#HerChoice : जब मेरे पति ने मुझे छोड़ दिया, तब मैंने खुद से प्यार करना सीखा

  • 29 जनवरी 2018
सांकेतिक तस्वीर

उस रात जब मेरे पति घर से बाहर निकले, तो मुझे ऐसा लगा कि जैसे मेरी दुनिया ही तबाह हो गई है.

उस तबाही की आवाज़ कहीं सुनाई नहीं दी, उसकी जगह एक भयानक चुप्पी ने ले ली.

मैं अपनी 10 साल की बेटी के साथ खड़ी उन तस्वीरों और यादों को देख रही थी जो पिछले 17 साल में हमने साथ में संजोए थे.


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मैंने कई बार उनसे बात करने की कोशिश की, लेकिन हर बार उन्होंने यही जवाब दिया कि हमारी शादी अब ख़त्म हो चुकी है.

उन्होंने इसकी कोई वजह नहीं बताई, ना ही उन्हें इसका कोई पछतावा था.

बाद में मुझे उनके दोस्तों के ज़रिए मालूम चला कि वे अपने साथ काम करने वाली एक महिला के साथ रिलेशनशिप में हैं.

उन हालात को बयां करने के लिए 'स्तब्धरह जाना' कोई मुनासिब शब्द नहीं है. मैं अब और जीना नहीं चाहती थी. मैंने खूब सारी दवाईयां एक साथ खाईं.

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शायद मैं मर जाती, लेकिन जाने कैसे मैं बच गई. मैंने उनके आगे कभी अपनी ज़िंदगी की कल्पना ही नहीं की थी, मैंने अपनी शादी के आगे कभी कुछ सोचा ही नहीं था.

मैं अपने प्यार को किसी दूसरी महिला के साथ नहीं देख सकती थी. मैं इस सच्चाई को स्वीकार नहीं करना चाहती थी.

मैं अपने जीवनसाथी को दूसरी महिला के साथ बांटने के लिए तैयार नहीं थी.

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खुद से नफ़रत करने लगी

मैं जलन और दुख से घिरी हुई थी. मैं उस महिला को कोस रही थी, जबकि मैं यह भूल गई थी कि मेरे पति का भी इसमें उतना ही योगदान है.

मैं यह भी समझ रही थी कि यह सबकुछ एक पल में नहीं हुआ. बीती कई यादें मेरे दिमाग में चलने लगीं और मैं उन्हें एक-एक कर जोड़ने लगी.

मैंने खुद की तरफ़ देखना शुरू किया और मुझे लगा कि मैं खूबसूरत नहीं हूं ना ही मैं ज़्यादा पैसे कमाती हूं.

'तुम्हें पाना मेरी खुशकिस्मती है', यह बात मेरे लिए बदलकर ऐसी हो गई कि 'तुम्हारा मेरी ज़िंदगी में आना मेरी बदकिस्मती है'

'तुम बेहद खूबसूरत हो', यह बदलकर हो गया 'तुम मेरे साथ रहने लायक नहीं हो.'मैं उनकी शहरी गर्लफ्रेंड के सामने किसी गांव की गंवार जैसा महसूस करने लगी.

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सबसे ज़्यादा प्यार

वो मुझे कहते, 'तुम्हें तो अंग्रेजी बोलनी तक नहीं आती, कौन तुम्हे नौकरी पर रखेगा?'

मैं ना सिर्फ़ उनकी नज़रों में गिर रही थी बल्कि मैं खुद की नज़रों में भी अपने आप को कमतर महसूस करने लगी. मुझे लगने लगा कि मैं उनके लायक हूं ही नहीं.

मैं घर का हर एक काम संभालती, बाज़ार से सामान खरीदने से लेकर घर के बीमार की देखभाल करने तक सभी काम मैं संभालती.

उन्होंने मुझे बाहर ले जाना बंद कर दिया, ना किसी पार्टी में ना डिनर में और ना ही किसी सामाजिक समारोह में.

जिस इंसान को मैंने सबसे ज़्यादा प्यार किया, वहीं मुझे त्याग रहा था, खुद से दूर कर रहा था. धीरे-धीरे, हमारे बीच जो प्रेम था वह ख़त्म होता चला गया.

मुझे इस प्रेम के ख़त्म होने का एहसास हुआ तो मैंने इसे वापिस पाने की कोशिशें करने लगी, लेकिन कामयाब ना हो सकी, और एक रात वो घर से निकल गए.

Image caption आखिरकार थककर मैं आपसी सहमति से तलाक़ लेने के लिए तैयार हो गई

रिश्ता बचाने के लिए...

घर से चले जाने के बाद वो किसी दूसरे घर में रहने लगे और मैंने अपनी बेटी और ससुरालवालों के साथ उसी घर में रहना जारी रखा.

ऐसा नहीं है कि मेरे ससुराल वाले मुझे वहां रखना चाहते थे, बस उन्हें एक उम्मीद थी कि शायद मेरे वहां रहने से वो वापिस लौट आएंगे.

दरवाज़े पर होने वाली हर एक दस्तक पर मैं दौड़कर देखने जाती लेकिन वहां कभी कूरियर वाले का चेहरा या नौकर को पाकर निराश हो जाती.

मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी ही उनके आस-पास बुन ली थी, मेरी उम्र इसी में गुज़र चुकी थी. यह वक्त एक नई शुरुआत करने का नहीं था.

अपने रिश्ते को बचाने के लिए मैंने कई बार सोचा, मैं खुद से लड़ती रहती. मेरी मानसिक हालत को समझने के लिए मेरी बेटी बहुत छोटी थी.

तलाक़ की अर्ज़ी

इन सब वजहों से मेरी सेहत बहुत खराब रहने लगी. मैं चाहती थी कि उनके कंधे पर सिर रखकर आराम कर सकूं.

मुझे उनकी ज़रूरत महसूस होती, मैं चाहती कि जो घाव उन्होंने मुझे दिए थे वो उसपर मरहम लगा सकें. उन्होंने कोर्ट में तलाक़ की अर्ज़ी डाल दी.

तमाम मुश्किल हालातों के बीच मैंने वह केस लड़ा. मुझे यह समझने में तीन साल लग गए कि जिस रिश्ते को बचाने की मैं कोशिश कर रही हूं वह तो कब का मर चुका है.

मैं उस इंसान के लिए यह सब कर रही हूं जिसका मेरी ज़िंदगी में कोई अस्तित्व ही नहीं है. अंत में मैं थक गई.

मैं थक गई कोर्ट के चक्कर काटते-काटते, वकीलों के सवालों के जवाब देते-देते और कानूनी खर्चों को उठाते-उठाते.

आख़िरकार मैं आपसी सहमति से तलाक़ लेने के लिए तैयार हो गई.

दोस्तों ने हिम्मत दी और बन गई 'सिंगल मदर'

मैंने अपनी नई पहचान को स्वीकार कर लिया, 'तलाकशुदा', एक ऐसा उपनाम जिसे हमारे हमारे रूढ़िवादी समाज में इज्ज़त के साथ नहीं देखा जाता.

मैं उस वक्त 39 साल की थी. मेरे लिए सबसे पहली चुनौती एक नया घर खोजने की थी. मुझे कई सवालों का सामना करना पड़ा, जैसे तुम्हारे पति कहां हैं?

वे क्या काम करते हैं? मैं इन सवालों के लिए तैयार नहीं थी. मैं दोबारा उन पुरानी कड़वी यादों में नहीं जाना चाहती थी. मेरी दोस्तों ने मुझे इससे बाहर निकलने में मदद की.

वो मेरी ज़िंदगी में किसी फ़रिश्ते की तरह आईं. उन्होंने मुझे हिम्मत दी और 'सिंगल मदर' बनने के लिए तैयार किया. यह सब इतना आसान नहीं था.

