नज़रिया: आंबेडकर की विरासत संभाल पाएंगे उनके पोते?

  • 7 जनवरी 2018
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Image caption प्रकाश आंबेडकर

भीमा कोरेगांव में हिंसा और उसके बाद शुरू हुए विवाद के बाद कहा जा रहा है कि महाराष्ट्र की राजनीति नया मोड़ ले सकती है.

भीमा कोरेगांव में उस दिन जमा हुए आंबेडकर समर्थकों को सामाजिक-सांप्रदायिक हिंसा का सामना करना पड़ा.

इसके बाद तीन जनवरी को बुलाए गए महाराष्ट्र बंद में इसका असर भी दिखा.

घटना के ख़िलाफ़ संविधान निर्माता भीमराव आंबेडकर के पोते और भारिप बहुजन महासंघ (बीबीएम) के नेता प्रकाश आंबेडकर ने राज्यव्यापी बंद बुलाया था.

आंदोलन के बाद महाराष्ट्र के अलग-अलग कोनों से आ रही प्रतिक्रियाओं से लगता है कि प्रकाश आंबेडकर को न सिर्फ महाराष्ट्र, बल्कि पूरे देश में उभरते हुए दलित नेतृत्व के तौर पर देखा जा रहा है.

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बाबासाहब के महापरिनिर्वाण के बाद

बाबासाहब आंबेडकर के देहांत के बाद 1960 में महाराष्ट्र एक प्रदेश के तौर पर वजूद में आया.

तत्कालीन मुख्यमंत्री यशवंतराव चव्हाण ने अपने भाषण कहा था कि समाज में दलित और सवर्ण के बीच का भेद ख़त्म होना चाहिए और दोनों समुदाय के बीच सामंजस्य होना चाहिए.

इसी के बाद महाराष्ट्र में दलित पैंथर आंदोलन शुरू हो गया, जिसके बाद कुछ दलित नेता उभरे.

बीसी कांबले, नामदेव ढसाल, रामदास आठवले, रा. सु. गवई, जोगेंद्र कवाडे जैसे कई नेता सामने आए, जिन्होंने एक स्वतंत्र एजेंडे के साथ अपनी पार्टियों और समूहों की स्थापना की.

इसी बीच प्रकाश आंबेडकर ने भारतीय रिपब्लिकन पक्ष (भारिप) की स्थापना की और अपना जनाधार बढ़ाने की कोशिशें शुरू कीं.

लगभग 1985 का वक़्त था, जब प्रकाश आंबेडकर दलित संगठनों और राजनीति के केंद्र बन गए और दलित राजनीति को एक नया मोड़ मिला.

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रिपब्लिकन एकता और अंतर्गत कलह

आज अगर हम दलित राजनीति की ताक़त को देखते हैं तो यह देखना भी दिलचस्प होगा कि बीते 30 साल में दलित राजनीति में क्या बदलाव आए.

साल 1990 में रिपब्लिकन पक्ष के अलग-अलग गुटों में एकता स्थापित करने का प्रयास हुआ था.

स्वतंत्र इच्छा न होते हुए भी तब कई नेताओं को एक दूसरे के साथ जाना पड़ा था. 1995-96 तक ये रिपब्लिकन गुट साथ में रहे और उनके बीच एक समन्वय बना रहा.

लेकिन फिर उनमें तनातनी हुई और वे बिखर गए. यही समय था जब प्रकाश आंबेडकर वामपंथी समाजवादी आंदोलन से जुड़ गए.

1990 में शरद पवार से जुड़े रामदास आठवले 2009 तक उनके साथ बने रहे.

आठवले, आंबेडकर, जोगेंद्र कवडे और आरएस गवई- सोनिया गांधी और शरद पवार की अगुवाई वाले ये सभी रिपब्लिकन गुट के नेता सत्ता में शामिल हुए.

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भाजपा और दलित

लेकिन 2009 में ये सिलसिला उस वक्त रुका जब आठवले शिरडी से लोकसभा का चुनाव हार गए. इस हार से आम दलित मतदाताओं और नेताओ को ठेस पहुंची.

चुनाव के बाद मीडिया से बात करते हुए शरद पवार ने कहा कि आठवले की हार हमारे लिए शर्मिंदगी की बात है.

