असम में किन्नरों को बांग्लादेश भेजे जाने का डर

  • 10 जनवरी 2018
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"हमें तो पहले से ही समाज में घृणा की दृष्टि से देखा जाता है. हर कदम पर अपमान सहना पड़ता है. सरकार की तरफ से कोई भी सुविधा हमें नहीं मिलती और अब हमारे नागरिक होने का हक भी छीन लिया जाएगा."

ये कहना है गुवाहाटी के पांडु स्थित रेलवे कालोनी में रहने वाली 26 साल की ट्रांसजेंडर (किन्नर) काजोली बेगम का.

असम में अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान के लिए अपडेट की जा रही राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण यानी एनआरसी की पहली ड्राफ्ट सूची में कई ट्रांसजेंडर्स के नाम नहीं आए हैं और उनके सामने अपनी नागरिकता गंवाने का संकट खड़ा हो गया है.

इन ट्रांसजेंडर्स में से अधिकतर को उनके परिवार ने घर से निकाल दिया है जबकि कई ने समाज में अपमान की वजह से घर छोड़ दिया है.

ऐसे में इनके पास अपनी नागरिकता से जुड़े पर्याप्त दस्तावेज़ नहीं हैं. लिहाजा कई ट्रांसजेंडर्स ख़ास तौर से जो मुसलमान या फिर बंगाली समुदाय से हैं, एनआरसी को लेकर काफी डरे हुए हैं.

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'हम जैसे हैं, इसमें हमारी क्या ग़लती'

काजोली बेग़म बीबीसी से कहती हैं, "खुदा ने हमको ऐसा बनाया है, इसमें हमारी क्या ग़लती है. 16 साल की थी जब घर वालों ने निकाल दिया. हमारे पास सरकारी दस्तावेज कहां से आएंगे. जब घर वालों से संपर्क ही नहीं रहा. हमारे कई किन्नर साथियों ने तो एनआरसी में अपना नाम दर्ज करवाने के लिए आवेदन ही नहीं किया. क्या उनकी नागरिकता ख़त्म कर दी जाएगी?"

काजोली गुवाहाटी से करीब 60 किलोमीटर दूर मंगलदै के पास कोलोनी गांव की निवासी हैं.

उनके परिवार वालों ने एनआरसी आवेदन के समय उनका नाम भेजा है या नहीं, इस बात की जानकारी हासिल करने हाल ही में वो अपने गांव गईं थीं.

29 साल की शहनाज़ का घर भारत-बांग्लादेश से सटे धुबड़ी ज़िले में हैं. घर से नाता तोड़े शहनाज़ को 15 साल हो गए हैं और अब किन्नर समुदाय ही उनका परिवार हैं. वो कहती हैं, "ट्रेनों में पैसा मांगकर बड़ी मुश्किल से पेट भर रहे हैं. ज़िंदग़ी मुश्किलों से भरी हुई है और अब नागरिकता गंवाने का डर सताने लगा है."

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Image caption नीतूमणि दत्ता

बात करने से कतराते हैं लोग

पर्याप्त दस्तावेज न होने के कारण शहनाज़ की तरह नलबाड़ी की रहने वाली शीला और नगांव की रहने वाली रिज़वाना ने भी एनआरसी में नाम दर्ज करवाने के लिए आवेदन नहीं किया है. ये लोग एनआरसी को लेकर अब बात करने से भी कतराते हैं.

असम सरकार ने पिछले 31 दिसंबर की आधी रात को एनआरसी का पहला मसौदा जारी कर दिया था.

नागरिकों की इस नई सूची में उन्हीं लोगों के नाम शामिल किए गए हैं, जिन्होंने 25 मार्च 1971 के पहले की भारतीय नागरिकता से जुड़े सरकारी दस्तावेज़ जमा करवाए हैं. हालांकि अभी एक संपूर्ण अपडेट एनआरसी प्रकाशित नहीं हुई है, क्योंकि अभी काफी दस्तावेजों के वेरिफिकेशन का काम चल रहा है.

असम में हैं 5400 से ज़्यादा ट्रांसजेंडर

इन ट्रांसजेंडरों की एसोसिएशन से जुड़ी स्वाति विधान बरुआ कहती हैं, "सुप्रीम कोर्ट ने साल 2014 में संविधान के तहत ट्रांसजेंडरों के अधिकारों की सुरक्षा के मक़सद से जो फैसला दिया था उसकी अवमानना नहीं होनी चाहिए."

उन्होंने कहा, "कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिया था कि ट्रांसजेंडर्स को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा वर्ग समझा जाए और शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश और सार्वजनिक नियुक्तियों में आरक्षण देने के लिए कदम उठाए जाए. "

"लेकिन इस दिशा में ट्रांसजेंडरों के लिए कुछ नहीं किया गया. बल्कि अब ये लोग अपनी नागरिकता गंवाने की कगार में आ गए हैं."

