BBC SPECIAL: गोरखपुर की मांओं का दर्द- हमार बाबू अब कुछ बोलत नहीं

  • 13 जनवरी 2018
सोनमती
Image caption सोनमती, जिनकी चार साल की बिटिया महिमा की 14 अगस्त को इंसेफेलाइटिस से हुई मौत

गोरखपुर अंचल में यात्रा करते हुए ऐसा लगता है जैसे इस साल यहां इंसेफेलाइटिस का शिकार हुए बच्चों की मौत का दुख जनवरी की शीत में घुलकर खेतों में बिखरा पड़ा है.

यूं तो यहां इंसेफेलाइटिस और इससे जुड़ी तमाम मेडिकल जटिलताओं की वजह से होने वाली हज़ारों बच्चों की सालाना मौत का सिलसिला दशकों पुराना है. पर खस्ताहाल अस्पतालों और इस महामारी के प्रकोप के हाथों हर साल अपने बच्चे खो रही गोरखपुर की मांओं के लिए इंसेफेलाइटिस का हर नया आंकड़ा हमेशा से एक ताज़ा निजी ज़ख्म रहा है.

गोरखपुर की इन मांओं से बात करके मुझे लगा जैसे उनके आंसुओं में लिपटा हुआ गोरखपुर का दुख, जनवरी के कोहरे के साथ-साथ अवसाद बनकर पूरे इलाक़े में फैल रहा है.

अगस्त 2017 में गोरखपुर के बाबा राघवदास (बीआरडी) मेडिकल कॉलेज में अचानक हुई ऑक्सीजन की कमी से पांच दिनों के भीतर 72 बच्चों की मौत हो गई थी.

Image caption सोनमती

नहीं थमा मौत का सिलसिला

इस घटना ने क्षेत्र में इंसेफेलाइटिस के साथ साथ स्वास्थ्य, सफाई और चिकित्सा के वषों से ध्वस्त पड़े ढांचे की तरफ सरकार और राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान तो आकर्षित किया, पर बीआरडी मेडिकल कॉलेज में बच्चों की मौतों का सिलसिला नहीं थमा.

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गोरखपुर में मरने वाले बच्चों की माओं से जानिए...इन मौतों के आंकड़ों में बदलने की कहानी.

दिसंबर 2017 तक बीआरडी मेडिकल कॉलेज में इंसेफेलाइटिस के 2240 मरीज़ भर्ती हुए, जिनमें से 505 की मौत हो गई. इन मरीज़ों में ज़्यादातर नवजात शिशुओं से लेकर 15 साल की आयु तक के बच्चे थे.

गोरखपुर अंचल में मारे गए इन बच्चों की मांओं के पथरीले चेहरों पर आज भी वही गहरी उदासी चिपकी हुई है, जिसे आज से लगभग 82 साल पहले मशहूर चित्रकार अमृता शेरगिल ने गोरखपुर में ही बनाई गई अपनी तस्वीर 'मदर इंडिया' में उतारा था.

29 वर्षीय रामसनेही गोरखपुर के खजनी विधानसभा क्षेत्र में बसे सराय तिवारी गांव में अपनी पत्नी सोनमती और तीन बच्चों के साथ रहते हैं.

कुछ महीने पहले तक रामसनेही 4 बच्चों के पिता थे पर 14 अगस्त 2017 को उनकी 4 साल की बच्ची महिमा की एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एइएस) से मौत हो गई. पेशे से बेलदार रामसनेही घर चलाने के लिए मजदूरी करते हैं पर इन सर्दियों में उन्हें कोई काम नहीं मिला.

गांव के अंतिम छोर पर मौजूद अनुसूचित जाति के मोहल्ले या 'टोले' में बनी उनकी एक कमरे की झोपड़ी में सन्नाटा पसरा हुआ था.

अपनी खाली रसोई के सामने नारंगी रंग की चमकीली साड़ी पहने सोनमती उस पूरे माहौल के विरोधाभास को खुद में समेटे हुए खामोश बैठी थीं.

