भीमा कोरेगांवः आग बुझ गई, राख बाक़ी है

  • 10 जनवरी 2018
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भीमा कोरेगांव में हालात सामान्य हो रहे हैं. नए साल पर हुए हिंसक संघर्ष के बाद पुणे ज़िले का ये छोटा सा क़स्बा देशभर में चर्चा का विषय बन गया है.

पुलिसवालों के साये में गांव में शांति लौट रही है. यहां के लोग ज़िंदगी को वहीं वापस लाने की कोशिश कर रहे हैं जहां वो हिंसा से पहले छूट गई थी.

उनकी दुकानों और घर तोड़ दिए गए थे. कुछ लोग जो अभी भी डरे हुए हैं, अपने घर वापस नहीं लौटे हैं.

अशोक और रमा भीमा कोरेगांव से क़रीब पांच किलोमीटर दूर स्थित सानसवाड़ी नाम की एक बस्ती के रहने वाले हैं.

अशोक ने अपनी बीवी और बच्चों के साथ पुणे शहर में पनाह ली है.

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नहीं लौटना चाहते...

शुरुआत में वो बुद्धविहार इलाक़े में रह रहे थे और अब एक रिश्तेदार के घर हैं.

वो नहीं जानते कि वो अब यहां से कहां जाएंगे लेकिन एक बात पक्की है कि वो अब सानसवाड़ी नहीं लौटेंगे.

आंखों में आंसू लिए रमा अठावले कहती हैं, "हम सानसवाड़ी में बीते बीस सालों से शांतिपूर्व ख़ुशहाल जीवन जी रहे थे. हमने कभी जाति को अपने जीवन पर हावी नहीं होने दिया. हर वर्ग के लोग आपस में घुलमिल कर रहते और एक दूसरे के पर्वों में हिस्सा लेते. लेकिन अब ये गुज़रे ज़माने की बात है. अब हमारे पास कुछ नहीं बचा है. सब कुछ जलकर राख हो गया है. अब हम सानसवाड़ी नहीं लौटना चाहते. अब हमें किसी पर विश्वास नहीं है. हम वापस नहीं लौटेंगे."

वो अब ज़िलाधिकारी कार्यालय में अपने मामले की फ़रियाद लेकर जा रही हैं. अठावले परिवार ने सोमवार को पुणे के ज़िलाधिकारी सौरभ राव से मुलाक़ात की थी.

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भीमा कोरेगांव

अठावले परिवार ने प्रशासन से सानसवाड़ी के अलावा कहीं भी बसाने की अपील की है. उनके अपने गांव में जो व्यवहार उनके साथ हुआ है वो उसे भूल नहीं पा रहे हैं.

रमा कहती हैं, "मेरा छोटा सा कारोबार था. किराना दुकान के अलावा हम फ़ैब्रीकेशन वर्कशॉप चलाते हैं. सबके साथ हमारे संबंध अच्छे थे. हम पंचशील बौद्ध ट्रस्ट के बैनर तले सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करते रहे हैं. गांव में मैंने मुफ़्त लाइब्रेरी भी शुरू की है. गांववालों ने मेरी बहुत मदद भी की थी. मैं अभी भी समझ नहीं पा रही हूं कि एक रात के भीतर ही सबकुछ कैसे बदल गया."

उस दिन के घटनाक्रम को याद करते हुए अशोक कहते हैं, "1818 के युद्ध में मारे गए लोगों को श्रद्धांजली देने भीमा कोरेगांव आ रहे लोगों के लिए इस साल भी हमने मुफ्त स्नैक्स की व्यवस्था की थी. हमने सुबह सात बजे शुरुआत की थी और 11 बजे तक सबकुछ सामान्य था. फिर कोरेगांव में दंगा होने की ख़बर आई, हमने भी सुना कि एक व्यक्ति की दंगे में मौत हो गई है. सानसवाड़ी में हालात अचानक ही बदल गए. पत्थरबाज़ी होने लगी, कारों में आग लगा दी गई. दोनों ओर से लोग एक दूसरे को निशाना बनाने लगे."

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हम गांव से भाग गए...

अशोक बताते हैं, "हम इस विवाद में पड़ना नहीं चाहते थे. मैंने दुकान बंद कर दी और अंदर ही बैठ गया. कुछ देर बाद मेरे पास कॉल आया कि मैं अपने समुदाय के लोगों को शांत करूं. जब पुलिस ही कुछ नहीं कर पा रही थी तो मैं क्या कर सकत था? दूसरी ओर से बात कर रहे व्यक्ति ने धमकी दी कि अगर मैं नहीं आया तो मेरे घर को आग लगा दी जाएगी. मैंने अपना फ़ोन बंद कर लिया. क़रीब तीन साढ़े तीन हज़ार लोगों की भीड़ मेरे घर की ओर बढ़ रही थी. सबकुछ लूट लिया गया."

