क्या मोदी का अंतिम बजट किसानों के लिए है?

  • 2 फरवरी 2018
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मोदी सरकार का अंतिम पूर्ण बजट गुरुवार को पेश कर दिया गया. अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले सरकार का यह अंतिम आम बजट था.

इस बजट से किसानों को काफी उम्मीदें थीं, वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने बजट भाषण में किसानों का जिक्र भी काफी देर तक किया, लेकिन क्या यह बजट सच में किसानों के दुख दर्द को दूर करने वाला साबित होगा और क्या इस बजट से देश के किसानों की बदहाल खस्ता हालत में कुछ सुधार हो पाएगा, ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब देश का हर किसान जानना चाहता है.

आउटलुक हिंदी पत्रिका के संपादक हरवीर सिंह ने मौजूदा बजट में किसानों के लिए जो सकारात्मक चीज़ें निकलकर आई उस ओर ध्यान दिलाने की कोशिश की. उनसे विस्तार से बात की बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी.

बजट पर हरवीर सिंह की राय

सरकार ने कहा है कि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलना चाहिए और इसकी व्यवस्था की जाएगी. इसके लिए नीति आयोग को नया फ़ॉर्मूला तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई है. यह एक तथ्य है कि जहां भी किसानों को सरकारी ख़रीद उपलब्ध नहीं होती वहां उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य भी नहीं मिलता.

दूसरी बात जो सरकार ने इस बजट में की है वह है कि उन्होंने किसान क्रेडिट कार्ड को अब डेरी और मछलीपालन के लिए भी जारी कर दिया है, इससे इन किसानों को भी सस्ता कर्ज मिल सकेगा.

इसके अलावा फार्मर प्रोड्यूसर कंपनियों को टैक्स में लाभ देने की बात भी कही गई है. ये कुछ सकारात्मक कदम हैं जो सरकार ने इस बजट में किसानों के लिए उठाए हैं.

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सरकार के दावे में कितना दम?

इस बजट में सरकार ने किसानों का ख्याल तो रखा है लेकिन कई ऐसे मसले हैं जिन्हें सरकार ने छोड़ दिया.

ऐसी उम्मीद की जा रही था कि किसानों को कर्ज़ में जो ब्याज राहत मिलती है उसमें वृद्धि होगी लेकिन यह राहत नहीं मिल पाई, सरकार के सामने यह एक चुनौती है क्योंकि औपचारिक तरीकों से किसानों को अभी भी महज 25 से 30 फीसदी ही कर्ज़ मिल पा रहा है, बाकी का कर्ज़ उसे असंगठित क्षेत्र से ही उठाना पड़ता जिसमें उसे ऊंची ब्याज दर चुकानी पड़ती है.

सरकार ने इस ब्याज में 1 लाख करोड़ बढ़ाया है लेकिन फिर भी यह मांग के हिसाब से बहुत कम है. सरकार को ब्याज की छूट भी बढ़ानी चाहिए थी. इसके अलावा अभी यह देखना होगा नीति आयोग न्यूनतम समर्थन मूल्य का कौन सा फॉर्मूला तैयार करता है. इसके साथ ही ग्रामीण हाट के आधारभूत ढांचे के लिए 2 हजार करोड़ का प्रावधान किया है वह भी कम है.

इस बजट ने कुछ शंकाएं और सवाल भी खड़े किए हैं. सरकार का लक्ष्य है कि 2022 तक किसानों की आय दोगुनी कर दे, इसका रास्ता किसानों को बेहतर दाम के माध्यम से ही आता है. सरकार ने दावा किया है कि किसानों को उनकी लागत के ऊपर 50 फीसदी मुनाफा देंगे साथ ही वित्त मंत्री ने अपनी पहली ही पंक्ति में कहा है कि हमने रबी में यह दाम दे दिया है.

इसका फायदा तो किसानों को मिलता दिख नहीं रहा है, यानि किसानों को उनकी फसल का उचित दाम नहीं मिल रहा है, इसका मतलब ये भी है कि सरकार स्वामिनाथन कमिशन की रिपोर्ट से अलग अब किसी दूसरे फॉर्मूले की तलाश करती दिख रही है. क्योंकि जो दाम किसानों को मिला है उसमें 50 फीसदी बढोत्तरी बिलकुल नहीं है इसलिए इस दावे पर सवाल खड़े होते हैं.

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क्या वायदे पूरे कर पाएगी सरकार?

कुछ फैसले तो ऐसे हैं जिन्हें देखकर लगता है कि सरकार किसानों को फायदा पहुंचाना चाहती है लेकिन कई मसले ऐसे हैं जिनमें पेचीदिगियां बरकरार हैं, और इन्हें अभी जमीन पर उतरने में वक्त लगेगा.

जिस तरह से बजट पेश किया गया उसकी भाषा और तरीका ऐसी है कि सरकार यह बताना चाहती है कि वह किसानों के लिए सोच रही है, इस पूरे बजट को देखने पर ऐसा लगता भी है सरकार गांव और किसानों के लिए केंद्रित थी. इस बजट में एक दिशा दिखती है.

सरकार 23 फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य केंद्र घोषित करती है, लेकिन गेंहू, धान और कपास की फसलों को छोड़ दें तो बाकी फसलों की सरकारी खरीद के लिए उपयुक्त तंत्र मौजूद नहीं है.

अब सरकार यह कह रही है कि जो भी न्यूनतम समर्थन मूल्य तय होगा वह चाहे सरकारी खरीद हो या बाजार में बिके, उसका दाम तय रहना चाहिए और इसके लिए नीति आयोग राज्यों के साथ मिलकर एक सही फॉर्मूला तैयार करेगा. सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही रहती है कि वह किसानों को उसकी फसल का उचित दाम दिलवाए.

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बजट में क्या बाकी रह गया?

सबसे बड़ी बात तो यह है कि किसानों को सस्ता कर्ज़ मिलना चाहिए, मुझे तो लगता है कि उन्हें बिना ब्याज के कर्ज मिलना चाहिए. क्योंकि किसान की फसल बाजार मूल्य से कम पर बिकती हैं इसलिए इस बात का खास ख्याल रखा जाना चाहिए था.''

वहीं सरकार ने किसानों के मुनाफे का 50 प्रतिशत देने का वायदा किया है सरकार इसे पूरा करके दिखाए.

वैसे तो नोर्थ ब्लॉक में जो लोग बजट तैयार करते हैं वे किसानों से बात तक नहीं कर पाते, वे या तो कॉरपोरेट या अधिकारियों से ही बात करते हैं. सरकार को किसानों की चिंता तो रहती है लेकिन यह चिंता वोट के संदर्भ में ही ज़्यादा रहती है.

(बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी के साथ बातचीत पर आधारित)

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