ब्लॉग: पंच परमेश्वरों, अब न्याय के लिए हम कहाँ जाएँ?

  • 14 जनवरी 2018
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इस कहानी का कोई भी पात्र काल्पनिक नहीं है, पर पूरी कहानी को ही काल्पनिक बनाने की कोशिशें जारी हैं.

जिस पंचायत के सबसे गुणी-सयाने पंच परमेश्वरों में से चार को चौपाल पर आकर कहना पड़े कि अंदर भारी गड़बड़ चल रही है और इसके लिए और कोई नहीं बल्कि ख़ुद गाँव का सरपंच ज़िम्मेदार है, उस पंचायत पर कौन भरोसा करेगा? जिस सरपंच पर उसके बाक़ी पंचों का ही भरोसा उठ गया हो उसके फ़ैसले गाँव कैसे मानेगा?

ये पंचायत गाँव के लोगों को कैसे भरोसा दिला पाएगी कि बेशुमार दौलत और चंद लठैतों के बल पर गाँव का दबंग चौधरी हर किसी पर ज़ुल्म नहीं कर सकता और अगर ये साबित हुआ तो उसे सज़ा मिलेगी, आख़िरकार पंचायत का हुक्म चलेगा और दीन-हीन को न्याय मिलेगा?

भारतीय गणतंत्र के सामने आज ये सबसे बड़ा और सबसे गंभीर सवाल है जिसका जवाब किसी के पास नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने कहा कि उन्होंने भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र से मुलाक़ात की और उन्हें समझाने की कोशिश की कि संवेदनशील मामलों की सुनवाई के लिए जज या बेंच तय करते वक़्त उचित प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए.

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Image caption भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र लगातार चर्चाओं में रहे हैं

पर उन्होंने खुलकर ये नहीं बताया कि आख़िर वो कौन से संवेदनशील मामले हैं जिन्हें लेकर वो चीफ़ जस्टिस से असहमत हैं. पूरे देश ने टेलीविज़न के पर्दे पर उस प्रेस कॉन्फ़्रेंस को देखा और भारी शोरगुल के बीच पत्रकारों को सवाल पूछते सुना कि क्या ये जज लोया की मौत का मामला है.

ये सवाल एक से अधिक पत्रकारों ने पूछा, जिसके जवाब में जस्टिस गोगोई ने सिर्फ़ एक शब्द का जवाब दिया - "यस!"

कहानी शुरू होती है अब

यहाँ से कहानी फ़्लैशबैक में जाती है और घटनाचक्र तेज़ी से घूमता है.

कहानी के पहले पात्र सोहराबुद्दीन अनवर हुसैन शेख़ और उनकी पत्नी क़ौसर बी 26 नवंबर 2005 को कथित फ़र्ज़ी मुठभेड़ में मारे जाते हैं. बाद में इसका एक चश्मदीद तुलसीराम प्रजापति भी 'मुठभेड़' में मारा जाता है.

इसका इल्ज़ाम कहानी के दूसरे महत्वपूर्ण पात्र यानी गुजरात के तत्कालीन गृहमंत्री अमित शाह पर लगता है. उन्हें गिरफ़्तार कर जेल भेजा जाता है. फिर सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में जाँच चलती है. अदालत के आदेश पर अमित शाह को राज्य-बदर कर दिया जाता है.

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Image caption सोहराबुद्दीन अनवर हुसैन शेख़ और उनकी पत्नी क़ौसर बी

आख़िरकार मामला सीबीआई अदालत में जाता है. विशेष जज जेटी उत्पत अमित शाह को समन करते हैं. शाह सुनवाई में हाज़िर होने से छूट माँगते हैं. जज उत्पत उनके वकील से इस पर अपनी नाराज़गी जताते हैं. अगले हफ़्ते ही उनका तबादला पुणे के लिए हो जाता है.

फिर जज उत्पत की जगह आते हैं, कहानी के तीसरे महत्वपूर्ण पात्र सीबीआई जज ब्रजगोपाल हरकिशन लोया. पर सोहराबुद्दीन मामले की सुनवाई के दौरान ही दिसंबर 2014 में उनकी कुछ ऐसी परिस्थितियों मे मौत हो जाती है जिनकी तफ़तीश की माँग की जा रही है.

जज लोया की मौत के बाद उनकी जगह नियुक्त सीबीआई जज एम.बी. गोसावी जाँच एजेंसी के आरोपों को नामंज़ूर करते हुए अमित शाह पर आरोप तय करने से इनकार कर देते हैं. जब छोटी अदालत से किसी अभियुक्त को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया जाता है तो पुलिस या दूसरी जाँच एजेंसी आम तौर पर केस को ऊँची अदालत में ले जाती है. पर सीबीआई ने अमित शाह के ख़िलाफ़ ऊँची अदालत में अपील नहीं की.

कहानी वहीं ठहर गई. मगर दरअसल ठहरी नहीं. अमित शाह के बरी होने के तीन साल बाद 'द कारवाँ' पत्रिका को जज लोया के परिवार वालों ने बताया कि उनकी मौत रहस्यमय परिस्थितियों में हुई. हालाँकि, इंडियन एक्सप्रेस अख़बार ने अपनी एक ख़बर में दो जजों के हवाले से इस आशंका को आधारहीन बताया.

