#HerChoice: 'मैं गैर-मर्दों के साथ फ़ेसबुक पर चैट करती हूं'

  • 3 फरवरी 2018
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जब पहली बार फ़ेसबुक पर उसका मैसेज आया तो चौंक गई थी. दिल धक्क से रह गया. पति घर पर नहीं थे फिर भी लगा कोई चोरी कर रही हूं. एक ऑनलाइन मैसेज को खोलने से पहले भी इधर-उधर देखा कि कोई देख तो नहीं रहा.

खुद पर हंसी भी आई. सोचा, 'कितनी बेवकूफ़ हूं, घर में अकेली बैठी हूं, किससे डर रही हूं.'

उसने लिखा था - "हाई, मैं तुमसे फ़्रेंडशिप करना चाहता हूं.''

पढ़कर मुंह पर मुस्कुराहट आ गई. फिर झेंप भी हुई.

'एक अनजान आदमी के इंटरनेट पर आए मैसेज में क्यों दिलचस्पी लूं मैं?'

पति का ख़याल आते ही एक टीस सी उठी मन में. कोफ़्त भी हुई.

ये इनकी बेरुखी ही है कि एक अनजान आदमी का लिखा 'हाई' भी मेरे दिल में गुदगुदी कर सकता है.

एक बार को शायद उसे जवाब ना भी देती. लेकिन इन पर इतना गुस्सा था कि तुरंत लिख भेजा - 'हाई!'


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उसका नाम आकाश था

पता नहीं उसे कैसे ये ग़लतफ़हमी हो गई कि मैं एयरहोस्टेस हूं. चाहती तो उसे सच बता देती, लेकिन मुझे भी मज़ा आ रहा था.

बचपन से सबको कहते सुना था कि मैं बहुत सुंदर हूं.

दूध जैसा रंग, बड़ी-बड़ी आंखें, तीखे नैन-नक्श, छरहरी काया. लेकिन घर वालों को तो शादी की पड़ी थी. जो पहला लड़का समझ में आया, उसी के साथ चलता कर दिया.

लेकिन उस आदमी को न रोमांस से मतलब है, न मेरी भावनाओं से.

मुझे लगता था कि शादी के बाद पति मुझे आंख भरकर देखेंगे, रूठूंगी तो मनाएंगे, सरप्राइज़ देंगे और कुछ नहीं तो सुबह मेरे लिए एक कप चाय ही बना देंगे!

पर एकदम मशीन की तरह है उनकी ज़िंदगी - सुबह उठो, दफ़्तर चले जाओ. दस बजे आओ, खाना खाओ, सो जाओ.

गले लगाने में कितना वक्त लगता है?

ऐसा नहीं है कि मुझे समझ नहीं आता कि वो मसरूफ़ हैं लेकिन अपनी पत्नी को प्यार से निहारने या उसे गले लगाकर प्यार के दो शब्द बोलने में कितना वक़्त लगता है!

लेकिन मेरे पति में या तो ऐसी भावनाएं ही नहीं हैं और या फिर उन्हें ज़ाहिर करना उनकी मर्दानगी को सूट नहीं करता.

सेक्स कर लेंगे, लेकिन रोमांस नही. एक साल की शादी में हमने आज तक फ़ोरप्ले नहीं किया!

मैं कितना भी अच्छा खाना बना दूं, घर को कैसा भी रखूं, कभी तारीफ़ का एक शब्द नहीं बोलते. पूछो तो कह देंगे 'ठीक है'.

इन्हीं सब ख़यालों में खोई हुई थी कि आकाश ने दोबारा पिंग किया. वो मेरी फ़ोटो देखना चाहता था.

इंटरनेट की दुनिया मेरे लिए नई थी. फ़ेसबुक पर अकाउंट भी इन्होंने बनाया था. फ़्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट करना भी इन्होंने ही सिखाया था.

लेकिन फ़ोटो डालने से डर लगता था. सबको कहते सुना था कि लोग इंटरनेट से फ़ोटो चुराकर पॉर्न साइट्स पर डाल देते हैं.

लेकिन आकाश मुझे देखने के लिए बेचैन था.

कुछ दिन तक मैंने टालमटोल की. फिर उसे बता दिया कि मैं वो एयरहोस्टेस नहीं हूं.