"हम अपने घर के पिछले दरवाज़े से बाहर निकले. मैंने अपने बच्चों को आगे कर रखा था. पास की ही नदी के तट पर हम छुप गए. हालात का जायज़ा लेने के बाद हम गांव से भाग गए. जब हम बाहर निकल रहे थे तब एक व्यक्ति ने मुझे पहचान लिया. उसने मुझे पकड़ लिया और पीटना शुरू कर दिया. किसी तरह मैं उसकी पकड़ से छूटकर भागने में कामयाब रहा."

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हिंसा के ज़ख़्म ताज़ा

अशोक का इस इस समय पुणे के एक अस्पताल में इलाज चल रहा है. उनकी पत्नी रमा ने शिकारपुर पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज करवा दी है.

अशोक का बयान दर्ज कर लिया गया है और पुलिस ने मौक़े का मुआयना भी किया है.

भीमा कोरेगांव में एक सप्ताह बाद भी हिंसा के ज़ख़्म ताज़ा हैं. बड़ी संख्या में पुलिस बल गांव में मौजूद हैं जो गश्त कर रहे हैं.

स्थानीय पुलिस और राज्य की रिज़र्व पुलिस ने इस गांव को अपना गढ़ सा बना लिया है. फ़ायर ब्रिगेड की गाड़ियों को भी तैनात किया गया है.

पुलिस वाहन चौबीस घंटे मौजूद हैं. होटल और दुकानों खुल गई हैं लेकिन इसके बावजूद तनाव को महसूस किया जा सकता है.

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सानसवाड़ी की आबादी

भीमा कोरेगांव में नदी पार करने के बाद ये अंदाज़ा लग जाता है कि उस दिन यहां क्या हुआ होगा. जली हुई गाड़ियां इधर-उधर पड़ी हैं.

टूटी खिड़कियों ने मकानों को भुतहा सा बना दिया है. साप्ताहिक बाज़ार फिर से खुल गया है. कई लोग इमारतों पर रंग कराकर उस दिन के निशानों को मिटा देना चाहते हैं.

सानसवाड़ी कोरेगांव से पांच किलोमीटर आगे है. यहां भी हिंसा के बाद के हालात को महसूस किया जा सकता है. यहां कई ओद्योगिक इकाइयां भी हैं.

इसी वजह से सानसवाड़ी की आबादी काफ़ी बढ़ गई है. यहां बुद्ध विहार क़रीब एक एकड़ में फैला है जिसके भीतर एक स्पोर्ट्स कांप्लेक्स भी है.

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पुलिस सुरक्षा

86 वर्षीय दलित अधिकार कार्यकर्ता सुदम पवार इसकी देखभाल करते हैं. वो इसी प्रांगण में रहते हैं. वो बाबा साहेब आंबेडकर से व्यक्तिगत रूप से मिले थे.

यहां उनकी काफ़ी पहचान है. एक जनवरी की हिंसा देखने के बाद वो बाहर गए और मंत्रालय में अधिकारियों से भी मुलाक़ात की है. हमने उनसे सानसवाड़ी में ही मुलाक़ात की.

उनके घर पर भी हिंसा के निशान हैं. अब वो पुलिस सुरक्षा में रह रहे हैं.

पवार याद करते हैं, "क़रीब छह बजे हमने झड़पों के बारे में सुना. लोग इधर उधर भाग रहे थे. अचानक हमने अपने दरवाज़े पर लोगों को धक्के मारते हुए सुना. हमने अपना दरवाज़ा बंद कर लिया. भीड़ दरवाज़ा तोड़ने की कोशिश कर रही थी. हम बहुत डर गए थे. भीड़ ने हमारे घर के दरवाज़े और खिड़कियां तोड़ दीं. फिर वो हमारे खेतों की ओर भागे. रास्ते में जो गाड़ियां आईं उन्हें तोड़ दिया गया. हमारे खेत में आग लगा दी गई. हमने पुलिस को सूचना दी. पुलिस के हूटर की आवाज़ सुन कर वो भाग गए. हम नहीं जानते कि वो लोग कौन थे."

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Image caption दलित अधिकार कार्यकर्ता सुदम पवार

आम लोग प्रभावित

पवार के बेटे और नाती-पोते मुंबई में रहते हैं लेकिन हिंसा के दिन वो सब सानसवाड़ी में ही थे. वो अब भी उन्हीं के साथ रह रहे हैं.