जिस अहमदनगर में दलितों पर अत्याचार की घटनाएं बढ़ी थीं उसी ज़िले में कांग्रेस-एनसीपी गठजोड़ के समर्थन के बाद भी आठवले हर गए थे.

लिहाज़ा 2009 के विधानसभा चुनाव के वक़्त आठवले ने पलटी मारी और वह शिवसेना के साथ चले गए.

महाराष्ट्र में बीते दस साल से दलित राजनीति आंबेडकर और आठवले के इर्द-गिर्द ही घूमती रही है. भाजपा के साथ हाथ मिलाकर आठवले को राज्यमंत्री का पद मिल गया.

उनके इस फैसले से आम दलितों में नाराज़गी है. पर अब भी आठवले के पीछे जनाधार है और इस बात को हम ख़ारिज़ नहीं कर सकते.

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आंबेडकर नई उम्मीद?

दलित सियासत हमेशा इस सवाल से जूझती रही है कि संसदीय राजनीति से दूर रहकर कब तक जनांदोलन चलाए जाएं.

प्रकाश आंबेडकर की भूमिका अलग है. वह लेफ्ट, सोशलिस्ट और दलितों की सारी पार्टियों को साथ लेकर चलना चाहते हैं.

शेतकरी कामगार पक्ष के जयंत पाटिल, लेफ्ट के अशोक ढवले, प्रकाश रेड्डी और जनता दल के कई नेता उनके साथ हैं.

लगभग छोटे मोटे 25 संगठन उनके साथ हैं. कांग्रेस और भाजपा से उन्होंने एक दूरी बनाकर रखी है.

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25 साल की सियासत

यह बात स्वीकार करनी चाहिए कि भीमा कोरेगांव हमले के विरोध में आंबेडकर ने जो बंद बुलाया था, उसमें उन्हें प्रदेश के सभी दलितों का साथ मिला.

सोशल मीडिया पर आठवले के मंत्री पद स्वीकारने पर उनका विरोध किया जा रहा है. लिहाज़ा प्रकाश आंबेडकर की अगुवाई के एक 'स्पेस' की गुंजाइश तो है.

आठवले गुट के दूसरे नेताओं की प्रदेश में कहीं चर्चा नहीं होती. जोगेंद्र कवडे के अलावा उनके गुट का का दूसरा नेता भी नहीं दिखता.

नामदेव ढसाल की मौत के बाद दलित पैंथर संगठन भी रिपब्लिकन गुटों जैसे हो गए.

प्रकाश आंबेडकर के अलावा जितनी भी दलित पार्टियां हैं उनकी राजनीति 'नवबौद्ध' समाज को ध्यान में रखकर है और वही उनकी सीमा है.

लेकिन प्रकाश आंबेडकर ने इस दायरे को बढ़ाया है. वामपंथी और समाजवादी धारा के साथ मिलकर वह 25 साल से सियासत कर रहे हैं.

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सिद्धांतवादी राजनीति

असल सवाल यही है कि क्या महाराष्ट्र में मराठा समुदाय के असर वाली राजनीति और माहौल में वो दलित राजनीति के अगुवा बन सकते हैं?

हालांकि आज कुल मिलाकर माहौल उनके अनुकूल है. गुजरात के जिग्नेश मेवाणी जैसे नौजवान दलित नेता बिलाशक उनके समर्थन में रहेंगे.

पर संसदीय राजनीति में आंकड़े महत्वपूर्ण हैं और भाजपा ने उसे ही ध्यान में रखकर रणनीति बनाई है.

भीमा कोरेगांव के संघर्ष और महाराष्ट्र बंद आंदोलन के दौरान नौजवानों की बेरोज़गारी की समस्या भी एक बार फिर सामने आई है.

यह एक बड़ी चिंता का विषय है और इसीलिए प्रकाश आंबेडकर सिर्फ सिद्धांतवादी राजनीति तक ख़ुद को सीमित नहीं रख सकते.

उन्हें कांग्रेस जैसे व्यापक जनाधार वाली पार्टियों से भी बात करनी होगी. मौजूदा दलित राजनीति और आम दलित की यह ज़रूरत है और संभवत: आकांक्षा भी.

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