पर तब तक कहानी आगे बढ़ चुकी थी.

जज लोया की मौत की परिस्थितियों की जाँच के लिए बॉम्बे लॉयर्स एसोसिएशन ने 4 जनवरी को बंबई हाईकोर्ट में अर्ज़ी दाख़िल की पर इस बीच एक काँग्रेसी तहसीन पूनावाला ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटा दिया. यही वो याचिका है जिसके बारे में पत्रकारों के सवाल करने पर जस्टिस गोगोई ने जवाब दिया था - "यस".

जस्टिस लोया की कहानी जिगरी दोस्त की ज़ुबानी

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Image caption जस्टिस लोया

सबके साथ इंसाफ़ हो

पर बॉम्बे लॉयर्स एसोसिएशन ने अख़बारों को दिए बयान में इसे जाँच को भटकाने की कोशिश बताया है. संगठन का आरोप है कि सुप्रीम कोर्ट में याचिका इसलिए डाली गई है ताकि मामले को बंबई हाईकोर्ट से निकाला जा सके. सुप्रीम कोर्ट अगर जज लोया की जाँच की माँग को ख़ारिज कर देता है तो मामला ख़त्म हो जाएगा. लेकिन हाईकोर्ट में सुनवाई होती है तो ख़ारिज होने के बाद याचिकाकर्ताओं के पास सुप्रीम कोर्ट आने का विकल्प मौजूद रहेगा.

प्रसंगवश, तहसीन पूनावाला के भाई शहज़ाद पूनावाला महाराष्ट्र काँग्रेस से जुड़े हैं पर उन्होंने राहुल गाँधी के काँग्रेस अध्यक्ष चुने जाने पर सवाल खड़े किए थे जिसकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तारीफ़ भी की थी.

ये मामला तब से चल रहा है जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं बने थे और उनके हनुमान अमित शाह देश की सबसे मज़बूत पार्टी के अध्यक्ष नहीं बने थे. तभी से बीजेपी और मोदी-शाह समर्थक कहते रहे हैं कि अमित शाह को केंद्र में उस वक़्त सत्तारुढ़ काँग्रेस पार्टी ने झूठा फँसाया था.

राजनीति में विरोधियों को परास्त करने के लिए सत्ताधारी कई तरह की तिकड़में करते हैं. अमित शाह के साथ अगर ज़ुल्म हुआ है तो इस गणराज्य का संविधान उनको भी न्याय की वैसी ही गारंटी देता है जैसे देश की किसी दूसरे अदना आदमी को.

सरकारें ज़ुल्म करें, उनकी पुलिस, मिलिट्री, उनके अफ़सर और जासूस इस ज़ुल्म में उनकी मदद करें, संसद और विधानसभाएँ इस ज़ुल्म को क़ानूनी जामा पहना दें, तो भी अमित शाह को न्याय मिलना ही चाहिए. इसके लिए ज़रूरी है कि देश की सर्वोच्च पंचायत स्वायतत्ता और आज़ाद हो, और न्यायाधीशों पर किसी तरह का सरकारी या ग़ैर-सरकारी दबाव न हो.

चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्र कब-कब चर्चा में रहे?

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चिंताओं में भी शामिल हों

अगर सुप्रीम कोर्ट के चार जज कह रहे हैं कि अगर इस संस्थान को नहीं बचाया जाएगा तो ये लोकतंत्र नहीं बचेगा, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत की सबसे मज़बूत और सत्तारुढ़ पार्टी के अध्यक्ष होने के नाते अमित शाह को उनकी चिंता में शामिल होना ही चाहिए.

इन चार न्यायमूर्तियों की चिंता है कि जज लोया की जाँच जैसे संवेदनशील मामलों में फ़ैसला करने से पहले वरिष्ठ जजों को भरोसे में लेकर सही प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए ताकि न्याय किया जा सके. इस देश की सर्वोच्च पंचायत के पंच परमेश्वर मदद माँग रहे हैं और साफ़-साफ़ कह रहे हैं कि राष्ट्र को अब इस संस्थान को बचाना चाहिए. एक ज़िम्मेदार राजनेता और नागरिक होने के साथ-साथ सत्तारुढ़ पार्टी के अध्यक्ष होने के नाते अमित शाह को न्यायमूर्तियों की मदद नहीं करनी चाहिए?

ये तब तक नहीं होगा जब तक इंसाफ़ के निज़ाम पर लोगों का भरोसा जगाने के लिए सरकार पहल नहीं करेगी. ये पहल तब दिखेगी जब सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस में जज उत्पल के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सीबीआई ऊँची अदालत में अपील करेगी.

वरना जिस देश में सुप्रीम कोर्ट के जज मीडिया के सामने आकर न्यायपालिका को बचाने की गुहार लगा रहे हों वहाँ आप और हम जैसे अदना नागरिक सिर्फ़ यही पूछ सकते हैं - पंच परमेश्वरों, अब न्याय के लिए हम किसके पास जाएँ?

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