पवार कहते हैं कि पहले उनकी चाल में चौदह-पंद्रह लोग रहते थे, अब सिर्फ़ 4-5 ही बचे हैं.

पवार कहते हैं, "मैं यहां बीते 25 सालों से रह रहा हूं. सभी गांव वाले से मेरे रिश्ते अच्छे हैं. यहां कभी भी इस तरह की हिंसा नहीं हुई थी. मैं अभी भी समझ नहीं पा रहा हूं कि ये सब कैसे हो गया. मैं सानसवाड़ी छोड़कर नहीं जाउंगा."

कोरेगांव और सानसवाड़ी में हुई हिंसा से सबसे ज़्यादा आम लोग प्रभावित हैं. वो लोग जिनका इस हिंसा से कोई संबंध नहीं था. ना वो किसी संगठन से जुड़े हैं ना किसी राजनीतिक दल से.

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मीडिया और पुलिस

कोरेगांव और सानसवाड़ी के बीच एक होटल पर शुरुआत में लोग बात करने से झिझक रहे थे. मीडिया और पुलिस की मौजूदगी में तनाव बरक़रार था. लेकिन फिर लोगों ने अपनी बात कही, लेकिन पहचान छुपाकर.

एक होटल मालिक ने बताया, "उस दिन सबकुछ बंद था, हम अपने घर में क़ैद थे. लेकिन दोपहर को हालात तेज़ी से बिगड़ गए. कुछ लोगों ने होटल में भी घुसने की कोशिश की, लेकिन वो शटर को नहीं उठा सके. हम बड़े नुक़सान से बच गए. लेकिन बाहर रखा काउंटर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया."

एक बुज़ुर्ग ने बताया, "ज़्यादातर गांववाले अपने नुक़सान का हिसाब लगाने में व्यस्त थे. कई वाहनों को नुक़सान पहुंचाया गया था. बेक़ाबू भीड़ तोड़फोड़ कर रही थी, लोग डरे हुए थे. कुछ लोगों ने अपनी प्रॉपर्टी बचाने की कोशिश की. हमने कुछ महिलाओं को शरण दी जो कोरेगांव के शहीदों को श्रद्धांजली देने आईं थीं. वो सब बहुत डरी हुईं थीं."

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कोरेगांव के नज़दीक

उस बुजुर्ग का कहना था, "गांव के बहुत से लोगों का इससे कोई संबंध नहीं है लेकिन फिर भी वो प्रभावित हुए हैं. अब लोग हमारे गांव को बुरे कारणों से जानते हैं. हम तो इस बारे में अपनी राय भी ज़ाहिर नहीं कर सकते."

बहुत से लोगों के पास सुनाने के लिए एक जैसी ही कहानियां थीं. कोरेगांव के नज़दीक हाइवे पर हमारी मुलाक़ात एलविन फर्नांडिस से हुई.

वो फ़ाइबर कलाकृतियों के अपने काम से पहचाने जाते हैं. उनका स्टूडियो एक खुले मैदान के पास है. एक समय ये यहां की पहचान हुआ करता था अब यहां बस राख ही बची है.

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आंबेडकर की पेंटिंग

एलविन फ़र्नांडिस कहते हैं, "मैं किसी काम से पुणे गया था. दोपहर को मेरे पास फ़ोन आने लगे. लोग हालात के बारे में बता रहे थे. मैं 12 किलोमीटर तक पैदल चला, भीड़ से होते हुए यहां पहुंचा. जब तक मैं यहां पहुंचा सबकुछ खो चुका था. मेरे पड़ोसियों ने किसी तरह कुछ कलाकृतियों को पास के कमरे में पहुंचाया. अब मेरे पास बस यही बचा है. मेरा क़रीब 70 लाख रुपए का नुक़सान हो गया है."

एलविन फ़र्नांडिस ने तीन साल पहले कोरेगांव में ये स्टूडियो स्थापित किया था. लेकिन वो पूरे महाराष्ट्र में काम करके कलाकृतियां बना रहे थे. पुणे के पास पिंपरी में उन्होंने ही डॉक्टर बाबासाहेब आंबेडकर की पेंटिंग बनाई है.

उन्होंने शिवाजी के जीवन पर आधारित कलाकृति शिवऋष्टी भी बनाई है. एलविन फ़र्नांडिस कहते हैं कि ये दोनों ही काम मेरे दिल के बहुत क़रीब थे.

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