मेरे पति ने तलाक़ लेने के तुरंत बाद अपनी उस सहयोगी के साथ शादी कर ली. मैं जब भी उन्हें साथ देखती, मेरे घाव दोबारा हरे हो जाते.

नई यादों को संजोने के लिए...

उसी मुश्किल वक्त में मेरे माता-पिता का निधन भी हो गया. मेरी ज़िंदगी में सिर्फ़ दो ही चीज़ें बाकी रह गईं, मेरी नौकरी और मेरी बेटी.

मैं अपने करियर पर ध्यान देने लगी और धीरे-धीरे कॉरपोरेट घरानों की सीढ़ियां चढ़ने लगी. मैं पढ़ने और अपने विचारों को ब्लॉग के रूप में लिखने में व्यस्त रहने लगी.

मैंने खुद को अपने पसंदीदा शौक यानि 'लेखन' में व्यस्त कर लिया. अपने पति के लिए खाना बनाने की बजाए अब मैं अपने दोस्तों के लिए खाना बनाने लगी.

मैं पार्टियां करने लगी, छोटी-छोटी ट्रिप पर जाने लगी और नई यादों को संजोने के लिए तस्वीरें खींचने लगी.

अपने पति की कमी को पूरा करने के लिए मैंने वर्चुअल दुनिया यानि सोशल मीडिया पर कई दोस्त बनाने शुरू कर दिए.

Image caption आज मुझे किसी की ज़रूरत नहीं, मैं एक आत्मनिर्भर महिला बन गई हूं

खुद से प्यार करना सीख लिया

इस वर्चुअल दुनिया ने मुझे आभास कराया कि मेरे आसपास का संसार कितना बड़ा है.

मेरा अकेलापन फेसबुक पर मेरी पोस्ट पर आने वाले लाइक और कमेंट्स से दूर होने लगा.

मैं एक ऐसे संगठन के साथ जुड़ गई जो गरीब-अनाथ बच्चों के लिए काम करता है, इससे मुझे बहुत ज़्यादा सकारात्मक ऊर्जा मिली.

मैं एक बार फ़िर अपनी ज़िंदगी जीने लगी, मुझे अपनी ताकत का एहसास होने लगा और मैंने अपनी पीएचडी भी पूरा कर ली.

जो कुछ भी मेरी ज़िंदगी से चला गया था, मैं उन तमाम पलों को वापिस हासिल करने लगी.

शर्म महसूस करने की जगह, मैंने लोगों से मिलना और शादियों में जाना शुरू कर दिया. इतना ही नहीं, मैंने सुंदर साड़ियां पहननी शुरू कर दी.

नए शहर में नई ज़िंदगी

मैं उन लोगों को सीधा जवाब देना चाहती थी जो यह सोचते थे कि एक अकेली तलाक़शुदा महिला को हमेशा दुखी रहना चाहिए.

ऐसे लोग मुझे देखकर अपनी आंखे बड़ी कर लिया करते, लेकिन इससे मेरे आंखों की चमक और ज़्यादा बढ़ जाती.

मैंने अपना खुद का घर बना लिया और ऑफिस ट्रिप पर कई देशों की यात्राएं भी की.

चार साल बाद, मुझे एक बड़ा फ़ैसला करना था. एक नई नौकरी के सिलसिले में मुझे अपना शहर छोड़कर दूसरी जगह जाना था. मैंने नए शहर में बसने का फ़ैसला कर लिया.

मैंने एक स्वतंत्र महिला के रूप में दोबारा जन्म लिया. आज मुझे किसी के कंधे की ज़रूरत नहीं.

मैं अकेले चल सकती हूं, पूरे आत्मविश्वास के साथ, चाहे अंधेरा कितना ही घना क्यों न हो!

(यह कहानी दक्षिण भारत में रहने वाली एक महिला की ज़िंदगी पर आधारित है जिनसे बात की बीबीसी संवाददाता पद्मा मीनाक्षी ने. महिला के आग्रह पर उनकी पहचान गुप्त रखी गई है. इस सिरीज़ की प्रोड्यूसर दिव्या आर्य हैं.)

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