"सरकार को यह सोचना होगा, क्योंकि इन ट्रांसजेंडरों के पास नागरिकता से जुड़े दस्तावेज नहीं हैं. इसलिए सरकार को इन्हें भारतीय नागरिक की श्रेणी में रखना होगा. इनकी नागरिकता को सुरक्षित करना सरकार की जिम्मेदारी है."

स्वाति ने बताया कि एसोसिएशन की तरफ से उन्होंने एनआरसी कार्यालय से सहायता मांगी है ताकि इन लोगों की नागरिकता को बचाया जा सके.

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Image caption स्वाति

किन्नरों को बांग्लादेश भेजे जाने का डर

वो आगे कहती हैं, "एनआरसी को लेकर कई ट्रांसजेंडरों ने मुझसे बात की है. काफी लोगों के नाम एनआरसी ड्राफ्ट की पहली सूची में नहीं हैं. इन किन्नरों के गुरुओं के नाम भी नहीं आए हैं. अब इनके अंदर डर समा गया है कि एनआरसी में नाम न होने से कहीं सरकार इन्हें बांग्लादेश डिपोर्ट न कर दे."

गुवाहाटी के नूनमाटी इलाक़े में कभी अपने परिवार के साथ रह चुकीं 29 साल की ट्रांसजेंडर नीतूमणि दत्ता का कहना है, "मैं असमिया हूं, असम में पैदा हुई, मुझे यहां से कौन निकालेगा."

वो कहती हैं, "घर छोड़ने के बाद से मैं ख़ुद कमा रही हूं और अपना पेट भर रहीं हूं. एक किन्नर घर वालों के साथ नहीं रह सकता. इसलिए मैं एनआरसी के लिए आवेदन नहीं कर सकी. लेकिन मैंने पिछले विधानसभा चुनाव में वोट डाला था. दुख की बात यह है कि मैं थर्ड जेंडर हूं पर मतदाता सूची में मेरा नाम पुरुष वर्ग में था."

"दुनिया में इतना अपमान सहने वाला शायद दूसरा कोई इंसान नहीं होगा. ऐसे दिन की उम्मीद ही नहीं हैं जब कोई किन्नरों से इज़्ज़त से बात करेगा."

पढ़ें- नए नागरिक पंजीकरण से हटेगा ‘बांग्लादेशी’ का लेबल?

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नाम बदलना भी है परेशानी की वजह

ट्रांसजेंडरों के लिए काम कर रहे 'घरूवा' नामक गैर सरकारी संगठन के प्रमुख आशीष कुमार डे का कहना है, "अधिकतर ट्रांसजेंडरों का नाम मतदाता सूची में ही नहीं है."

"इसलिए जो लोग एनआरसी के काम को लेकर सर्वे कर रहे थे वे इन लोगों तक पहुंचे ही नहीं. इसकी एक वजह यह भी है कि जब कोई भी ट्रांसजेंडर अपना घर छोड़कर ट्रांसजेंडरों की समुदाय में शामिल होता है तो वहां के गुरु उनका नाम बदलकर अलग नाम रख देते है और उनके पुराने नाम से कोई मतलब नहीं रहता."

"जब ये लोग हलफनामे के ज़रिए अपना नाम बदलते हैं तो फिर नए सिरे से सरकारी दस्तावेजों में नया नाम दर्ज करवाने में काफी दिक्कत आती है और कई जगह उनका छूट जाता है."

'मसलों का हल निकालेंगे'

हालांकि एनआरसी का काम देख रहे अधिकारी ने कहा कि वह इस समस्या का हल निकालेंगे.

एनआरसी अपडेट के राज्य समन्वयक प्रतीके हजेला ने कहा, "ट्रांसजेंडर समुदाय की तरफ से हमसे संपर्क किया गया है. हम उनसे जल्द ही बात करेंगे. उनके साथ लीगेसी लिंकेज की समस्या है. हम उनके साथ बैठकर जो भी उनकी परेशानी है उन मामलों का हल निकालेंगे. केवल ट्रांसजेंडर ही नहीं, जो वास्तविक भारतीय नागरिक है उनका नाम एनआरसी में शामिल करना हमारी ज़िम्मेदारी है."

बांग्लादेशी घुसपैठ के ख़िलाफ़ 1979 से छह साल तक चले आंदोलन के बाद 1985 में भारत सरकार ने ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (आसू) के साथ जो समझौता किया था, उसी की शर्त के अनुसार असम में एनआरसी को अपडेट किया जा रहा है. एनआरसी अपडेट का काम सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो रहा है.

इस मसौदे की पहली सूची में 1 करोड़ 90 लाख लोगों के नाम प्रकाशित किए गए हैं. जबकि प्रदेश के 3 करोड़ 29 लाख लोगों ने इस नई राष्ट्रीय नागरिक पंजी में अपना नाम दर्ज करवाने के लिए आवेदन किया था.

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