BBC SPECIAL: 'मुझे लगा जैसे कमर की हड्डी टूट गई हो तभी मुझे पता चल गया कि अब हमारा बाबू नहीं रहा'

  • 14 जनवरी 2018
चंदा गुप्ता इमेज कॉपीरइट Priyanka Dubey/BBC
Image caption चंदा का पहला बच्चा 11 अगस्त 2017 की रात बीआरडी अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी से मर गया था

बीस साल की चंदा गुप्ता के पीले उदास चेहरे पर नई नवेली दुल्हन की मासूमियत और आँखों में शादी के पहले ही साल पैदा हुए अपने पहले बेटे को खोने का गम, एक साथ उभर कर आता है.

कुशीनगर के रामकोला कस्बे में बसे फरना गांव में रहने वाली चंदा का पहला बच्चा 11 अगस्त 2017 की रात बाबा राघवदास (बीआरडी) मेडिकल कॉलेज में अचानक ख़त्म हुए ऑक्सीजन की कमी से गुज़र गया.

मृत्यु के वक़्त चंदा का बेटा सिर्फ 8 दिन का था. बच्चे का ज़िक्र होते ही वो सबसे पहले कहती हैं, "बाबू इतने छोटे थे कि अभी हमने नाम ही नहीं रखा था. मृत्यु प्रमाण पत्र पर भी 'चंदा का बेटा' ही नाम लिखा है उनका."

अपने घर की सबसे अंदर वाले कमरे में बैठी चंदा मुझे देखते ही सिसकियाँ लेते हुए रोने लगी. आंसुओं से गीले चेहरे को अपनी शॉल से पोंछते हुए बोली, "जब हम सोनोग्राफी करवाने गए थे तो देखे थे, बाबू पेट में रेंगत रहैं. (बच्चा पेट में घूम रहा था)."

मांओं का दर्द- हमार बाबू अब कुछ बोलत नाहि

गोरखपुर में बच्चों की मौत का सिलसिला जारी

इमेज कॉपीरइट Priyanka Dubey/BBC
Image caption बच्चे का मृत्यु प्रमाण पत्र

आईसीयू में भर्ती

चंदा आगे कहती हैं, "हमारा वज़न भी ठीक था. नौ महीने पूरा करके दसवें में तीन दिन लगा था जब हमें दर्द हुआ. 4 अगस्त तारीख़ थी उस दिन. रामकोला के सरकारी अस्पताल में गए और नॉर्मल डिलीवरी हुआ हमारा. बाबू जब हुए तो ढाई किलो के थे पर होते ही तबियत खराब हो गई हमारे बच्चे की."

"डॉक्टर ने कहा कि बाबू ने पेट में गंदा पानी पी लिया है. हमें जिला अस्पताल ले जाने को कहा तो हम लोग तुरंत बाबू को लेकर पडरौना जिला अस्पताल गए. वहां सुई लगी पर दो घंटे बाद डॉक्टर ने गोरखपुर मेडिकल ले जाने को कह दिया. रात बहुत हो गई थी और पानी भी बरस रहा था. फिर भी हमारे मालिक (पति) और ससुर ने एक बड़ी गाड़ी (बोलेरो) ठीक किया और हम सब बच्चे को लेकर गोरखपुर मेडिकल कॉलेज पहुंचे. वहां बाबू को बच्चों के आईसीयू में (नियो नेटल इंटेंसिव केयर यूनिट) में भर्ती कर लिया गया."

यहाँ गौरतलब है कि गोरखपुर मंडल के अंतर्गत आने वाले देवरिया, कुशीनगर, महराजगंज और गोरखपुर जिलों के निवासी इलाज के लिए एक अकेले बीआरडी मेडिकल कॉलेज पर ही निर्भर हैं.

एक महीने बाद गोरखपुर अस्पताल का हाल!

गोरखपुरः अक्टूबर में 175 बच्चों ने तोड़ा दम

इमेज कॉपीरइट Priyanka Dubey/BBC

बच्चे की जांच

एक ओर जहां क्षेत्र में सरकारी प्राथमिक स्वास्थ सुविधाएं जर्जर अवस्था में हैं वहीं इलाज के लिए गोरखपुर मंडल के इन चार जिलों के अलावा बस्ती, संतकबीरनगर और सिद्धार्थनगर जैसे पड़ोसी जिलों के साथ-साथ बिहार और नेपाल तक से लोग इलाज करवाने बीआरडी मेडिकल कॉलेज आते हैं.

गोरखपुर मंडल के प्राथमिक सरकारी अस्पतालों में बाल रोग विशेषज्ञों की भारी कमी के चलते बाल मरीज़ों को तुरंत बीआरडी मेडिकल कॉलेज भेजना पड़ता है.

इससे बीआरडी मेडिकल कॉलेज पर मरीज़ों का भार तो बढ़ता ही है, साथ दूर दराज के गांवों से गोरखपुर शहर पहुंचते पहुचंते कई मरीज़ों की हालत नाज़ुक हो जाती है. मेडिकल कॉलेज पहुचंने से पहले तक चंदा के बच्चे की जांच भी किसी बाल रोग विशेषज्ञ ने नहीं की थी.

