जब जनेऊ तोड़ कर दिल्ली से घर आए थे गोरख पांडे

  • 29 जनवरी 2018
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Image caption गोरख पांडे की तस्वीर

उत्तरप्रदेश के हाटा क़स्बे से लगभग 20 किलोमीटर आगे देवरिया ज़िले में बसा 'पंडित का मुंडेरा' गांव सर्दियों की घनी धुंध में डूबा हुआ था. गन्ने के खेत, गेहूं की फसलें और छोटे पौधों की एक विशाल नर्सरी पार करते हुए जब हम वहां पहुंचे तब तक शाम ढल चुकी थी.

इस गांव के अंतिम छोर पर बसा गुलाबी बरामदे वाला खूबसूरत घर क्रांतिकारी जनकवि गोरख पांडे का पैतृक निवास है.

मुझे लगा जैसे घर के बरामदे में टंगा केसरिया रंग का उनका बड़ा सा पोर्ट्रेट शाम के सिन्दूरी आसमान में घुलकर, आने वाली नई सुबह की ओर उम्मीद से इशारा कर रहा है. बिल्कुल उनकी लोकप्रिय कविताओं और जनवादी गीतों की तरह.

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Image caption गोरख पांडे का घर

गोरख पांडे की कविताओं से मेरा पहला परिचय सात साल पहले मध्यप्रदेश के खंडवा ज़िले में हुआ था. नर्मदा नदी पर बन रहे बांधों के विरोध में एक विरोध प्रदर्शन चल रहा था. तभी अचानक इस खांटी विंध्याचल-मालवा क्षेत्र में सड़क पर गूंजते एक भोजपुरी गीत के स्वर ने मुझे चौंका दिया.

गोरख के 'समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई', गीत को मग्न होकर लय में गाते कुछ युवकों ने ध्यान खींचा. ठीक एक साल बाद दिल्ली के जंतर मंतर पर जारी एक विरोध प्रदर्शन में मैंने इस गीत को दोबारा सुना.

तब दिल्ली से बड़वानी और देवरिया तक समान प्रभाव रखने वाले इस जनवादी कवि के प्रति मन में कौतुहल जागा. मालूम करने पर गोरख की क्रांतिकारी कविताओं और लोकप्रिय भोजपुरी गीतों का एक पूरा क्षितिज मेरे सामने खुल गया.

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Image caption गोरख पांडे को मिला एक साहित्यिक सम्मान दिखाते हुए उनके परिजन

'कमरे में कर ली आत्महत्या'

29 साल पहले आज ही के दिन गोरख ने दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के झेलम होस्टल के अपने कमरे में आत्महत्या कर ली थी.

इन सर्दियों में गोरख के पैतृक गांव की यात्रा के दौरान मैंने 'आशा के गीत' जैसी उम्मीद भरी कविताएं लिखने वाले जनवादी कवि और अपनी मानसिक आस्थिरता के आगे घुटने टेक देने वाले गोरख की भावनात्मक सघनता के अलग-अलग पहलुओं को छूने का प्रयास किया.

गोरख के घर पहुंचते ही हमारी मुलाक़ात उनके सबसे छोटे भाई सुनील पांडे और भतीजे विष्णु पांडे से होती है. गोरख के साथ बिताए वक़्त और उनकी असामयिक मृत्यु के बाद की परिस्थितियों को याद करते हुए सुनील की भूरी आंखें छलछला जाती हैं.

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Image caption इस घर में हुआ था गोरख पांडे का जन्म

'विद्रोही थे गोरख'

गोरख के विद्रोही स्वभाव को याद करते हुए वो कहते हैं, "वो दिल्ली से अपना जनेऊ तोड़ कर आये थे. इस पर हमारे पिताजी बहुत नाराज़ हुए तो कहने लगे कि यह धागा बांध कर दिन भर झूठ बोलता रहूं, ऐसे मेरे संस्कार नहीं हैं. और तो और उन्होंने हमारे मंझले भाई के उपनयन संस्कार के बीच में सबके सामने उनका भी जनेऊ तोड़ दिया. पिताजी बहुत दुखी हुए थे", सुनील हंसते हुए कहते हैं.

सुनील आगे बताते हैं, "कुछ भी हो जाए, होली में भैया घर ज़रूर आते थे. आते थे पर घर में रुकते नहीं थे. गावं के गरीबों और दलितों की बस्ती में जाते. वहीं गीत गाते. वहां की महिलाएं सब उनके लिए बहनें और भाभियां थीं. उनके साथ गीत गाते, रंग खेलते और उनकी झोपड़ियों में बैठ कर उन्हीं से मांग कर खाना खाते.

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Image caption अपने पिता को लिखे गोरख पांडे के पत्र

''हमारे पिताजी बहुत नाराज़ होते. कहते कि जिनसे हम बात भी नहीं करते उनके घर जाकर खाना खाता है. उनमें और पिताजी में अक्सर बहस होती. भैया आते तो अपने ही खेत में जाते और वहां काम कर रहे मजदूरों से जाकर कहते कि मेरे पिताजी की ज़मीन पर तुम लोग कब्ज़ा कर लो. जब पिताजी कहते कि ये मजदूरों को भड़का रहा है तो सबके सामने पिताजी से कहते कि इतनी ज़मीन का क्या करिएगा, सब मज़दूरों में बांट दीजिए. सबको बराबर ज़मीन मिलनी चाहिए."

