BUDGET SPECIAL: विदेशी निवेश की बौछार, फिर नौकरियों की क्यों है मार?

  • 30 जनवरी 2018
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नरेंद्र मोदी सरकार में विदेशी निवेश लगातार बढ़ रहा है. फिर भी बेरोजगारों की फ़ौज लगातार बढ़ रही है.

देश में डॉलर और पाउंड समेत विदेशी मुद्रा की बरसात जारी है. केंद्र में सत्तारूढ़ मोदी सरकार इस बरसात को और तेज़ करने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही है.

प्रधानमंत्री मोदी अपने हर विदेशी दौरे में निवेशकों को भारत आने की दावत देते हैं और उनके लिए रेड कार्पेट बिछाने की बात करते हैं. नतीजा, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफ़डीआई लगातार बढ़ता जा रहा है.

निवेश

हाल ही में सरकार ने एफ़डीआई नियमों में और रियायतों का एलान किया. सरकार ने रिटेल, नागरिक विमानन, निर्माण और पावर एक्सचेंज में सीधे विदेशी निवेश को हरी झंडी दे दी है. यानी अब सिंगल ब्रैंड रिटेल में जहाँ ऑटोमैटिक रूट से 100 फ़ीसदी विदेशी निवेश हो सकता है, वहीं एयर इंडिया में भी 49 फ़ीसदी पैसा विदेशियों का लग सकता है.

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आंकड़े क्या कहते हैं?

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, सबसे ज़्यादा विदेशी निवेश सर्विस सेक्टर यानी वित्तीय, बीमा, गैर वित्तीय, आउटसोर्सिंग, कोरियर आदि क्षेत्रों में आ रहा है. मोदी सरकार के अब तक कार्यकाल में कुल 139 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हुआ.

इनमें से कुल निवेश के तक़रीबन 23 अरब डॉलर की एफ़डीआई इन्हीं क्षेत्रों में आई है. इसके अलावा ट्रेडिंग में 10.36 अरब डॉलर, ड्रग्स एंड फार्मा में 3.97 अरब डॉलर, होटल और टूरिज़्म में 3.49 अरब डॉलर की एफ़डीआई आई.

विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड ऊंचाई पर है. रिज़र्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, मार्च 2017 में विदेशी मुद्रा भंडार 370 अरब डॉलर पर था. यानी ये रकम इतनी है कि भारत आराम से अपने 10 महीने से अधिक का इंपोर्ट बिल चुका सकता है.

एफ़डीआई की अब तक की ये कहानी 'अच्छे दिनों' का अहसास कराती है, लेकिन सवाल ये है कि जब देश में इतना पैसा आ रहा है तो युवा बेरोज़गार क्यों हैं और नौकरियों के नए मौके क्यों नहीं बन रहे हैं?

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नौकरियों की क्यों है मार?

दरअसल, एफ़डीआई से पहली नज़र में ये लगता है कि विदेशी निवेश आने से रोज़गार के नए मौके बनेंगे. लेकिन हक़ीक़त में ऐसा नहीं हो रहा है.

मोदी ने सत्ता में आने से पहले अपनी चुनावी रैलियों में नई नौकरियां देने का ज़ोर-शोर से बखान किया था और वादा किया था कि अगर बीजेपी सत्ता में आई तो हर साल दो करोड़ नई नौकरियां देगी. लेकिन नई नौकरियां पैदा करने का ये आंकड़ा करोड़ तो दूर लाखों में सिमट कर रह गया.

तो इतनी छप्पर फाड़ विदेशी रकम बरसने के बाद भी हिंदुस्तान में बेरोज़गारी इतनी बड़ी समस्या क्यों है. बीबीसी हिंदी ने आर्थिक मामलों के जानकार भरत झुनझुनवाला और प्रंजॉय राह ठाकुरता से बातचीत की.

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भरत झुनझुनवाला का नज़रिया

ये सही है कि भारत में लगातार एफ़डीआई आ रही है, लेकिन हो ये रहा है कि ये पैसा उन क्षेत्रों में नहीं लग रहा है, जहाँ श्रम शक्ति या लोगों को रोज़गार मिलेगा.

