पंचायत के पैसों से सरकार लगाएगी मोबाइल टावर?

  • 2 फरवरी 2018
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छत्तीसगढ़ की ग्राम पंचायतों को ग्रामीण विकास के लिए दी गई केंद्र सरकार की सहायता राशि को राज्य सरकार ने वापस ले लिया है. चौदहवें वित्त आयोग से यह रक़म पंचायतों को सड़क, बिजली और पानी जैसी सुविधाओं के विस्तार के लिए दी गई थी.

लेकिन राज्य सरकार ने मोबाइल कंपनियों के लिए टावर लगाने के नाम पर 70 प्रतिशत रकम राज्य सरकार के खाते में जमा करने के निर्देश पंचायतों को जारी किये. उसके बाद पंचायतों या ग्राम सभा की अनुमति के बिना ही उनके बैंक खातों से रकम निकाल ली गई.

सरकार के इस फैसले से पंचायतों में भारी नाराज़गी है.

सरपंचों का कहना है कि सरकार के इस क़दम से गांवों में विकास कार्य प्रभावित होंगे. वहीं विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार निजी मोबाइल कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिये असंवैधानिक तरीके से पंचायतों के बैंक अकाउंट से पैसे निकाल रही है.

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लोगों के पैसों से लगेगा मोबाइल टावर

छत्तीसगढ़ में 20279 गांव और 9810 ग्राम पंचायत हैं.

केंद्र सरकार का ग्रामीण विकास मंत्रालय गांव की मूलभूत सुविधाओं के लिए हर साल प्रति व्यक्ति 488 रुपये की रकम सीधे पंचायतों के खाते में जमा करवाता है. लेकिन पंचायतों से राज्य सरकार द्वारा पैसा निकाले जाने से गांव में सड़क-नाली जैसी ज़रूरी सुविधाओं के काम बंद हो गए हैं.

असल में छत्तीसगढ़ सरकार ने पिछले साल अगस्त में दो चरणों में लगभग 55 लाख लोगों को मुफ़्त स्मार्टफ़ोन बांटने का फ़ैसला किया था.

ढाई करोड़ की आबादी वाले छत्तीसगढ़ में 55 लाख लोगों को मुफ़्त स्मार्टफ़ोन बांटने की सरकार की इस योजना के क्रियान्वयन का मतलब है कि राज्य के हर परिवार को सरकार मुफ़्त में स्मार्टफ़ोन देगी.

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संचार क्रांति योजना

छत्तीसगढ़ सरकार की संचार क्रांति योजना के तहत स्मार्टफ़ोन बांटने की शुरुआत इस साल फरवरी में होनी है, जहां लगभग 10 महीने बाद ही विधानसभा चुनाव होने हैं. लेकिन मामला मोबाइल नेटवर्क पर जा कर अटक गया.

डिजिटल इंडिया के तमाम नारों के बीच छत्तीसगढ़ में मोबाइल नेटवर्क का हाल बुरा है. हालात ये हैं कि राजधानी रायपुर के नगर निगम के इलाकों में भी मोबाइल नेटवर्क काम नहीं करता. सरकार राज्य भर में संचार का नेटवर्क बढ़ाने के लिए तरह-तरह के उपक्रम कर रही है.

यही कारण है कि स्मार्टफ़ोन बांटने की घोषणा करते समय मंत्रिमंडल ने फ़ैसला लिया था कि दूरसंचार सेवा प्रदाताओं को स्वयं के खर्चे पर नेटवर्क विस्तार करने के लिए प्रोत्साहित किया जायेगा. बाद में विधानसभा में भी सरकार ने यही कहा.

लेकिन अब सरकार ने पंचायतों को वित्त आयोग से मिली राशि में से 610 करोड़ रुपये वापस ले कर मोबाइल टावर के लिए देने का निर्णय लिया है.

सरकार ने पंचायतों को निर्देश दिया कि वित्त आयोग से मिली 70 फ़ीसदी रकम वे चेक के माध्यम से पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग को वापस करें, जहां से यह राशि नया मोबाइल टावर लगाने या उसकी क्षमता बढ़ाने के लिये छत्तीसगढ़ इंफोटेक प्रमोशन सोसायटी को दे दी जाएगी.