Image caption रामसनेही अपनी पत्नी सोनमती के साथ

'पकौड़ी मांगने वाली बिटिया चीखकर बेहोश हो गई'

महिमा के बारे में पूछने पर काफी देर वो खामोश रही. फिर अपनी काजल भरी आंखों में आंसू भरकर बोली, "एक भी दिन ऐसा नहीं जाता जब हमको महिमा की याद नहीं आती. उस दिन ठीक थी वो...सारा दिन अच्छे से खेली कूदी रोज़ की तरह. रात को हमसे बोली की माँ पकौड़ी छान दो, हम पकौड़ी खाएंगे.''

''रात हो गया था, तो हमने कहा बाबू बिहाने (सुबह) छान देंगे पकौड़ी. तो कुछ नहीं बोली और सो गई चुपचाप. रात को 10.30 बजे अचानक उठी और कपार (सिर) पकड़ कर ज़ोर से चीखी. नीचे वहीं उसके भाई-बहन सो रहे थे. चीखकर वो बेहोश हो गयी और अपने भाइयों के ऊपर गिर गयी. जब हमने उसको गोद में उठाया तो उसके हाथ पांव पूरे अकड़े हुए थे और आखों की पुतलियाँ ऊपर थीं. शरीर तेज़ बुखार से तप रहा था.''

इतना कहकर सोनमती सिसकियां लेकर रोने लगीं और बगल में बैठे रामसनेही की आखों में भी आंसू आ गए.

एक ग्लास पानी पीने के बाद रामसनेही बताते हैं, "हम दोनों बच्ची को दुपहिया पर लेकर तुरंत 22 किलोमीटर दूर बने जिला अस्पताल पहुंचे. वहां उसको सुई लगाई और तुरंत बीआरडी मेडिकल रेफर कर दिया. हम उसको लेकर वहां से गोरखपुर शहर भागे. रात को 1 बजे तक हम उसे गोरखपुर मेडिकल कालेज ले आए थे. तबीयत खराब होने के तीन घंटे के भीतर मेडिकल कालेज में उसके कागज़ पत्तर भी बन गए थे और उन्होंने उसे तुरंत आईसीयू में भर्ती कर लिया. कुछ ही दिन पहले ऑक्सीजन की कमी से 70 बच्चे मरे थे, अस्पताल में इसलिए तब बड़ी कड़ाई थी. अफसर मीडिया सब थे वहां. हमारे बच्चे को ठीक से देखा गया. पर बच्ची बची नहीं. झटका आने के 24 घंटे के भीतर उसी रात उसकी मौत हो गई."

एइएस इंसेफेलाइटिस का एक घातक प्रकार

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, गोरखपुर अंचल में इंसेफेलाइटिस से होने वाली कुल मौतों में अस्सी फीसदी मौतें एइएस यानी एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम से ही होती हैं.

एइएस गंदे पानी, फफूंदी वाला दूषित भोजन, पानी में खड़े खेतों में मौजूद कीटाणुओं से भी फैलता है. मच्छर के काटने से होने वाले जापानी इंसेफेलाइटिस से इतर एइएस एक तरह का तेज़ दिमागी बुखार है, जिसमें मरीज़ में सुस्ती, बेहोशी और विक्षप्त व्यवहार जैसे लक्षण पाए जाते हैं.

ज्यादातर 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों को अपना शिकार बनाने वाले एइएस बुखार से आंशिक या पूर्ण विकलांगता के साथ-साथ मौत भी हो सकती है.

सराय तिवारी गांव के जिस मोहल्ले में रामसनेही और सोनमती रहते हैं, वह खुली नालियों, गंदे पानी के खुले तालाबों, कूड़े और गोबर के ढेरों से भरा हुआ था.

गोरखपुर अंचल में भूमिगत पानी का स्तर सामान्य से ऊपर है इसलिए ज्यादातर यहां के लोग पीने के लिए कम गहराई पर खुदे हुए हैंडपंप और नलों के पानी का इस्तेलाम करते हैं.

घरों के चारों तरफ फैले गंदे नालों और तालाबों का पानी अक्सर पास बने हुए पीने का पानी देने वाले नलों और हैंडपम्पों के भूमिगत पानी में घुलकर, उसे प्रदूषित कर देता है. इस संक्रमित पानी को पीने से एइएस फैलता है.