मसलन एक बिस्कुट फ़ैक्ट्री लगती है और उसमें एक हज़ार लोगों को रोज़गार मिलता है तो इस पर तो सरकार की नज़र है, लेकिन सरकार ये आकलन नहीं करती है कि एक बड़ी फ़ैक्ट्री लगने से बिस्कुट बनाने की कितनी छोटी फ़ैक्ट्रियां बंद हो जाएंगी और कितने लोगों की नौकरियां छिन जाएंगी.

अब कपड़ा उद्योग को ही देखें तो विदेशी निवेश बड़ी-बड़ी मीलों में आ रहा है. नतीजा ये हो रहा है कि हैंडलूम या हथकरघा उद्योग का धंधा खत्म हो गया है. ये किसी विशेष सेक्टर में नहीं हो रहा है, बल्कि तकनीकी और बड़े पैमाने पर उत्पादन की आड़ में नई नौकरियां बनने के बजाय रोज़गार छिन रहा है.

असल में सरकार को सभी उद्योगों में रोजगार का ऑडिट कराना चाहिए. ये देखना चाहिए कि किस तकनीकी से उत्पादन करने से रोज़गार बनते हैं और किस तकनीकी से रोजगार छिन रहा है. सरकार को उन तकनीक या मशीनों पर टैक्स लगाना चाहिए, जिनके इस्तेमाल से रोज़गार का हनन होता है.

जहाँ तक सरकार के मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया जैसे कार्यक्रमों की बात है तो इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि स्किल होने के बावजूद भी क्या इन्हें रोज़गार मिल पा रहा है.

इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि जिन क्षेत्रों के लिए तकनीक आवश्यक है, जैसे कि पेट्रोलियम, कंप्यूटर या आईटी, इनमें आधुनिक तकनीकी प्राथमिकता होती है और होनी भी चाहिए, लेकिन कागज, अगरबत्ती, कपड़ा जैसे उद्योगों में मशीनों को राहत देनी होगी, तभी बात बनेगी. श्रम पैदा करने वाले सेक्टर्स मसलन टेक्सटाइल्स, कंस्ट्रक्शन, एग्रो प्रोसेसिंग और पर्यटन में नई नौकरियां देने पर वित्तीय सब्सिडी जैसी पहल से भी नए रोज़गार बनाने में मदद मिलेगी.

जहाँ तक अरुण जेटली के 2018-19 के बजट से उम्मीदों का सवाल है, तो एक संभावना ये है कि छोटे उद्योगों के कलस्टर को बढ़ावा मिले. बाज़ार में उत्पादों के बीच अंतर करने की ज़रूरत है, यानी मशीनों द्वारा उत्पादित माल और हाथ से तैयार माल पर टैक्स में अंतर होना ही चाहिए.

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''उम्मीद है, भविष्य में अच्छे दिन आएंगे''

प्रंजॉय गुहा ठाकुरता का नज़रिया

विदेशों से आ रही पूंजी से रोजगार के मौके बहुत तेज़ी से नहीं बढ़ रहे हैं, इसमें हैरान होने वाली बात नहीं है. वजह ये है कि देसी और विदेशी निवेशकों का पहला लक्ष्य मुनाफ़ा हासिल करना होता है. इसलिए वो आधुनिकतम तकनीकी से अधिक से अधिक उत्पादन पर फ़ोकस करते हैं.

भले ही सरकार ने नए रोजगार के लिए स्किल इंडिया, मेक इन इंडिया जैसे मंत्र दिए हैं, लेकिन हक़ीक़त ये है कि सबसे ज़्यादा रोजगार यूपीए द्वारा लागू किए गए मनरेगा में ही मिल रहा है.

आपको याद दिला दूं कि प्रधानमंत्री मोदी ने 2015 में मनरेगा को ग़रीबी खत्म करने में कांग्रेस की 'असफलता' का 'जीता जागता स्मारक' बताया था. लेकिन बाद में यू-टर्न लेते हुए 2017-18 के बजट में मनरेगा के लिए आवंटन में 11 हजार करोड़ रुपये का इज़ाफ़ा करते हुए इसे 48 हजार करोड़ रुपए कर दिया.