सरकार के इस निर्देश का गांवों में विरोध होने लगा. कई इलाकों में तो रक़म वापस करने के नाम पर ग्रामसभा भी आयोजित की गई. लेकिन बात नहीं बनी तो सरकार ने पंचायतों से पूछे बिना ही उनके खाते से रक़म निकालनी शुरू कर दी.

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'संचार क्रांति करने का शौक है तो...'

आरंग इलाके के सरपंच हिम्मत चंद्राकर कहते हैं, "संचार क्रांति करने का शौक है तो उसके लिये अलग विभाग हैं, अलग मद हैं. मेरे पंचायत के बैंक खाते से सरकार ने 4.50 लाख रुपये निकाल लिए हैं. अब जिस जनता ने गांव की मूलभूत सुविधाओं के लिए हमें चुना है, उसे हम क्या जवाब दें?"

रायपुर ज़िले में सरपंच संघ के अध्यक्ष हिम्मत चंद्राकर का आरोप है कि इससे पहले वित्त आयोग की रक़म तीन अलग-अलग स्तरों पर दी जाती थी. लेकिन केंद्र सरकार ने पंचायत का पैसा सीधे पंचायत को देने का इसलिए निर्णय लिया, ताकि विकास के काम में गति आए.

अब राज्य सरकार के ताज़ा फ़ैसले से पंचायतों की आर्थिक स्थिति खस्ताहाल हो जाएगी.

धरसींवा के सरपंच अमी रेड्डी की पंचायत से 5.38 लाख रुपये राज्य सरकार ने निकाले हैं. अमी रेड्डी इसी सप्ताह इलाके के दूसरे सरपंचों के साथ दिल्ली जाने की तैयारी में जुटे हुए हैं.

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रेड्डी कहते हैं, "केंद्र सरकार का पैसा राज्य सरकार निजी कंपनी के मोबाइल कंपनी को बांटने के लिये कैसे इस्तेमाल कर सकती है? सरकार ने चुनाव में लाभ के लिये स्मार्टफ़ोन बांटने का निर्णय लिया है. लेकिन उसके लिये पंचायतों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है. "

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष और विधायक भूपेश बघेल का आरोप है कि सरकार का यह फ़ैसला असंवैधानिक है. भूपेश बघेल का कहना है कि पंचायतों को केंद्र से मिलने वाली रकम को जबरदस्ती निकाल सर सरकार ने पंचायत क़ानून का भी अतिक्रमण किया है.

बघेल कहते हैं, "गांव में पीने का पानी नहीं है, सड़क नहीं है. इसके बजाए सरकार मोबाइल कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिये बिना पंचायतों की सहमति के उनके बैंक खातों से रुपये निकाल रही है. इस पर तत्काल रोक लगनी चाहिये."

लेकिन राज्य के पंचायत मंत्री अजय चंद्राकर का कहना है कि वित्त आयोग की रक़म का उपयोग मोबाइल टावर लगाने के लिये करने का निर्णय मंत्रिमंडल में हुआ है. पंचायत के विकास के लिये जहां तक पैसे की बात है, तो सरकार कई दूसरे मदों से भी विकास के लिये पंचायतों को पैसे देती है.

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भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता संजय श्रीवास्तव के पास अपने तर्क हैं. उनका कहना है कि सरकार ने एक दूरगामी निर्णय लिया है.

संजय कहते हैं, "माना कि पंचायत का पैसा है लेकिन मोबाइल टावर भी पंचायत या ग्रामीण इलाके में ही लगाया जायेगा और इसका लाभ भी ग्रामीण लोगों को ही होना है. इसमें राजनीति नहीं होनी चाहिये."

फिलहाल तो राज्य के सरपंच केंद्र सरकार से गुहार लगाने की तैयारी में हैं और कुछ अदालत का रुख भी कर सकते हैं. ज़ाहिर है, ऐसा हुआ तो सड़क नाली के बजाये मोबाइल सुविधा की सरकारी तैयारी आसान नहीं होगी.

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