'प्रशासन के दबाव' पर कर्ज़ लेकर बनवाए शौचालय, अब नहीं मिल रहा पैसे

  • 27 जनवरी 2018
शौचालय इमेज कॉपीरइट SEETU TEWARI/BBC

"कमाते हैं तो खाते हैं, अब पैसा कमाएं, घर चलाएं या सूद दें?"

मेरे सवाल के जवाब में श्यामलाल पासवान ने उल्टा सवाल मुझ पर ही दाग दिया था. श्यामलाल पासवान बिहार के रोहतास जिले के नोखा प्रखंड की कुर्री पंचायत के वॉर्ड नंबर 9 में रहते हैं. वह पेशे से मजदूर हैं यानी जब काम मिलता है, तभी रोटी का जुगाड़ होता है.

काम मिलने पर 250 रुपये दिन में कमाने वाले श्यामलाल बीते 10 माह से 600 रुपये सूद के तौर पर महाजन को दे रहे हैं. उन्होंने शौचालय बनवाने के लिए 12 हज़ार रुपये का कर्ज़ लिया था. इस कर्ज़ पर 5 रुपये सैकड़ा (प्रति 100 रुपये पर 5 रुपये) सूद का रेट है.

6 बच्चों के पिता श्यामलाल कहते है, "कर्जा न लेते तो क्या करते? खेत में जाने नहीं दिया जा रहा था, प्रशासन कहता था घर में करो और उठाकर बाहर फेंको. कोई कब तक घर में पैखाना करता?"

अकेले श्यामलाल की कहानी नहीं

शौचालय बनवाने के लिए कर्ज़ लेने वालों में श्यामलाल अकेले नहीं है. उनके वॉर्ड में ऐसे कई मामले हैं. कुर्री पंचायत के उपमुखिया धनजी पासवान बताते हैं, "वॉर्ड के 18 लोगों का 13 माह से प्रशासन ने पैसा लटका रखा है. ग़रीब जनता सूद ही चुकाने में पिसी जा रही है."

ग़ौरतलब है कि नोखा प्रखंड को ओपन डेफिकेशन फ्री(ओडीएफ़) यानि खुले में शौच से मुक्त घोषित किया जा चुका है. शौचालय बनवाने के लिए 15 हज़ार का कर्ज़ लिए राम स्वरूपराम बहुत बेबसी से कहते हैं, "हमको तो कागज़ देने भर का अधिकार है, बाकी सरकार जाने. 15 हजार का कर्ज़ लेकर शौचालय बनवाया है, जब तक नहीं बनवाया था रोज़ प्रशासन दौड़कर आता था. अब पैसा मिलना है तो सब ग़ायब हैं."

दरअसल स्वच्छ भारत अभियान के तहत हर घर में शौचालय की मुहिम जोर-शोर से चलाई जा रही है. तकरीबन एक साल से राज्य में खुले में शौच करने वालों पर सख़्ती बरती जा रही है.

यही वजह है कि ग़रीबी रेखा के नीचे जीवन बसर करने वालों ने भी कर्ज़ लेकर शौचालय बनवाया है. लेकिन 12 हज़ार रुपये की अनुदान राशि मिलने में हो रही देरी के चलते ये लोग सूद और कर्ज़ के जंजाल में फंस गए हैं.

पुष्पा देवी रोहतास के तिलौथू प्रखंड के सेवही पंचायत की वॉर्ड सदस्य हैं. तिलौथू प्रखंड भी ओडीएफ़ घोषित हो चुका है लेकिन ग़रीबों को कर्ज़ के जंजाल में डुबोकर.

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Image caption पुष्पा देवी

जैसा कि पुष्पा बताती हैं, "मेरे वॉर्ड में 90 घरों में से 6 घरों को पैसा अभी तक नहीं मिला है. हमने सूद पर पैसा लेकर शौचालय बनवाया क्योंकि उस वक्त अधिकारी आते थे और कहते थे कि शौचालय नहीं तो राशन-किराना भी बंद हो जाएगा. बीडीओ के पास पैसे के लिए जाते हैं तो वे कहते हैं सरकार के सात निश्चय, मानव श्रृंखला पर ध्यान दीजिए."

कर्ज़ में डूबे गांववासी

दरअसल शौचालय की अनुदान राशि मिले इसके लिए जिओ टैगिंग( तस्वीर जिसमें लैटीट्यूड और लॉन्गिट्यूड दोनों दर्ज़ हो जाते हैं) और स्वच्छ भारत मिशन नंबर ज़रूरी है.

कर्ज़ में डूबे 32 साल के रोहतास के काराकाट प्रखंड के गोरी गांव के मनीष बताते है, "6 माह में तीन-चार बार चेकिंग हो चुकी है, फ़ोटो खींच कर ले गए हैं, लेकिन पैसा अभी तक नहीं मिला है. 10 माह से 10 रुपये सैकड़ा के हिसाब से हम सूद दे रहे है. बाल-बच्चे का ट्यूशन छूट गया है. अब उसके लिए पैसा कहां से लाएं?"

इसी प्रखंड के मोहनपुर गांव के दिनेश पर 47 हजार रुपये का कर्ज़ है. दरअसल अपने भाई-बहन के इलाज के लिए उन्होंने 35 हजार रुपये कर्ज़ लिया था. बाद में शौचालय के लिए 12 हज़ार रुपये और कर्ज़ लिया.

मनरेगा मज़दूर दिनेश कहते हैं, "हमने साहब लोगों से कहा था कि हम ख़ुद गड्ढा खोदकर शौच करके उसे ढक देंगे, लेकिन वे लोग नहीं माने."

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Image caption शौचालय अनुदान के लिए प्रदर्शन करती महिलाएं

लोगों की परेशानी का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि अनुदान राशि के लिए धरना-प्रदर्शन हो रहे हैं. बीती 24 जनवरी को ग्रामीण मज़दूर यूनियन के बैनर तले रोहतास में प्रदर्शन हुआ.

ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ रोहतास ज़िले का ये हाल है, पूरे राज्य में कर्ज़ लेकर शौचालय बनवाने वाले लोग मिल जाएंगे. जैसा कि कटिहार की चितौरिया पंचायत के सरपंच जितेन्द्र पासवान बताते हैं, "लोगों को पैसा अब तक नहीं मिला है, अब हम क्या कर सकते हैं. हमारे हाथ में तो कुछ नहीं है."

हालांकि सरकार लोगों की इन मुश्किलों से बिल्कुल अनजान लगती है. पीएचइडी मंत्री विनोद नारायण झा ने बीबीसी से कहा, "ये जांच का विषय है लेकिन हमारी नीति यही है कि शौचालय बनवाइए, पैसा पाइए.''

वह कहते हैं, ''बाकी दुनिया में इथियोपिया और बांग्लादेश जैसे छोटे देश ओडीएफ़ हो गए बिना एक पैसा खर्च किए, लेकिन हमारे यहां लोग इसे सरकार के ख़िलाफ़ हथियार बना रहे हैं."

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