गंदे नाले के पास बने हैंडपंप से पानी

पीने के पानी को प्रदूषित होने से बचाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने गोरखपुर अंचल के हर गांव में 80 फ़ीट गहराई वाले हैंडपम्पों को बनाने और हर घर में शौचालय की व्यवस्था करने की योजना शुरू की थी. पर रामसनेही के गांव में बनाया गया सरकारी पम्प काम नहीं करता. उनके घर में शौचालय भी नहीं है.

रामसनेही का परिवार आज भी गांव के गंदे नाले के पास बने हैंडपंप से पानी पीने को मजबूर है.

मैंने देखा कि तालाब के किनारे से लेकर गांव से बाहर निकलने का पूरे रास्ता खुले में शौच के लिए इस्तेमाल किया जाता है. गांव के बाहर बने प्राइमरी स्कूल के सामने बना खाली मैदान भी खुले में शौच की दुर्गंध से बजबजा रहा था.

रामसनेही ने बताया कि उनकी बच्ची की मौत के बाद पहली बार उनके गांव में जापानी इंसेफेलाइटिस के मच्छरों को मारने के लिए दवा का छिड़काव हुआ पर एइएस को रोकने के लिए साफ़ पानी और शौचालयों की व्यवस्था अभी तक नहीं हो पाई है.

मृत्य प्रमाण पत्र होने के बावजूद उन्हें अभी तक सरकार की तरफ से इंसेफेलाइटिस बीमारी से मारे गए बच्चों के परिजनों के लिए घोषित 50 हज़ार रुपये की मदद राशि भी नहीं मिली है.

सरकार की योजना कितनी असरदार

गांव से बाहर निकलने पर सरया तिवारी शुक्रवार बाज़ार रोड पर पानी की बड़ी टंकी दिखाई देती है.

मालूम करने पर पता चलता है कि उत्तर प्रदेश सरकार की ग्राम समूह पेयजल योजना के तहत सरया तिवारी सहित आसपास के नौ गांवों में पीने के शुद्ध पानी के लिए इस टंकी का निर्माण किया जा रहा है.

इस की टंकी का निर्माण 4 साल से अधूरा पड़ा है. इसके आसपास घरों में साफ़ पानी पहुंचाने के लिए लगाए जाने वाले पाइप बिखरे पड़े धूल खा रहे थे.

'फिर बोली ही नहीं बाबू'

विदा लेने से पहले महिमा के आखिरी घंटों को याद करते हुए सोनमती जोड़ती हैं, "घर से ही उसकी बोली बंद हो गयी थी. पूरे रास्ते और फिर अस्पताल में कुछ नहीं बोली. अस्पताल में उसे मेज़ पर एक करवट सुलाया गया था. जांच के लिए डॉक्टर ने थोड़ा खून निकाला तो उसके हाथ से खून बहने लगा. मैंने खून साफ़ किया और उसके पास ही खड़ी रही. पर कुछ नहीं बोलीं बाबू हमार. हमतो सोच रहे थे हल्का बुखार है, घर ले जाकर पकौड़ी खिलाएंगे. रात को मांग रही थी, हम खिला नहीं पाए. पर फिर बोली ही नहीं बाबू".

कुशीनगर की हाटा तहसील के डुमरीमलाओं गांव में रहने वाली 26 वर्षीय बिंदू यादव की कहानी भी सोनमती जैसी ही है.

बीते साल 17 अगस्त को उनके बेटे अनुज यादव की जापानी इंसेफेलाइटिस से मौत हो गई. 4 साल के अनुज ने अभी अभी पास ही के स्कूल की नर्सरी क्लास में पढ़ने जाना शुरू किया था कि अचानक एक रात उन्हें तेज बुखार आया.

