा भी बताया गया.

इन मूक मोर्चों में सीधे तौर पर हिंदुत्ववादी संगठनों की कोई भूमिका रही हो या न रही हो, पर आरएसएस के कई अधिकारी कई मौक़ों पर कह चुके हैं कि आरक्षण की समीक्षा की जानी चाहिए.

विवाद बढ़ने या चुनावी नुक़सान का अंदेशा होने पर सुलह-सफ़ाई कर दी जाती है पर ऐसा बयान देकर संघ परिवार उस व्यापक सवर्ण हिंदू समाज की भावनाओं का प्रतिनिधित्व कर रहा होता है जो आरक्षण को अपने ख़िलाफ़ अन्याय मानता है और चाहता है कि ये व्यवस्था ख़त्म हो.

भारतीय जनता पार्टी और हिंदुत्ववादी संगठन मराठा मूक मोर्चे के दलित-विरोधी तेवरों की अनदेखी नहीं कर सकते थे. लेकिन उनके लिए इसके समर्थन में सीधे सीधे खड़े होना भी संभव नहीं था क्योंकि संघ ख़ुद को जातीय विभाजन से ऊपर हिंदू समाज का प्रतिनिधि संगठन मानता है.

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'हिंसा की कड़ी निंदा'

दूसरे ऐसी दलित-विरोधी पोज़ीशन के चुनावी नुक़सान ज़्यादा हैं. इसलिए इस काम के लिए पुणे के आसपास सक्रिय फ़्रीलांस हिंदुत्ववादियों को सामने लाया गया, ताकि मराठा समाज में फैले दलित-विरोधी भाव को आवाज़ दी जा सके और सीधे सीधे दलित-विरोधी होने के आरोप भी न लग पाए.

आपने ग़ौर किया होगा कि जब तक पुणे और उसके आसपास दलित-विरोधी माहौल बन रहा था तब तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से सुलह-सफ़ाई का कोई स्पष्ट बयान या अपील नहीं आई.

पर जब दलितों पर भगवा झंडा लेकर चलने वालों की भीड़ के हमले की ख़बरें आईं और 'महाराष्ट्र में दलितों और हिंदुओं के बीच संघर्ष' जैसी हेडलाइन बनने लगीं तो संघ के प्रचार प्रमुख डॉक्टर मनमोहन वैद्य ने बिना समय गँवाए बयान देकर 'हिंसा की कड़ी निंदा' की और इसे हिंदू विरोधी तत्वों का काम बताया.

प्रसंगवश, इन्हीं मनमोहन वैद्य ने जनवरी 2017 में पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव से पहले संघ के एक अधिकारी के हवाले से आरक्षण ख़त्म करने की पैरवी की थी.

उन्होंने कहा था, "किसी भी राष्ट्र में आरक्षण का प्रावधान रहे ना, ये अच्छा नहीं है. जल्द से जल्द इसकी आवश्यकता निरस्त करके सबको समान अवसर देने की व्यवस्था होनी चाहिए."

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जिग्नेश जैसे दलित नेता

बीच बीच में आरक्षण के ख़िलाफ़ बयान देते रहने से संघ ऊँची जातियों की सहानुभूति बरक़रार रखने का इंतज़ाम करता है. साथ ही रामविलास पासवान, रामदास अठावले और उदित राज जैसे दलित नेताओं को साथ रखने से बीजेपी की पुरानी ब्राह्मण-बनिया पार्टी वाली छवि बदलती है और दलितों के समर्थन की गारंटी भी रहती है.

पर संघ परिवार और बीजेपी को मालूम है कि जिग्नेश मेवाणी जैसे 'वामपंथी' सोच वाले दलित युवा का चुनाव जीतकर गुजरात विधानसभा में पहुँच जाना उनके लिए बहुत शुभ संकेत नहीं है.

जिग्नेश मेवाणी और सहारनपुर के चंद्रशेखर आज़ाद 'रावण' जैसे दलित नेता हिंदुत्व के गले की फाँस बन गए हैं. ये फाँस निकाली जाए तो ख़ून रिसता है और अगर इसे जस की तस रहने दें तो बहुत टीसता है. पर इस फाँस को बेअसर करना संघ परिवार के लिए बेहद ज़रूरी है.

अब तक ऐसे मामलों में 'देशद्रोही' का टैग कारगर साबित हुआ है. पर कब तक?

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