चंदा के परिजन उन्हें अपने घर के आंगन में बैठकर मुझसे बात करने और उजाले में तस्वीरें लेने की अनुमति नहीं देते. इसलिए मैं और चंदा घर छत पर बात करने का रास्ता निकालते हैं.

जहां जापानी बुख़ार ‘सालाना मेहमान’ है...

गोरखपुर: 'एक के ऊपर एक लाशें पड़ी थीं'

इमेज कॉपीरइट Priyanka Dubey/BBC
Image caption चंदा और उनके पति धर्मेंद्र

रोज़ दो-तीन हज़ार रुपयों का खून मंगाते...

तेज़ ठंड और कोहरे ने चंदा के गांव के ऊपर शाम के धुंधलके की चादर बिछा दी थी. छत पर आते ही चंदा तेज़ आवाज़ में हिचकियाँ लेते हुए कहने लगीं कि उसे उसका बच्चा वापस चाहिए, "शुरू के एक दो दिन में ही हमारा बाबू अस्पताल में ठीक हो गया था. वहां डॉक्टर लोग उसे रोज़ सुई लगाते."

"हमारे मालिक और ससुर से रोज़ दो-तीन हज़ार रुपयों का खून मंगाते. चढ़ाते भी थे या नहीं खून ये किसी को नहीं पता. डॉयपर, तौलिये दर्जनों में मंगवाते थे. अरे बाबू दूध ही नहीं खींच रहे थे तो पेशाब लैट्रीन कहां से करते?"

चंदा आगे कहती हैं, "हमसे कहते कि अब आपका बच्चा ठीक हो गया है. सेब-फल मंगवा कर खाइये. कल से बच्चे के लिए आपका दूध मांगेगे. अगर बच्चे ने दूध खींच कर पी लिया तो फिर अस्पताल से छुट्टी हो जाएगी. पर 10 अगस्त को अचानक देर रात से डॉक्टरों ने बाबू के चेहरे से ऑक्सीजन की नली को निकाल दिया और हम लोग को एक पंप जैसा कपड़े का गुब्बारा (ऑक्सीजन ख़त्म होने के बाद मरीज़ों में बाटें गए अम्बू बैग) पकड़ा दिया. कहा कि दबाओ इसे. हमारे ससुर दबाए कुछ घंटे, कुछ घंटे हमारे मालिक दबाए और हमारे पिताजी भी दबाए कुछ देर."

"पर उसमें तो ऑक्सीजन था ही नहीं तो बाबू को सांस कैसे मिलता बताइये? धीरे-धीरे वहां सबको पता चल गया कि ऑक्सीजन ख़त्म हो गया है. अस्पताल में भगदड़ मच गया. हमारे सामने पच्चीस लोग रो रहे थे जिनके बच्चे मू (मर) गए थे. हम भी रोने लगे."

गोरखपुर त्रासदी: पिता ने आरुषि को तिल-तिल मरते देखा

गोरखपुर में बच्चों की मौत पर विदेशी मीडिया

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
गोरखपुर में मरने वाले बच्चों की माओं से जानिए...इन मौतों के आंकड़ों में बदलने की कहानी.

ऑक्सीजन की कमी

आगे चंदा बताती है, "हम बहुत डर गए थे. फिर शाम को हमने सुना कि डॉक्टर कह रहे हैं हमारे मालिक से कि इसको मत बताना, रोने गाने लगेगी. पर हमको पता चल गया था. बुझाया कि हमारी कमर की ड्योढ़ी अचनाक टूट गई है (कमर की हड्डी अचानक टूट गई है). तभी हमको पता चल गया था कि हमारे बाबू नहीं रहे."

चंदा का 'मुझे मेरा बच्चा वापस चाहिए, मुझे मेरा बच्चा वापस चाहिए' का विलाप मेरे कानों में गर्म शीशे की तरह घुल रहा था. चंदा के 22 वर्षीय पति धर्मेंद्र गुप्ता अपनी चाय पकौड़ी की दुकान छोड़ कर अब हमारे साथ आ बैठे थे.

वे कहते हैं, "हमारा बेटा इतना स्वस्थ हो गया था कि जो देखता था वो कहता था कि 3 महीने का बच्चा है. पर ऑक्सीजन की कमी की वजह से हमारा बच्चा मर गया. बाबू के जाने के बाद हमको शरीर और मृत्यु प्रमाण पत्र भी नहीं दे रहे थे. उसके लिए भी दो घंटा लड़ाई करना पड़ा. कहते थे अधिकारी सारे चले जाएं तब तुम्हारा बच्चा देंगे."

इसके आगे वे बताते है कि बाद में एम्बुलेंस किए उसने भी हमसे 1800 रुपये ले लिए गांव पहुंचने के. अब हमें समझ ही नहीं आता कि खुद को और चंदा को कैसे संभालें. इतना प्यारा बच्चा था हमारा, चेहरा नहीं भुलाता है उसका आज भी.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए