नज़रिया: इतिहास में आख़िर क्या है राजपूतानी आन-बान-शान का सच?

  • 24 जनवरी 2018
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अभी एक साहित्यिक किरदार पद्मावती को लेकर सड़कों और टीवी चैनलों पर राजपूती शान की रक्षा की बात कही जा रही है.

सवाल उठता है कि क्या इतिहास में राजपूती शान जैसी कोई बात थी. अगर थी तो इसमें कितना मिथक है और कितनी हक़ीक़त है?

आम धारणा है कि राजपूत कभी युद्ध नहीं हारते हैं. वो पीठ नहीं दिखाते हैं. या तो युद्ध जीतकर आते हैं या जान देकर. अगर इसे सच्चाई की कसौटी पर देखें तो ऐसे कई प्रसंग हैं जिनसे ये धारणा मिथक बन जाती हैं.

1191 की तराइन के युद्ध में पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गोरी को हराया था. 1192 में फिर वहीं पर लड़ाई हुई और पृथ्वीराज चौहान को हार का सामना करना पड़ा था.

उसके बाद तो राजपूतों के युद्ध मुग़लों के साथ, सुल्तानों के साथ, मराठों के साथ युद्ध होते रहे, लेकिन किसी में जीत नहीं मिली. यह ऐतिहासिक तथ्य है.

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राजपूत युद्ध जीतकर लौटते थे या वीरगति प्राप्त करते थे ये हमेशा सच नहीं है. पृथ्वीराज चौहान जैसे महायोद्धा जिन्हें प्रतीक के तौर पर देखा जाता है, वो दूसरी लड़ाई हारे थे और उन्हें पकड़ा गया था.

मतलब पृथ्वीराज चौहान को भी वीरगति प्राप्त नहीं हुई थी. महाराणा प्रताप को भी हल्दीघाटी में अकबर से हार का सामना करना पड़ा था और उन्हें भी 'चेतक' घोड़े पर सवार होकर भागना पड़ा था.

औरंगज़ेब के जमाने में महाराजा जसवंत सिंह थे, उन्हें भी हार स्वीकार करनी पड़ी थी. तो यह पूरी तरह से मिथक है कि राजपूत या तो युद्ध जीतते हैं या वीरगति प्राप्त करते हैं.

एक दूसरा मिथक यह है कि राजपूत जिसे वचन देते हैं उसे हर हाल में पूरा करते हैं और किसी को धोखा नहीं देते हैं. इसकी मिसाल भी हमें इतिहास में नहीं मिलती है.

बल्कि इसके उलट एक मिसाल है. यह बड़ा ही दर्दनाक उदाहरण है. दाराशिकोह की पत्नी नादिरा ने 1659 के आसपास राजस्थान के राजा सरूप सिंह को अपने स्तन से पानी फेर दूध के तौर पर पिलाया था. नादिरा ने उन्हें बेटा माना था.

कहा जाता है कि उसी नादिरा को सरूप सिंह ने धोखा दिया. नादिरा के बेटे सुलेमान शिकोह को सरूप सिंह ने औरंगज़ेब के कहने पर मारा था. तो ये भी नहीं कहा जा सकता कि राजपूत जो वचन देते हैं उसे निभाते ही हैं.

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राजपूतों का योगदान

बाबर का कहना था कि राजपूत मरना जानते हैं पर जीतना नहीं जानते. इतिहास कभी मिथकों को सच साबित करने का कोशिश नहीं करता है और न ही मिथकों के आधार पर बात करता है. सच यह है कि इतिहास हमेशा मिथकों से हटकर बात करता है.

मिथक तो गढ़े जाते हैं. उसे जनमानस में बैठाया जाता है. राजपूत चूंकि शासक वर्ग था इसलिए मिथक का बनना हमें चौंकाता नहीं है. आधुनिक भारत के निर्माण में भी राजपूतों की कोई ऐसी भूमिका नहीं रही है.

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अगर हम इतिहास में राजपूतों की किसी तरह की भूमिका का मूल्यांकन करें तो मुग़ल शासन को स्थायी बनाने और फैलाने में राजपूतों की बड़ी भूमिका रही है. अकबर के ज़माने से आख़िर तक राजपूतों ने मुग़लों के शासन को स्थिरता देने में अहम भूमिका अदा की.

राजपूत मुग़ल शासन के अटूट हिस्सा बन चुके थे. अकबर से पहले तो राजपूत लड़ाइयां ही करते रहे. लगभग 300 सालों तक राजपूतों ने सुल्तानों से लड़ाइयां की हैं.

अकबर ने नीति बनाई कि राजपूतों को मिलाकर चलो और इस नीति से उन्हें साम्राज्य के विस्तार और स्थिरता में फ़ायदा भी मिला. अकबर और औरंगज़ेब के शीर्ष कोटि के योद्धाओ में महाराजा जय सिंह और जसवंत सिंह शामिल थे.