गोरख के भतीजे विष्णु बताते हैं कि गोरख की इन बातों पर गांव के लोग अचरज करते, परिवार के लोग कभी गुस्सा होते तो कभी हंसी में उड़ा देते पर असल में कोई गोरख को समझ नहीं पाया. "यहां कोई उन्हें समझता नहीं था. उनके जाने के बाद जब दिल्ली में उनके नाम का जलसा निकला तब यहां परिवार में लोगों को लगा कि गोरख कोई बड़ी चीज़ थे".

जब गांव में छाया था मातम

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Image caption अपने पिता को लिखे गोरख पांडे के पत्र

सुनील बताते हैं कि गोरख की मृत्यु की खबर आते ही उनके पूरे गांव में मातम छा गया था. "पूरे गावं में चूल्हा नहीं जला था. गावं के जितने गरीब मजदूर थे, सबके घरों में चीख पुकार मची थी. अगले दिन टीवी पर आया था और सभी अखबारों में ख़बर छपी थी कि डॉक्टर गोरख पांडे ने जेएनयू के हॉस्टल में खुद को फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. लोग अखबार में छपी उनकी तस्वीर हाथ में लेकर रो रहे थे. गरीब दुखिया का तो मानो अपना परिवार चला गया हो. किसी को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि वो अपनी जान खुद ले सकते हैं".

गोरख से अक्सर नाराज़ रहने वाले उनके पिता ललित पांडे को भी उनकी मृत्यु से ऐसा सदमा लगा कि उनकी आंखों की रोशनी हमेशा के लिए चली गई.

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Image caption अपने पिता को लिखे गोरख पांडे के पत्र

विष्णु ने बताया, "जब आत्महत्या की खबर आई, तभी बाबा का मोतियाबिंद का ऑपरेशन हुआ था. अभी एक हफ्ता उनको आराम करना था. लेकिन ख़बर सुनकर वह भी तुरंत गांव के आठ-दस लोगों के साथ अगली ट्रेन पकड़कर दिल्ली के लिए रवाना हो गए. फिर झेलम हॉस्टल गए. सबसे बड़े जवान बेटे को इस तरह देख लिए. अंतिम संस्कार भी खुद ही किए. जवान बेटे के ऐसे अंत का उनको इतना गहरा धक्का लगा कि दिखाई देना बंद हो गया. इस घटना के बाद 6 साल जिंदा रहे बाबा, लेकिन कभी देख नहीं पाए."

आत्महत्या के बाद गोरख के कमरे से एक ख़त बरामद हुआ था जिसमें उन्होंने लिखा था कि वो अपनी मानसिक बीमारी से तंग आकर आत्महत्या कर रहे हैं. उनकी बीमारी के दिनों को याद करते हुए सुनील बताते हैं, "जब उनकी तबीयत बिगड़ने लगी तो तब हमारे दोनों जीजाजी और मंझले भैया उनकी मदद के लिए दिल्ली गए.''

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''डॉक्टर ने उन्हें स्थिर करने के लिए (इलेक्ट्रिक) शॉक दिया और सभी परिवार वालों से कहा कि गोरख को इस बात का पता नहीं चलना चाहिए कि उन्हें शॉक दिया गया है. पर होश में आते ही उन्होंने सबसे पहले यही पूछा कि डॉक्टर ने मुझे बिस्तर पर लिटाया था, उसके बाद क्या किया मेरे साथ? बार-बार यही सवाल पूछते की डॉक्टर ने क्या किया मेरे साथ. किसी ने नहीं बताया, लेकिन उन्हें खुद ही आभास हो गया कि उन्हें शॉक दिया गया है. इस बात ने उनको भीतर तक तोड़ दिया था".

गोरख की मृत्यु के बाद 'जागते रहो सोने वालों' और 'स्वर्ग से विदाई' जैसे उनके कविता संग्रहों के कई संस्करण प्रकाशित हुए. "ये आँखें हैं तुम्हारी तकलीफ़ का उमड़ता हुआ समन्दर, इस दुनिया को जितनी जल्दी हो बदल देना चाहिए", जैसी अनेक लोकप्रिय कविताएं लिखने वाले गोरख को उनके भोजपुरी भाषा में लिखे गए जनवादी गीतों ने एक जनकवि बनाया.

हर गुज़रते साल के साथ गोरख की बढ़ती लोकप्रियता के बारे में बात करते हुए सुनील की आखें फिर भर जाती हैं. वह कहते हैं, "हमको बहुत अच्छा लगता है यह सोचकर कि इतने महान कवि हमारे घर में पैदा हुए. इतनी बड़ी जगह से डॉक्टरेट की पढ़ाई करने वाले हमारे ब्लॉक से वह पहले थे. पढ़ने में बहुत मेधावी और सबसे प्यार करने वाले. सबसे अलग थे गोरख."

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