नज़रियाः दलित उत्थान को भूल 'चमचा युग' लाने वाली माया

  • 15 जनवरी 2018
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मायावती के 63वें जन्मदिन पर दलित राजनीति में ध्रुवीकरण की शुरुआत हो चुकी है.

एक तरफ़ उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में 22.2 प्रतिशत वोट बैंक और सिर्फ़ 19 सीटों की माया है तो दूसरी तरफ़ गुजरात में निर्दलीय रहकर अकेली बडगाम सीट पर जीतने वाले विधायक जिग्नेश मेवाणी के आंबेडकरवादी और वामपंथी विचारों का यलगार.

एक ओर बहनजी का चार बार मुख्यमंत्री बनने और 2009 में वामपंथी दलों द्वारा देश के प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाए जाने का इतिहास है तो दूसरी ओर वैश्वीकरण और हिंदुत्व को भीमा कोरेगांव, ऊना में दलितों के दमन, युवाओं की बेरोजगारी और खेती की बदहाली के बहाने ललकारने का भविष्य है.

दलित राजनीति में मार्क्सवादी भाषा

देश की वामपंथी ताकतों से अक्सर छत्तीस का आंकड़ा रखने वाली दलित राजनीति पहली बार न सिर्फ़ मार्क्सवादी भाषा बोल रही है बल्कि कांग्रेस को परास्त करने के बाद उससे भी हाथ मिलाने की तैयारी में है.

उधर गुजरात दंगों के बाद भाजपा के साथ सरकार बनाने वाली और गुजरात के ताज़ा चुनाव में बसपा के उम्मीदवारों के माध्यम से दलित वोटों का बंटवारा करके भाजपा को मदद करने वाली बहन मायावती अपने अतीत से भले संतुष्ट हों लेकिन भविष्य को लेकर आशंकित हैं.

वे दलितों पर अत्याचार होने पर कभी कभी बौद्ध बनने की धमकी देती हैं और हिंदुत्ववाद के विरुद्ध एकाध टिप्पणी कर देती हैं लेकिन उन्होंने बहुजन मिशन का काम लगभग छोड़ दिया है. उन्हें न तो बैकवर्ड माइनॉरिटी शेड्यूल्ड कास्ट इम्पल्याइ फेडरेशन(वामसेफ) का स्मरण है और न ही दलित शोषित समाज संघर्ष समिति(डीएस4) का.

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कांशीराम का युग

कांशीराम ने अस्सी के दशक में राम को अत्याचारी और गांधी को धोख़ेबाज़ कह कर कांग्रेस और भाजपा की राजनीति पर हमला बोला था और फिर पूना समझौते का विरोध करते हुए दलितों को कांग्रेस के चमचायुग से बाहर निकाल कर स्वंत्रत नेतृत्व प्रदान किया था.

वे महाराष्ट्र से लेकर सुदूर केरल तक के विंध्यपार के समस्त दलित बहुजन आख्यान को उत्तर प्रदेश की धरती पर उतार रहे थे और ब्राह्मणवाद के पालने में झूल रहे मनुवाद से युद्ध कर रहे थे. वे कहीं पेरियार, फुले, नारायण गुरु और आंबेडकर का मेला लगवाते थे तो कहीं साइकिल और पैदल यात्राएं निकालते थे.

इसी आक्रामकता में उनके समर्थकों ने गुलामगीरी, तमिल रामायण, रिडल्स इन हिंदुइज्म की कहानियां प्रचारित कीं तो अछूतानंद, ललई सिंह यादव, रामस्वरूप वर्मा जैसे समाज सुधारकों और दादूदयाल, रैदास व दूसरे दलित संतों के कथनों और वचनों को जनता से सामने प्रकट किया.

इस दौरान कांशीराम ने सैकड़ों साथी(कॉमरेड) तैयार किए और उन्हें मिशन की राजनीति और सत्ता की राजनीति में लगाया.

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बसपा का चमचा युग

आज मायावती अपने को कांशीराम की एकमात्र उत्तराधिकारी घोषित करती हैं लेकिन उन्होंने विचारों की सारी तलवारों को अपनी माया की म्यान में डालकर महत्वाकांक्षा की तिजोरी में बंद कर दिया है.

वे भगवाधारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए कोई चुनौती प्रस्तुत ही नहीं करतीं. अगर पालिका चुनावों में उन्हें दूसरा स्थान मिला तो वह अल्पसंख्यक समाज की मजबूरी के कारण.

वरना मायावती के नेतृत्व में बहुजन विचार और दलित आंदोलन महज़ जन्मदिन पर चंदा उगाही और न देने वालों को करंट लगाकर मारने वाला, बसपा के नेताओं का दलित लड़कियों से बलात्कार और अत्याचार करने वाली एक अमानवीय और अलोकतांत्रिक धारणा बन चुका है.

इतना ही नहीं दलित नेताओं को कांग्रेस के जिस चमचा युग से निकालकर कांशीराम ने पढ़ने, संघर्ष करने और आंदोलन करने का आह्वान किया था और एक पूरी की पूरी जुझारू पीढ़ी को तैयार किया था उन सबको मायावती ने चमचा बनने पर ही मजबूर कर दिया और जो नहीं बनना चाहते थे उन्हें पार्टी से निकाल बाहर किया. नतीजतन वे भाजपा के नेतृत्व में एक नए चमचा युग में प्रवेश कर गए.

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क्या बहुजन की पार्टी बन पाई बसपा?

