नज़रियाः कश्मीर में इसराइल दिखा रहा है भारत को रास्ता?

  • 15 जनवरी 2018
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Image caption भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसरायली प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतन्याहू का नई दिल्ली में कुछ इस तरह स्वागत किया

भारतीय जनता पार्टी परंपरागत रूप से इसराइल के साथ नज़दीकी सुरक्षा संबंध बनाने के लिए उत्साही रहती है.

14 जून 2000 में तत्कालीन गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी ने इसराइल का दौरा किया था, उस समय वे अपने साथ तमाम भारतीय सुरक्षा प्रमुखों को लेकर गए थे. यह एक अभूतपूर्व कदम था. आडवाणी की यात्रा के बाद रूस के आंतरिक मामलों के मंत्री व्लादिमिर रशैलो भी भारत आए.

ध्यान देने वाली बात है कि उस समय इसराइल के चरमपंथ विरोधी विशेषज्ञ रेवेन पेज़ ने कहा था कि वे तमाम देश जो फ़लीस्तीनी 'फ्रीडम फाइटर्स' (आज़ादी की मांग करने वाले प्रदर्शनकारी) के ख़िलाफ़ इसराइल की कार्रवाई की निंदा किया करते थे, अब खुद एक कतार में खड़े होकर अपने देशों में पनप रहे ऐसे ही 'फ्रीडम फाइटर्स' से निपटने के तरीके इसराइल से सीख रहे हैं.

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संयुक्त राष्ट्र में ट्रंप के प्रस्ताव के ख़िलाफ़ वोट

इसमें कोई शक़ नहीं कि पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इसराइल यात्रा ने इसराइली दिलों में गहरी छाप छोड़ी और उनकी भारत के प्रति उम्मीदों को भी परवान चढ़ाया.

लेकिन दिसंबर 2017 में जब संयुक्त राष्ट्र में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप यरूशलम को इसराइल की राजधानी के रूप में मान्यता देने वाला प्रस्ताव लेकर आए तो भारत ने इस प्रस्ताव के ख़िलाफ़ वोट किया. भारत के इस कदम से इसराइल को निराशा हुई.

इसराइली समाचार पत्र हारेट्ज़ ने 4 जनवरी को लिखा, 'भारत इसराइल के साथ गंभीर रिश्ते नहीं चाहता.'

अपने लेख के ज़रिए यह समाचार पत्र ने भारत-इसराइल के द्वपक्षीय संबंधों की सच्चाई समझाने की कोशिश की. लेख के अनुसार, इन दोनों देशों के रिश्ते 'आकर्षण' से शुरू होते हुए 'प्रेम' तक पहुंचे और अब 'इसराइल विरोध' तक आ गए हैं. समाचार पत्र लिखता है कि भारत को अरब और मुस्लिम देशों के साथ अपने रिश्तों में एक तालमेल बनाने की ज़रूरत है. साथ ही भारत में रह रहे मुस्लिम समाज के साथ भी बेहतर सामंजस्य की ज़रूरत है.

समाचार पत्र साथ ही यह भी लिखता है कि सऊदी अरब-अमरीका-इसरायल के गुप्त और अतिवादी गठजोड़ की वजह से भारत के नीति निर्माताओं के सामने मुश्किलें पेश आ रही हैं.

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'कश्मीर में इसराली नीति'

साल 2014 से ही बीजेपी भारत प्रशासित कश्मीर में वही नीति अपना रही है जो इसराइल ने फ़लिस्तीन में मौज़ूद आज़ादी के समर्थकों के ख़िलाफ़ अपनाई थी.

14 मई 2017 को राम माधव ने टीवी चैनल एनडीटीवी में कहा था कि वे जम्मू-कश्मीर में मौजूद हर एक चरमपंथी का खात्मा कर देंगे. उन्होंने इसराइल की तरह ही सीमा पर दंडात्मक हमलों की बात भी कही थी.

हालांकि इन तमाम कोशिशों के बाद भी घाटी के हालात सामान्य होते नज़र नहीं आते. पत्थरबाज़ों के साथ चरमपंथियों जैसा सलूक करने की नीति उलटी पड़ रही है. यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी भारतीय सेना की आलोचना हुई है, जिसमें कहा गया है कि पैलेट गन के इस्तेमाल से भारत अपने ही नागरिकों को अंधा बना रहा है.

पिछले साल जुलाई में बुरहान वानी की मौत के बाद से ही भारतीय सुरक्षा बलों पर हमले तेज हुए हैं. साल 2016 तक माओवादियों के साथ मुठभेड़ में सुरक्षाबलों की मौत के आंकड़े अधिक होते थे लेकिन 2016 के बाद से जम्मू-कश्मीर में यह आंकड़ा माओवादी इलाकों से ज़्यादा बड़ा हो गया है.

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बुरहान वानी की बरसी पर कश्मीर के हालात

आम जनता का चरमपंथियों को समर्थन

हालात तब और ख़राब होते नज़र आते हैं जब आम जनता भी विद्रोह में शामिल हो जाती है. बुरहान वानी की मौत के बाद बड़ी संख्या में आम लोग उनके जनाज़े में शामिल होने सड़कों पर उतर आए थे, लोगों ने भारतीय सेना के ख़िलाफ़ प्रदर्शन भी किया.

हाल ही में 8 जनवरी 2018 को बडगाम जिले में तीन चरमपंथियों की मौत के बाद आम लोगों ने प्रदर्शन किया. चरमपंथियों के लिए आम लोगों के भीतर इस तरह का समर्थन किसी अन्य चरमपंथ से ग्रसित देश में नहीं दिखता, चाहे वे अफ़गानिस्तान, सीरिया या इराक़ ही क्यों न हों. इस तरह के हालात सिर्फ़ इसराइली सीमाओं पर ही देखने को मिलते हैं जहां प्रत्येक फलीस्तीनी इसराइली कब्जे का विरोध करता है.

कुछ इसी तरह की नीति राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती भी अपना रही हैं, जिन्होंने 28 जुलाई 2017 को कहा था कि ज़ल्द ही घाटी के युवाओं के भीतर सेना या पुलिस के प्रति डर नहीं रहेगा.

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बीजेपी के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा के नेतृत्व में कश्मीर मसले पर कुछ लोगों के समूह ने भी यह बात उठाई थी कि कश्मीरी लोगों के बीच दिन प्रतिदिन निराशा और हताशा की भावना बढ़ती जा रही है.

उन्होंने यह भी कहा था कि वे सरकार के इस रवैए के भी ख़िलाफ़ हैं, जिसमें सभी प्रदर्शनकारियों को पाकिस्तान की कठपुतली बताया जा रहा है.

यहां तक कि बीजेपी के साथ गठबंधन करने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी हाल ही में 8 जनवरी 2018 को श्रीनगर में कहा था कि बातचीत से ही कश्मीर समस्या का समाधान निकाला जा सकता है.

इसलिए इसराइली प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतन्याहू की इस यात्रा से यह उम्मीदें लगाना बेमानी ही होगा कि उनके साथ सुरक्षा संबंधों पर बहुत अधिक चर्चा हो, वो भी तब जबकि सरकार ने कश्मीर समस्या के समाधान के लिए पूर्व आईबी प्रमुख दिनेश्वर शर्मा को नियुक्त कर लिया है.

(ये लेखक के निज़ी विचार हैं.)

(लेखक कैबिनेट सचिवालय के पूर्व विशेष सचिव रह चुके हैं. वे 26/11 मुंबई हमले में पुलिस प्रदर्शन की जांच करने वाली दो सदस्यीय उच्च स्तरीय टीम के सदस्य रह चुके हैं.)

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