ये आख़िर तक उनके साथ रहे. औरंगज़ेब ने 1679 में फिर से जजिया कर लगा दिया था जिसे बहादुर शाह औव्वल ने आते ही ख़त्म कर दिया था. औरंगज़ेब के ज़माने में तो केरल को छोड़कर पूरे पर भारत पर मुगलों का शासन था और इसमें राजपूतों की भी भूमिका रही है. इस बात को मुग़ल भी स्वीकार करते हैं.

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तब राजपूतों को मुग़लों के साथ को लेकर शर्मिंदगी नहीं थी

राजपूतों का जो अपना साहित्य है उसमें वो बड़े गर्व के साथ मुग़लों से अपने संबंध को बताते हैं. उन्हें कोई शर्म नहीं है कि राजपूतों ने मुग़लों का साथ दिया. राजपूतों के साहित्य में तो यह बताया गया है कि देखिए हम कितने क़रीब हैं और बादशाहों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलते हैं.

मोहता नैनसी महाराजा जसवंत सिंह के सहायक थे. मोहता नैनसी की दो किताबें हैं. एक मारवाड़ विगत दूसरी नैनसी दी ख्यात. इन किताबों में कहीं भी शर्म का अहसास नहीं है कि हमने ये क्या किया और मुग़लों का साथ क्यों दिया. इन किताबों में कोई खेद या अफ़सोस नहीं है.

इस गर्व को शर्म में बदलना अंग्रेज़ ऑफिसर जेम्स टॉड ने शुरू किया. जेम्स टॉड ने ये धारणा बनाना शुरू की कि राजपूत मुग़लों के ग़ुलाम बन गए थे और अंग्रेज़ों ने इन्हें ग़ुलामी से मुक्त कराया.

मतलब मुग़लों से संबंधों को लेकर शर्मिंदगी के भाव को स्थापित करने का काम अंग्रेज़ों ने शुरू किया था. यहां तक कि पद्मावती की इज़्ज़त बचाने के लिए जौहर जैसी बातों को फैलाना टॉड ने ही शुरू किया था.

ये बातें बंगाल तक फैलाई गईं. पद्मावती के कथित जौहर की बात तो राजपूतों के साहित्य में भी नहीं थी.

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आज़ादी की लड़ाई में कहां थे राजपूत

अगर हम आज़ादी की लड़ाई की भी बात करें तो राजपूतों की कोई ऐसी भूमिका नहीं थी. बल्कि राजपूत राजाओं ने अंग्रेज़ों का ही साथ दिया था. जितने राजा थे उनमें से दो चार को छोड़ दिया जाए तो किसी ने अंग्रेज़ो के ख़िलाफ़ लड़ाई नहीं लड़ी.

लक्ष्मीबाई भी तो आख़िर में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आईं. पहले तो लक्ष्मीबाई ने भी अंग्रेज़ों से समझौते करने की कोशिश की थी. बात नहीं बनी तो उन्होंने संघर्ष की राह चुनी. लक्ष्मीबाई शुरू से बाग़ी नहीं थीं.

हमने रूपक तैयार किए हैं कि लक्ष्मीबाई ने बहादुरी दिखाते हुए देश के लिए अपनी जान तक को दांव पर लगा दिया. ये सब रूपक आज़ादी की लड़ाई के दौरान गढ़े गए थे. दरअसल सभी राजा अपने-अपने राज के लिए लड़ रहे थे. ज़ाहिर है उस वक़्त देश की कोई अवधारणा भी नहीं थी.

हम जाति के आधार पर किसी को श्रेष्ठ या वीर नहीं कह सकते हैं. हम न तो राजपूतों को वीर कह सकते हैं और न ही ब्राह्मणों को विद्वान. सबका अपना निजी स्वार्थ होता है और उसी आधार शासक काम करता है. जातियों से जुड़ा मिथक हक़ीक़त से काफ़ी दूर होता है. और इन मिथकों के लिए इतिहास में कोई जगह नहीं होती है.

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राजपूती ख़ून

मेडिकल साइंस की दुनिया में अब डीएनए जैसी चीज़ सामने हैं. भारत में कोई शुद्र हो, ब्राह्मण हो या राजपूत, 98 फ़ीसदी के ख़ून एक जैसे हैं. एक दो फ़ीसदी लोगों के अलग हो सकते हैं. राजपूती ख़ून और शुद्धता की बात तो बिल्कुल बेमानी है.

राजपूतों के मुग़लों से संबंध रहे हैं. दूसरी बात यह कि कोई एक जाति तो राजपूत बनी नहीं. कई जातियां राजपूत बनी थीं. राजपूत कई जातियों का समावेश हैं.मिक्स्चर ऑफ़ ब्लड और नस्ल तो शुरू से ही रहे हैं.

ये प्रक्रिया तो अब भी चली आ रही है और हमें तो इस पर गर्व करना चाहिए. नस्ल की शुद्धता की बात तो हिटलर करता था. शुद्धता की अवधारणा तो अब ख़त्म हो चुकी है.

राजपूतों की एक ख़ूबी हम इस रूप से रेखांकित कर सकते हैं उन्होंने वीरता की संस्कृति को स्थापित किया. राजपूतों ने मुग़लों की संस्कृति को प्रभावित किया.

(बीबीसी संवाददाता रजनीश कुमार से बातचीत पर आधारित)

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