नज़रिया: पांच साल में सबसे बड़े संकट में फँसी है 'आप'

  • 20 जनवरी 2018
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आम आदमी पार्टी जितने क़दम आगे बढ़ा रही है, उसे उतनी ज़्यादा दलदली ज़मीन मिल रही है.

उसकी 'विशिष्ट' राजनीति के सामने दिन-ब-दिन ख़तरे खड़े होते जा रहे हैं और हर ख़तरा उसके वज़ूद पर सवालिया निशान लगा रहा है.

विधायकों की सदस्यता को लेकर चुनाव आयोग के फ़ैसले के दूरगामी परिणाम होने वाले हैं. इस फ़ैसले को अदालत में चुनौती देने की बातें शुरू हो गई हैं. उधर विशेषज्ञों ने अटकलें लगानी शुरू कर दी हैं कि 20 सीटों के चुनाव कब होंगे? ज़्यादा बड़ा सवाल है कि चुनाव 20 के लिए होंगे या पूरी विधानसभा के लिए?

अरविंद केजरीवाल ने ट्वीट किया है, ''जब आप सच्चाई और ईमानदारी पर चलते हैं तो बहुत बाधाएँ आती हैं...इतिहास गवाह है कि जीत अंत में सच्चाई की होती है.'' सवाल सच्चाई का है. क्या है सच? सच यह है कि पार्टी के पाँच साल के इतिहास का यह सबसे बड़ा संकट है.

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हमदर्दी या प्रतिशोध?

यह परिघटना आम आदमी पार्टी का सफ़ाया भी कर सकती है या उसमें फिर से जान भी डाल सकती है. ऐसा तभी सम्भव होगा, जब वह वोटर को यह समझाने में कामयाब हो कि हमारे साथ अन्याय हुआ है.

उसे हमदर्दी का लाभ मिल भी सकता है, पर देखना होगा कि दिल्ली की जनता का भरोसा क्या अब भी बदस्तूर बना हुआ है. उसे हमदर्दी मिलेगी या प्रतिशोध?

दूसरी ओर यदि अदालती प्रक्रिया से पार्टी यह साबित करने में सफल हुई कि उसके साथ अन्याय हुआ है, तब भी उसे लाभ मिलेगा. फ़िलहाल वह संकट से घिरी हुई नज़र आती है.

दो दिन से यह ख़बर दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में घूम रही थी कि मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यकाल पूरा होने के पहले संसदीय सचिवों को लेकर बहु-प्रतीक्षित फ़ैसला आ जाएगा. इधर गुरुवार को जीएसटी काउंसिल की तरफ़ से हुई डिनर पार्टी की तस्वीरें नमूदार हुईं.

इन तस्वीरों में वित्तमंत्री अरुण जेटली के साथ अरविंद केजरीवाल समेत 'आम आदमी पार्टी' के कुछ नेता खुशमिज़ाजी के साथ बैठे नज़र आए. इन तस्वीरों को पार्टी के ट्विटर हैंडल पर शेयर भी किया गया.

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क्या फिर चुनाव होंगे?

दोनों पक्षों के टकराव को देखते हुए इन तस्वीरों पर कई तरह की अटकलें हैं. सबसे बड़ा कयास इसे लेकर है कि क्या दिल्ली पर एक और चुनाव का साया है? और चुनाव हुआ तो क्या 'आप' इस परीक्षा को पास कर पाएगी?

पिछले साल राजौरी गार्डन विधानसभा सीट के चुनाव प्रचार के दौरान केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा था कि छह महीने में दिल्ली में एक बार फिर विधानसभा चुनाव होंगे.

राजौरी गार्डन का परिणाम आने के पहले बवाना के विधायक वेद प्रकाश आम आदमी पार्टी को छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए. बीजेपी के एक नेता ने तब दावा किया था कि क़रीब एक दर्जन विधायक पार्टी छोड़ेंगे. उन दिनों किसी ने कहा कि 30-35 विधायक नाराज हैं.

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राजनीति में 'पुरस्कारों और प्रसादों' का महत्व

आम आदमी पार्टी को 2015 में मिली भारी जीत गले में फंदा बन गई है. इतनी बड़ी संख्या में विधायकों को जोड़े रखने के लिए जरूरी है कि उन्हें उपयुक्त पुरस्कार भी दिया जाया. इस कोशिश में ही संसदीय सचिव प्रकरण हुआ. सत्ता की राजनीति में 'पुरस्कारों और प्रसादों' का महत्व है. लोग मुफ्त में जनसेवा करने नहीं आते.