अपनी 7 साल की बेटी और 2 साल के बेटे को गोद में लिए बिंदु अब तीसरे खो चुके बेटे की याद में रोते हुए कहती हैं, "याद नहीं आएगा जी? जिसको अपने पेट से पैदा किए हों और चार साल तक सेवें (पालन पोषण) हों, उस बच्चे की याद नहीं आएगी? हमको अनुज भूलता ही नहीं है एक क्षण को भी. उसके बाद हमने उसका कोई सामान कोई कपड़ा घर में नहीं रखा. सब निकाल कर बाहर कर दिया कि हमको याद न आए. पर हमको फिर भी अनुज की बहुत याद आती है. पहला बेटा था हमारा. इतना मानते थे बाबू को कि कभी मारा ही नहीं बाबू को. कभी हाथ नहीं उठाया बाबू पर. सबसे ज्यादा वही लाड़ले थे सबके. पापा के, दादी के और हमारे भी. बहुत शांत और प्यारा बच्चा. दाल भात खाकर खुश रहता था. रोज़ नहाकर स्कूल जाता था. पता नहीं कैसे इतना तेज़ बुखार हो गया बाबू को."

Image caption बिंदू की दादी

'बाबू के प्राण ही न रहे'

गोरखपुर शहर से सिर्फ 40 किलोमीटर दूर मौजूद बिंदू का गांव भी गंदे तालाबों, खुले हुए नालों और कूड़े के ढेरों से अटा पड़ा था.

बिंदू के घर आज भी शौचालय नहीं है और घर के ठीक सामने जमे हुए प्रदूषित पानी का एक बहुत बड़ा तालाब है. यानी जापानी इंसेफेलाइटिस के मच्छर के पैदा होने फैलने के लिए उपयुक्त माहौल.

बिंदू बताती हैं कि अनुज की मृत्यु के बाद पहली बार सरकारी स्वास्थ कर्मचारी उनके गांव में दवाई का छिड़काव करने आए.

अपने बच्चे की बीमारी के दिन याद करते हुए बिंदू बताती हैं, "14 अगस्त को अचानक बाबू को तेज़ बुखार आया तो हम लोग हाटा के सरकारी अस्पताल ले गए. बाबू का शरीर एकदम अकड़ गया था और आंखें ऊपर हो गई थीं. बेहोश थे, कुछ नहीं बोले रस्ते भर. वहां डॉक्टर ने दो-चार घंटा रखा बाबू को.''

बिंदु कहती हैं, ''सुई लगाया, दवाई दिया और फिर हम लोगों को बोल दिया कि गोरखपुर मेडिकल ले जाएं. हम लोग तुरंत अपनी दुपहिया पर ही बाबू को गोरखपुर मेडिकल कालेज ले आए और यहाँ इंसेफेलाइटिस वार्ड में भर्ती करा दिया. उस दिन बाबू ने किसी को नहीं पहचाना. अगले दिन भी नहीं. फिर तीसरे दिन बाबू मम्मी पापा कहने लगे और थोड़ा कुछ खाने लगे. कहते थे मम्मी घर ले चलो, स्कूल जाउंगा. फिर चौथे दिन अचानक बुखार बढ़ गया और बाबू को आईसीयू में ले गए. फिर उसके ऊपर वो कोई लेप लगाकर सीना मशीन से दबाकर जिंदा करने की कोशिश करने लगे. पर बाबू के प्राण ही न रहे शरीर में तो कैसे जिंदा होते?"

बच्चा बचाने के लिए पानी ख़रीदकर पिला रही हैं मांएं

अनुज के बाद अब बिन्दू को अपनी बाकी दो बच्चों की जान का डर भी सताता रहता है.

इंसेफेलाइटिस से लड़ने के अपने उपायों के बारे में वो कहती हैं, "अब हम हैंडपंप का पानी बच्चों को नहीं पिलाते. हर रोज़ 15 रुपये का साफ़ पानी का कैन खरीदना पड़ता है पर पैसे खर्च करके बच्चों के लिए खरीदती हूं. बच्चों को मच्छरदानी में सुलाती हूं आयर रोज़ गर्म पानी करके नहलाती भी हूं. इस दिमागी बुखार से हर साल हमारे यहाँ इतने बच्चे मरते हैं. अनुज के बाद एक डर बैठ गया है दिल में कि बाकी दो बच्चों को भी इंसेफेलाइटिस बुखार न हो जाए."

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