भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में अब तक गिरफ़्तारी क्यों नहीं?

  • 19 जनवरी 2018
पेशवा अंग्रेज़ जंग इमेज कॉपीरइट HULTON ARCHIVE

भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा को एक पखवाड़ा बीत चुका है लेकिन अभी तक इस मामले में जिन दो लोगों पर कथित तौर पर हिंसा भड़काने का आरोप लगाया गया था उन्हें गिरफ़्तार नहीं किया गया है.

भारतीय रिपब्लिकन बहुजन महासंघ के नेता प्रकाश आंबेडकर ने एक बार फिर मंगलवार को महाराष्ट्र सरकार से संभाजी भिडे और मिलिंद एकबोटे की गिरफ़्तारी की मांग की है. नागपुर में मीडिया से बात करते हुए उन्होंने पुलिस कार्रवाई नहीं किए जाने पर समूचे राज्य में विरोध प्रदर्शन करने की भी धमकी दी है.

कोरेगांव में हुई हिंसा का 'आंखों-देखा' हाल

भीमा कोरेगांव में किस तरह हालात बेक़ाबू हो गए?

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
कोरेगांव भीमा में हिंसा के पीछे वजह क्या है?

क्या है भीमा कोरेगांव का पूरा मामला?

महाराष्ट्र में पुणे के नज़दीक भीमा कोरेगांव में 1818 में पेशवा बाजीराव पर ब्रिटिश सैनिकों की जीत की 200वीं सालगिरह मनाई जा रही थी. इस दौरान दलितों पर हुए कथित हमले और हिंसा भड़काने का आरोप भि़ड़े और एकबोटे पर लगाया गया है. इस हमले के बाद दलित संगठनों ने समूचे महाराष्ट्र में कई विरोध प्रदर्शन किए.

कहा जाता है कि भीमा कोरेगांव की लड़ाई 1 जनवरी, 1818 को हुई थी और इस लड़ाई में मराठाओं की हार हुई थी. जीत का सेहरा ईस्ट इंडिया कंपनी की महार रेजिमेंट के सिर बंधा. महार समुदाय उस वक्त महाराष्ट्र में अछूत समझा जाता था.

भीमा कोरेगांव में 31 दिसम्बर को 'यलगार परिषद' का कार्यक्रम रखा गया था. पुणे के प्रतिष्ठित शनिवारावाड़ा में दलित नेताओं ने इस हिंसा से एक दिन पहले सार्वजनिक बैठक का आयोजन किया था.

इस बैठक के दौरान भड़काऊ भाषण देने के लिए दलित नेता और गुजरात के विधायक और दलित नेता जिग्नेश मेवाणी, जेएनयू के छात्र नेता उमर ख़ालिद और कबीर कला मंच के छह सदस्यों पर भी मुक़दमा दर्ज है.

भीमा कोरेगांव की घटना के बाद प्रशासन ने हिंसा भड़कने की आशंका के मद्देनज़र जिग्नेश मेवाणी को मुंबई में 4 जनवरी 2018 को युवाओं से बात करने की अनुमति देने से इंकार कर दिया. उधर जिग्नेश मेवाणी ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों से इंकार किया है.

जिन पर है भीमा-कोरेगांव हिंसा के आरोप

कोरेगांव: आखिर पेशवा के ख़िलाफ़ क्यों लड़े थे दलित?

इमेज कॉपीरइट RAJU SANADI

भिडे और एकबोटे कहां हैं?

प्रकाश अंबेडकर ने महाराष्ट्र सरकार पर इस मामले पर नरम रुख़ अपनाने का आरोप लगाया है.

उन्होंने कहा, "सरकार इन दो हिंदुवादी नेताओं को गिरफ़्तार नहीं करके राज्य में हाफ़िज़ सईद जैसा रास्ता अख़्तियार करने वालों को बढ़ावा दे रही है. मैं लोगों को संयम बरतने को कह कर शांति बनाए रखने की कोशिश कर रहा हूं लेकिन अगर अब सरकार फौरन कार्रवाई नहीं करती तो उसे गंभीर परिणाम होंगे."

उन्होंने बताया कि वो अपने रुख़ और मांगों को स्पष्ट करने के लिए नई दिल्ली में 22 जनवरी को एक संवाददाता सम्मेलन का आयोजन कर रहे हैं.

अब सवाल उठता है कि आखिर पुलिस भिडे और एकबोटे को गिरफ़्तार क्यों नहीं कर रही है और सबसे महत्वपूर्ण यह कि ये दोनों हैं कहां?

मराठी शिव प्रतिष्ठान के सचिव नितिन चौगुले ने बीबीसी से कहा, "भिडे गुरुजी पर लगाये सभी आरोप निराधार और झूठे हैं. यह उनकी छवि को जानबूझकर ख़राब करने का प्रयास है. ना तो वो भागे हैं और ना ही अंडरग्राउंड हैं. वो सांगली में हैं. 1 जनवरी को मैं गुरुजी के साथ ही सांगली के कासेगांव में था."