पहली बार मायावती के सत्ता में आने के बाद दलित समाज में जिस साहस और स्वाभिमान का संचार हुआ था वह अद्वितीय था. इसीलिए पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक ज़िले में एक दलित महिला अपने बलात्कारी की बाबिटिंग (लिंग काटकर) करके थाने पहुंच गई थी और पूरे प्रदेश में करंट दौड़ गया था.

सही है कि बसपा से समय-समय पर अलग-अलग कारणों से निकले या निकाले गए दीनानाथ भास्कर, मसूद अहमद, राजबहादुर, बरखूराम वर्मा, राशिद अल्वी, दद्दू प्रसाद, जुगल किशोर, बाबू सिंह कुशवाहा स्वामी प्रसाद मौर्य और आरके चौधरी जैसे नेता या तो अन्य पार्टियों में जाकर खो गए या बाहर रह कर बड़ी हैसियत नहीं बना पाए.

उनके जाने से बहनजी की राजनीतिक हैसियत भी बढ़ी और वे पार्टी की एकछत्र नेता बन गईं, इसके बावजूद यह मानने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि कांशीराम के तमाम साथियों के पार्टी छोड़ने और मिशन के कार्यकर्ताओं की उपेक्षा होने से बसपा सर्वजन तो क्या बहुजन की पार्टी भी नहीं रह पाई.

वह महज मायावती की जेबी पार्टी बनकर रह गई है. बहनजी चाहतीं तो 2007 से 2012 तक के बहुमत और पांच साल के मुकम्मल शासन में भूमि सुधार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे कामों पर ध्यान देकर प्रदेश को बहुजन विचार का एक मॉडल राज्य बनाने की दिशा में काम कर सकती थीं.

लेकिन उन्होंने ब्राह्मणवाद, हिंदुत्व और पूंजीवाद सभी से समझौता करके अपनी राजनीति को महज़ मायावाद के रास्ते पर डाल दिया जो खिसकते वोट बैंक के खोखले वृक्ष के सहारे खाई के ऊपर लटकी है और उसे भाजपा के विफ़ल होने या सपा या कांग्रेस से समझौते के माध्यम से किसी चमत्कार की उम्मीद में है.

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जिग्नेश में दिखता भविष्य

इस राजनीति के मुक़ाबले आम आदमी पार्टी से दलित राजनीति में आए जिग्नेश ने राहुल गांधी, कन्हैया कुमार, उमर खालिद और सहला राशिद जैसे युवा नेताओं के माध्यम से सत्ता विरोधी राजनीति में व्यवस्था विरोधी तेवर पैदा किया है.

वे कांशीराम के नए उत्तराधिकारी बनते दिख रहे हैं. वे आंबेडकर और मार्क्सवाद को मिलाते हुए दोनों पर खुले दिमाग से विचार पर ज़ोर दे रहे हैं. पहले भले उन्होंने नितिन मेशराम नामक वकील से यह कहा हो कि आंबेडकर के विचारों में सब कुछ नहीं है लेकिन आज वे कह रहे हैं कि मार्क्सवाद से असहमत होते हुए भी आंबेडकर के चिंतन में वर्गीय सवाल हैं.

इसीलिए आज जाति और वर्ग के सवालों को मिलाकर उठाने की जरूरत है. इसी क्रम में वे पेरियार से भी प्रेरणा लेते हैं और फुले, आंबेडकर से भी. वे गुजरात मॉडल को चुनौती भी देते हैं और हिंदुत्व और वैश्वीकरण को एक दूसरे का सहयात्री मानते हैं.

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कॉरपोरेट हिंदुत्व के तरकश में कई तीर

देश की राजनीति के समक्ष आज जो चुनौती है उसमें मायावती न तो दलित बौद्धिकों के भीतर आकर्षण पैदा कर पा रही हैं न ही गैर दलितों से संवाद कायम कर पा रही हैं, जाति उन्मूलन की तो बात ही दूर.

दलित राजनीति हिंदुत्व की भूल-भुलैया में उलझ गई है और उससे बाहर निकलने का रास्ता दिख नहीं रहा है. निश्चित तौर पर आज जब जिग्नेश मेवाणी एक हाथ में मनुस्मृति तो दूसरे हाथ में संविधान लेकर मोदी से एक को चुनने की चुनौती देते हैं तो अंधेरे में दीपक दिखाने की कोशिश करते हैं.

लेकिन उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कॉरपोरेट हिंदुत्व के तरकश मे कई तीर हैं. अभी उसने पिछड़ी जाति के एक नेता को प्रधानमंत्री बनाया है और 'नीच' शब्द को जातीय स्वाभिमान से जोड़कर फ़ायदा उठाया है.

उसने दलितों को आकर्षित करने के लिए एक नामालूम नेता को राष्ट्रपति भी बनाया है. अगर वह दलित बहुजन राष्ट्रवाद की राजनीति की बढ़ती चुनौती देखेगा तो किसी दलित को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने में संकोच नहीं करेगा.

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दलितों के पास मायावती जैसी नेता थीं और अब देश की प्रगतिशील ताकतों के सहयोग से उभर रहे जिग्नेश मेवाणी भले हों लेकिन कॉरपोरेट हिंदुत्व के पास मायावी रणनीतियों की कमी नहीं हैं.

वे कभी झोली से निकालते हैं तो कभी मैदान से. देखना है दलित प्रधानमंत्री का इंतज़ार कर रहे देश को वह उपहार संवैधानिक मूल्यों को कमज़ोर करने की कीमत पर मिलता है या उसे ताकतवर करने की.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा में प्रोफेसर एडजंक्ट हैं.)

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