मनरेगा के इतिहास में ये सबसे ज़्यादा आवंटन था.

हाल ही में सरकार ने लोकसभा में भी बताया था कि प्रधानमंत्री रोजगार निर्माण कार्यक्रम के तहत 2016-17 में 4 लाख 8 हज़ार रोजगार के मौके बने, जबकि मनरेगा में 235 करोड़ रोजगार दिवस बने (यानी 235 करोड़ लोगों के लिए कम से कम एक दिन का रोज़गार पैदा किया.)

असल चिंता तकनीकी बेरोज़गारों की है. देशभर में निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों की बाढ़ आ गई है, लेकिन कुछेक को छोड़कर अधिकतर कॉलेजों में कैम्पस प्लेसमेंट लगभग ना के बराबर हैं.

सरकार ख़ुद मानती है कि साल 2016 में नेशनल स्किल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन ने साढ़े पांच लाख से अधिक युवाओं को प्रशिक्षित किया, लेकिन सिर्फ़ 12 प्रतिशत को ही नौकरियां मिल पाईं.

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''ऐसे अच्छे दिन ना ही हों तो बेहतर''

बजट में क्या कर सकती है सरकार?

आर्थिक मामलों के जानकारों का मानना है कि क्योंकि रोज़गार के मामले में मोदी सरकार पर लगातार चौतरफ़ा हमले हो रहे हैं और सरकार के पास भी इस मोर्चे पर उपलब्धियों के नाम पर गिनाने के लिए बहुत कुछ नहीं है. ऐसे में अरुण जेटली 2018-19 के बजट में कुछ घोषणाएं कर सकते हैं.

  • पहली राष्ट्रीय रोज़गार नीति की घोषणा संभव. इस नीति के तहत श्रमिकों पर निर्भर सेक्टर्स में नियोक्ताओं के लिए वित्तीय मदद का एलान हो सकता है.
  • श्रम क़ानूनों में भी बदलाव संभव. सरकार पहले ही फ़िक्स्ड टर्म कॉन्ट्रैक्ट के संबंध में मसौदा प्रस्ताव पेश कर चुकी है जिसके तहत उद्योग एक निश्चित समय के लिए कर्मचारियों को रोज़गार पर रख सकेंगे और परियोजना ख़त्म होने पर उनकी सेवाएं ख़त्म हो जाएंगी.
  • प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के लिए फ़ंड आवंटन बढ़ सकता है (सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2017-18 में अब तक इस योजना के तहत 1.44 लाख करोड़ रुपये के कर्ज़ 3 करोड़ से अधिक लोगों को दिए गए हैं.)
  • सड़क, रेलवे और राष्ट्रीय राजमार्गों की नई निर्माण योजनाओं की घोषणा संभव (सरकारी अनुमानों के मुताबिक, सालाना 10,000 किलोमीटर सड़क निर्माण से लगभग चार करोड़ लोगों को रोज़गार मिलता है.)
  • नई नौकरियां पैदा करने वाले स्टार्टअप्स के लिए सरकार द्वारा दिए जाने अंशदान में कुछ और राहत संभव (अभी कुछ शर्तों के साथ इन्हें पहले तीन साल तक सरकार से सहायता मिलती है.)
  • सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम यानी एमएसएमई की परिभाषा में बदलाव संभव. (अभी 50 करोड़ रुपये तक के टर्नओवर वाले उद्योग को एमएसएमई का दर्जा हासिल होता है).

मोदी सरकार के लिए चेतावनी की घंटी अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन यानी आईएलओ ने भी बजाई है.

संगठन के अनुसार भारत में पिछले साल की तुलना में 2017-18 में बेरोज़गारी ज़्यादा होगी. पिछले साल बेरोजगारों की संख्या 1.77 करोड़ थी और वो इस साल 1.78 करोड़ तक जा सकती है.

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