चौगुले संभाजी भिडे के विश्वासपात्र और अनुयायी है. उन्होंने भी प्रकाश अंबेडकर के भिडे पर लगाये गये सभी आरोपों ग़लत बताया है.

वो कहते हैं, "भिडे गुरुजी ने कभी भी रैलियों में कोई भड़काऊ बयानबाजी नहीं की. पिछले चार-पांच सालों में वो कभी भीमा कोरेगांव नहीं गये. हम भी चाहते हैं कि इस घटना की विस्तार से जांच हो लेकिन भिडे गुरुजी को ख़लनायक बनाना ग़लत है."

बीबीसी ने मिलिंद एकबोटे से भी बात करनी चाही लेकिन उन्होंने जवाब नहीं दिया. मंगलवार को एकबोटे के सहयोगी हृषिकेश ने बीबीसी से बात की लेकिन वो कहां हैं इसकी जानकारी नहीं दी.

हृषिकेश ने कहा, "मिलिंद एकबोटे के ख़िलाफ़ लगे आरोप सही नहीं हैं. वो भागे नहीं हैं. वो शहर (पुणे) में ही हैं.

भीमा कोरेगांवः आग बुझ गई, राख बाक़ी है

आंबेडकर ने कोरेगांव को दलित स्वाभिमान का प्रतीक बनाया?

इमेज कॉपीरइट FACEBOOK/MILIND EKBOTE
Image caption मिलिंद एकबोटे

अब तक क्या जांच हुई?

इस घटना की प्राथमिकी पुणे के पिंपरी थाने में दर्ज की गयी जिसमें भिडे और एकबोटे पर एट्रोसिटी एक्ट, दंगा फ़ैलाने, हत्या की कोशिश और हथियार लहराने का आरोप है. इसके बाद मामले को शिकारपुर थाने में आगे की जांच के लिए स्थानांतरित कर दिया गया.

पुणे ग्रामीण एसपी सुवेज़ हक़ ने बीबीसी को बताया कि जांच अभी जारी है. उन्होंने इससे आगे कोई जानकारी नहीं दी. लेकिन जांच की गति को लेकर प्रश्न उठाए जा रहे हैं.

हिंसा के दिन ही महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने उच्च न्यायालय के सेवानिवृत जज से इसकी न्यायिक जांच कराने की घोषणा की थी. लेकिन आज तक ऐसे किसी जांच आयोग का गठन नहीं हुआ.

प्राथमिकी दर्ज करने का मतलब यह नहीं है कि गिरफ़्तारी होनी चाहिए. वकील असीम सरोदे जांच प्रक्रिया पर विस्तृत जानकारी दी.

उन्होंने कहा, "जो आरोप भिडे और एकबोटे के ख़िलाफ़ लगाये गये हैं इसमें अगर ये दोनों पुलिस से सहयोग कर रहे हैं तो उन्हें गिरफ़्तार करना ज़रूरी नहीं है. लेकिन अगर पुलिस को लगता है कि वो सहयोग नहीं कर रहे या उनके बाहर रहने से वो जांच को प्रभावित कर सकते हैं तो उन्हें गिरफ़्तार किया जा सकता है."

शिव प्रतिष्ठान के चौगुले ने कहा कि पुलिस ने भिडे से किसी जांच के लिए अब तक संपर्क नहीं किया है. तो फिर सवाल उठता है कि अगर आरोपी से पूछताछ नहीं हो सकी है या उससे अब तक संपर्क नहीं किया जा सका है तो जांच आगे बढ़ाने के लिए उसे गिरफ़्तार क्यों नहीं किया जा रहा है?

असीम सरोदे कहते हैं, "इससे यह स्पष्ट होता है कि स्थानीय जांच अधिकारियों को राज्य सरकार की स्थिति को बता दिया गया है. छांट कर लोगों को गिरफ़्तार करने की प्रक्रिया बहुत ग़लत और ख़तरनाक है."

कोरेगांव में मराठों और महारों के बीच हुआ क्या था

'दलितों को केवल मोहरा बना रहे हैं संगठन'

क्या है राजनीति?

वरिष्ठ पत्रकार कुमार केतकर का मानना है कि मुख्य रूप से यह एक राजनीतिक मुद्दा है. वो कहते हैं, "यह सरकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के विचारधारा पर चलती है. ये सभी छोटे हिंदू समूह आरएसएस के सहायक हैं. यह राज्य सरकार भाजपा या शिवसेना नहीं बल्कि आरएसएस चलाती है."

केतकर आगे कहते हैं, "इसलिए स्पष्ट तौर पर किसी संबंधित समूह या व्यक्ति से जुड़ी जांच प्रक्रिया धीमी हो जायेगी. यह पहले भी हुआ है और इस मामले में भी ऐसा ही हो रहा है."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए