पुरुषों के ख़िलाफ़ रेप महज 'अप्राकृतिक सेक्स' क्यों?

  • 23 जनवरी 2018
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पिछले कुछ सालों से भारत महिलाओं और बच्चों के ख़िलाफ़ यौन अपराध के मामलों में कार्रवाई करने में सुस्त रहा है, लेकिन अब इन मामलों को अधिक संवेदनशीलता के साथ देखा जाता है.

हालांकि पुरुषों के साथ रेप को लेकर जो ख़ामोशी है वो ज़्यादा गहरी है. भारत में रेप को लेकर जो बहस है उसमें ऐसी धारणा है कि पुरुषों के साथ रेप नहीं किया जा सकता. लेकिन सच तो यह है कि पुरुषों के साथ भी रेप होता है.

पुरुषों के साथ हुए रेप को महिला रेप से अलग क्यों देखा जाना चाहिए?

पुरुषों के साथ हुए रेप से जुड़ी ख़बरें पढ़ने को नहीं मिलती हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि अपवाद स्वरूप ही पुरुषों के साथ हुए रेप की रिपोर्टिंग होती है.

रेप में भेदभाव

पुरुषों के साथ हुए रेप के वाक़ये इसलिए सामने नहीं आते हैं, क्योंकि इसमें मर्दानगी की प्रवृत्ति शामिल है. मर्दानगी के दबाव के कारण ही पुरुष अपने साथ हुए यौन दुराचार को खुलकर बताने और क़ानूनी मदद की गुहार लगाने में शर्म महसूस करते हैं.

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2013 में मध्य प्रदेश में एक नेता के कर्मचारी ने रेप का आरोप लगाया तो भारतीय मीडिया में इसे 'गुदा मैथुन' के तौर पर पेश किया गया. दूसरे शब्दों में एक वयस्क पुरुष से रेप को यौनिकता के संदर्भ में देखा जाता है न कि अपने शरीर पर यौन हमले के रूप में.

पिछले साल एक सर्वे में पाया गया कि बाल यौन शोषण में आधे से ज़्यादा पीड़ित लड़के थे. अगर नाबालिग पुरुषों के साथ रेप हो सकता है तो फिर उस सोच का क्या मतलब है कि ताक़तवर (संपत्ति और सत्ता के मामले में) पुरुष वयस्क पुरुषों के साथ रेप नहीं कर सकते हैं?

मिसाल के तौर पर 2015 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने पाया कि भारतीय जेलों में ख़ुदकुशी की बड़ी वजह साथी क़ैदियों द्वारा किया गया रेप है.

अमरीकी एलजीबीटी (लेज़्बियन, गे, बाइसेक्शुअल, ट्रांसजेंडर) एक्टिविस्ट जॉन स्टॉक्स ने यौन स्वास्थ्य काउंसलर के तौर पर दिल्ली में छोटे समय के लिए काम किया है. उनके पास ऐसे दर्जनों मामले आए जिनमें रेप पीड़ित पुरुष और ट्रांसजेंडर थे, लेकिन उन्हें कोई क़ानूनी मदद नहीं मिलती है.

पुरुषों के साथ होने वाले रेप को एक यौन संबंध के रूप में देखा जाता है जिसमें जबरन जैसी बात पर ध्यान नहीं दिया जाता है. क़ानूनी रूप से पुरुषों से होने वाले रेप के साथ भेदभाव किया जाता है. अब वक़्त आ गया है कि पुरुषों के साथ रेप को भी मर्दानगी के दायरे से बाहर निकाला जाए.

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पुरुषों के साथ रेप और धारा 377

सुप्रीम कोर्ट में पहले से ही दो जनहित याचिकाएं लंबित हैं. पहला यह कि समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर किया जाए और दूसरा यह कि सभी यौन अपराधों को लैंगिक-तटस्थता के आधार पर देखा जाए.

मतलब यौन अपराध को लिंग के आधार पर तय नहीं किया जाए. यह देखना बहुत ज़रूरी है कि दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं.

अभी भारत में अगर एक पुरुष का रेप पुरुष करता है तो उसे भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 के तहत सज़ा मिलती है. धारा 377 के तहत 'अप्राकृतिक सेक्स' मतलब सहमति से भी एनल सेक्स (गुदा मैथुन) किया गया हो तो उसे अपराध माना जाता है.

इसमें जब तक कोई शिकायत नहीं करता है तब तक सहमति से हुए एनल सेक्स पर मामले तय नहीं किए जा सकते. धारा 377 का क़ानूनी इस्तेमाल बहुत सीमित है और इसका उपयोग कभी-कभार पुरुषों के साथ हुए रेप में किया जाता है.

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हालांकि इसके अंतर्गत अप्राकृतिक सेक्स में महिला और पुरुष के बीच सहमति से होने वाला ओरल सेक्स भी शामिल है. हक़ीक़त यह है कि धारा 377 का इस्तेमाल समलैंगिकों और ख़ास कर गे जोड़ों को प्रताड़ित करने में किया जाता है.

इसके अलावा इस क़ानून के कारण समलैंगिक जोड़े अपनी यौन चाहतों को छुपाकर रखते हैं और उसका इज़हार सार्वजनिक तौर पर नहीं करते हैं.

याचिकाकर्ता धारा 377 के ख़िलाफ़ हैं. इन्होंने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि धारा 377 सहमति से बनाए जाने वाले गे संबंधों में मान्य नहीं हो. अगर सुप्रीम कोर्ट ऐसा करता है तो धारा 377 की भूमिका केवल पुरुषों के साथ होने वाले रेप में रह जाएगी.

पर इस मामले में भी यह आदर्श स्थिति नहीं है. सरकार और न्यायपालिका को चाहिए कि वो सर्वसम्मति से धारा 377 को पूरी तरह से ख़त्म कर दे. इसकी भूमिका किसी भी तरह के सेक्स में नहीं होनी चाहिए. इसके बदले रेप के ख़िलाफ़ जो अभी क़ानून है उसे हर तरह के रेप में लागू कर देना चाहिए.

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ख़ामोशी की साज़िश

एक रेप पीड़ित पुरुष स्ट्रेट (विषमलिंगी) या गे दोनों हो सकता है. इस तरह का कोई रेप सामने आता है तो इसमें समलैंगिक होने की बात थोपने की आशंका बनी रहेगी.

समलैंगिकता को लेकर जो पूर्वाग्रह है उसे क़ानून से ही ख़त्म किया जा सकता है. इसलिए पुरुषों के साथ रेप का निपटारा समलैंगिकता विरोधी क़ानून से नहीं किया जा सकता.

किसी गे के साथ कोई पुरुष रेप करता है तो पुलिस में इसकी रिपोर्ट दर्ज़ कराना असंभव है. ज़ाहिर है इसके लिए वर्तमान क़ानून ज़िम्मेदार है. 2016 में जब एक गे से रेप हुआ तो उसे पुलिस में जाने से पहले यह डर सता रहा था कि अगर उसने रिपोर्ट दर्ज़ कराने की हिमाक़त की तो वो ख़ुद ही ग़िरफ़्तार कर लिया जाएगा.

भारत में 2012 में बाल यौन उत्पीड़न के ख़िलाफ़ एक क़ानून बना और इसे अपराध के दायरे में लाया गया. इसकी वजह यह थी कि पहले का जो बाल यौन उत्पीड़न क़ानून था उसमें रेप या यौन उत्पीड़न से पीड़ितों में केवल बच्चियां थीं और इसमें बच्चे शामिल नहीं थे.

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इस क़ानून के दायरे से वयस्क पुरुष बाहर हैं. ये अपनी पीड़ा का शायद ही इज़हार करते हैं. समलैंगिक अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाले भी इसकी आवाज़ नहीं उठाते हैं. इन्हें शायद लगता है कि बलात्कारी और बाल दुराचारी के रूप में समलैंगिकों के आने से उनके आंदोलन को धक्का लगेगा.

कथित पुरुष अधिकार समूह भी पुरुषों के साथ होने वाले रेप के ख़िलाफ़ नहीं बोल रहे हैं. पुरुषों के अधिकारों की बात मुख्य रूप से दहेज और घरेलू हिंसा के ईर्द-गिर्द ही की जा रही है.

महिलावादियों का भी रुख़ साफ़ नहीं है

नारीवादी समूह भी इसे लेकर आवाज़ नहीं उठा रहे हैं, क्योंकि इन्हें लगता है कि लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं करने वाला क़ानून बन जाता है तो इसका दुरुपयोग महिलाओं के ख़िलाफ़ किया जा सकता है.

भारत में महिला अधिकार समूहों के लिए वह शर्मनाक वक़्त था जब महिलावादी कार्यकर्ताओं ने 2012 में भारत सरकार को रेप क़ानून को लैंगिक भेदभाव से मुक्त बनाने से रोका था.

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मुंबई स्थित जानी-मानी महिलावादी एक्टिविस्ट फ्लाविया एग्नेस ने कहा था, ''एक महिला से रेप का असर काफ़ी दूरगामी होता है. उसे सामाजिक कलंक और पक्षपाती मानसिकता से जूझना पड़ता है. शादी तय करने के दौरान किसी पुरुष से कोई नहीं पूछता है कि क्या वो वर्जिन है?''

ऐसे तर्कों से उन बातों को तवज्जो दी जाती है कि रेप मुख्य रूप से शर्म और कलंक की समस्या है. शर्म और कलंक जैसी अनुभूति के कारण ही भारतीय जेलों में क़ैदी आत्महत्या कर रहे हैं. यहां तक कि उन्होंने बाल यौन उत्पीड़न क़ानून को भी जेंडर-न्यूट्रल बनाने का विरोध किया था.

जानी-मानी महिलावादी वक़ील वृंदा ग्रोवर ने कहा था, ''मैं नहीं मानती कि पुरुषों को महिलाओं की तरह गंभीर यौन हिंसा का सामना करना पड़ रहा है.'' रेप क़ानून को एक ख़ास लिंग तक सीमित रखने के बजाय उसमें पुरुषों को भी शामिल किए जाना उन्हें महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा जैसे गंभीर मुद्दे का मज़ाक बनाना लगता है.

इनके विरोध की मुख्य वजह महिलाओं के ख़िलाफ़ क़ानून का दुरुपयोग है. अगर दुरुपयोग का तर्क इतना बड़ा है तो भारत में कोई क़ानून ही नहीं बनेगा. अगर पुलिस गे को प्रताड़ित करने के लिए धारा 377 का दुरुपयोग बंद कर दे तो क्या इनका इस क़ानून का विरोध ख़त्म हो जाएगा?

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हमें इस पर तर्क-वितर्क की ज़रूरत है

धारा 377 को ज़रूर ख़त्म करना चाहिए, क्योंकि सहमति से पुरुषों के बीच एनल सेक्स को अपराध नहीं मानना चाहिए. इसके साथ ही पुरुषों के साथ रेप को भी महिला रेप के अपराध की तरह ही देखा जाना चाहिए.

2013 में एक पुरुष रेप पीड़ित ने लिखा था, ''कई बार पुरुषों के साथ रेप इसलिए भी किया जाता है ताकि उसकी मर्दानगी को अपमानित किया जा सके.'' यह चाहे जैसे भी हो लेकिन सवाल लैंगिक समानता का बना रहता है. यह एक मुख्य वजह है जिससे नारीवाद पर सवाल खड़ा हो रहा है.

भारत के नारीवादी भले इसे तवज्जो नहीं दे रहे हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट और भारत सरकार को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए. धारा 377 को ख़त्म करना चाहिए और रेप क़ानून को महिला और पुरुष पीड़ितों के समान बनाना चाहिए.

एक महिला समलैंगिक ने मुझसे कहा कि वो लेज़्बियन कम्युनिटी के भीतर महिलाओं पर महिलाओं के अत्याचार के ख़िलाफ़ मुंह नहीं खोल सकती है. इसकी एक वजह यह है कि क़ानून यौन हिंसा को इस रूप में देखता है कि पुरुष ही महिला के ख़िलाफ़ करता है.

सुप्रीम को सभी तरह की यौन हिंसा को किसी लिंग के दायरे में नहीं रखना चाहिए बल्कि इसे महिला और पुरुष दोनों पीड़ितों के लिए समान बनाना चाहिए.

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