पार्टी के सामने अपनों को पुरस्कृत करने की चुनौती है. सलाहकारों जैसी भूमिकाएं इसीलिए बनाई जाती हैं. इसपर बखेड़ा भी खड़ा होता है. दिल्ली में वही हो रहा है.

पिछले साल पंजाब के चुनाव के समय से ही पार्टी के भीतर असंतोष और टूट-फूट चल रही है. राजौरी गार्डन और एमसीडी के चुनावों में पार्टी की हार ने आग में घी का काम किया.

उसके बाद कपिल मिश्रा, कुमार विश्वास और 'गुप्ता जी' प्रकरणों से पार्टी के अंतर्विरोध और मुखर हुए. तभी अरविंद केजरीवाल का 'ट्विटर-कलरव' अचानक मौन हो गया.

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महायज्ञ की पूर्णाहुति

चुनाव आयोग के फ़ैसले को लेकर महीनों से अटकलें हैं. यह भी कि यह फ़ैसला 'आप' के महायज्ञ की पूर्णाहुति साबित होगा. पार्टी की मुसीबत यह है कि बीजेपी के अलावा कांग्रेस भी उसे जल्द से जल्द निपटाना चाहती है. दिल्ली की ज़्यादातर कांग्रेसी ज़मीन तो इसने ही समेटी है.

पार्टी के सामने बिगड़ती छवि का संकट है. वह जनता के सामने क्या मुँह लेकर जाएगी? अरविंद केजरीवाल का पार्टी सुप्रीमो के रूप में रूपांतरण हो चुका है. पर सरकारी विज्ञापनों के मार्फत उनकी छवि बनाने की कोशिशों का उल्टा असर पड़ा है.

दूसरी ओर केंद्र सरकार ने पार्टी को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी. पार्टी-विधायकों के खिलाफ एक के बाद एक मामले बनते चले गए. फ़र्ज़ी डिग्री, पत्नी से दुर्व्यवहार, सड़क पर मारपीट और मनी लॉन्डरिंग कुछ नहीं बचा.

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सबसे लिया पंगा

पार्टी ने भी शुरुआती दौर में सबसे पंगा लिया. बेहतर होता कि वह दिल्ली में बेहतर प्रशासन देने पर ही ध्यान केंद्रित करती. शायद उसकी इच्छा देशभर पर छा जाने की थी और केजरीवाल की इच्छा नरेंद्र मोदी का बिस्तरा गोल करके अपना आसन जमाने की नज़र आई.

ऐसा था या नहीं, पर ऐसी धारणा ज़रूर बनी. एक वीडियो संदेश में केजरीवाल ने मोदी पर आरोप लगाया, ''वह इतने बौखलाए हुए हैं कि मेरी हत्या तक करवा सकते हैं.'' इसके पहले उन्होंने मोदी को 'मनोरोगी' बताया था. कायर और मास्टरमाइंड भी. और यह भी कि मोदी मुझसे घबराता है.

माहौल ऐसा बना कि शायद मोदी के पास पास सुबह से शाम तक सिवाय केजरीवाल के कोई और मसला ही नहीं है. इन बचकाना हरकतों से पार्टी हास्यास्पद बनती चली गई. जब इस रणनीति के नकारात्मक पहलू की तरफ नजर गई, तो अचानक केजरीवाल खामोश हो गए.

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2020 से पहले ही परीक्षा

अभी कहना मुश्किल है कि यह पार्टी के 'अंत की शुरुआत' है. उसकी परीक्षा 2020 के विधानसभा चुनाव में होनी है. पर इस साल मिनी विधानसभा चुनाव जैसे हालात बने तो फ़ैसला इस साल ही हो जाएगा.

सम्भव है कि पार्टी अपने सभी विधायकों के फिर से जिताने में कामयाब हो जाए. ऐसा हुआ तो 2015 से भी बड़ा चमत्कार होगा. ऐसा नहीं हुआ तो पार्टी का 'काउंटडाउन' शुरू हो जाएगा. वह दिल्ली में डूबी तो फिर कहीं नज़र भी नहीं आएगी.

क्यों दोबारा बोलने लगे हैं अरविंद केजरीवाल?

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