'मुझे लगा कि अब वो चला जाएगा'

लेकिन उसने और ज़्यादा ज़िद पकड़ ली. भेज भी देती पर एक भी ढंग की फ़ोटो नहीं थी मेरे पास!

आकाश ख़ुद भी शादीशुदा था. तीन साल का बेटा था उसका.

मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता था. विदेश जाता रहता था. ख़ूब पार्टियां होती थीं जिनमें लड़कियों का सिगरेट-शराब पीना आम बात थी. मेरे लिए ये नई तरह का रोमांच था.

उसकी पत्नी भी किसी बड़ी कंपनी में काम करती थी. उसने बताया कि वे एक-दूसरे को ज़्यादा वक़्त नहीं दे पाते.

एक दिन बोला कि "मैं आज बहुत दुखी हूं और मेरी पत्नी इसलिए बात नहीं कर पाई कि वो मीटिंग में है."

मैं उसका दर्द समझ सकती थी.

हम रोज़ बात करते. बहुत मज़ा आता था.

यह सब मेरे साथ पहली बार हो रहा था. एक समय तो ऐसा आया कि मुझे सुबह से ही एक्साइटमेंट होने लगता कि जल्दी से काम ख़त्म करूं तो बात करेंगे.

एक दिन बोला "वेबकैम पर आओ." मैं घबराकर ऑफ़लाइन हो गई, लगा मैं तो अभी नहाई भी नहीं. ऐसे देखेगा तो क्या सोचेगा.

लेकिन अब उसने मुझे देखने की रट पकड़ ली थी.

कुछ समझ नहीं आया तो मैंने उसे अवॉइड करना शुरू कर दिया.

उसके ऑनलाइन होने के समय मैं ऑफ़लाइन हो जाती. कुछ दिन ऐसा चला फिर एक दिन चिढ़कर उसने मुझे ब्लॉक कर दिया.

हमारा कोई रिश्ता नहीं था लेकिन फिर भी उसका जाना मेरी ज़िंदगी को और ख़ाली बना गया.

खुद पर गुस्सा आने लगा कि मैं नौकरी क्यों नहीं करती. पैसे कमाती तो अपनी मर्ज़ी से फ़ैसले ले सकती थी.

इसके बाद कुछ समय तक मैंने किसी से बात नहीं की, लेकिन दिमाग़ में हमेशा आकाश की बातें घूमती रहतीं. याद आता कि उसके साथ दिन कितनी जल्दी गुज़र जाता था. बेवजह मुस्कुराती रहती थी.

देखा जाए तो इसका सबसे बड़ा फ़ायदा मेरे पति को मिला. उनके कुछ किए बग़ैर ही मेरी ज़िंदगी का वो गैप भर गया जो उन्हें नज़र नहीं आता था.

और सोचा जाए तो मैं कुछ ग़लत तो कर नहीं रही थी. न मैंने किसी को धोखा दिया, न किसी ग़ैर मर्द के साथ सोई. बस बातचीत की जिससे मुझे याद रहे कि मैं सिर्फ़ किसी की पत्नी नहीं बल्कि एक इंसान भी हूं जिसकी अपनी कुछ ज़रूरतें हैं.

अब क्या करूं, क्या नहीं, इसी असमंजस में कुछ दिन और गुज़र गए.

फिर एक दिन ऐसे ही एक लड़के का प्रोफ़ाइल दिखा. शक्ल-सूरत अच्छी थी. पता नहीं मेरे दिमाग़ में क्या आया कि मैंने उसे फ़्रेंड रिक्वेस्ट भेज दी.

'शादीशुदा होकर फ्रेंड रिक्वेस्ट क्यों भेजी'

उसने पूछा कि "आप तो शादीशुदा हो, आपने मुझे रिक्वेस्ट क्यों भेजी?"

मैंने कहा - "क्यों? शादीशुदा लड़कियां क्या दोस्त नहीं बनातीं?''

बस बातचीत बढ़ती गई. मैं आज तक उसके संपर्क में हूं.

इसी तरह एक दिन मैंने फ़ेसबुक पर एक प्रोफ़ाइल देखा जिसकी वॉल पर कुछ फ़िल्म एक्टर्स के फ़ोटो लगे थे. मुझे लगा कि ये आदमी बड़ा 'फ़न्ने ख़ां' है. इसकी वॉल पर मज़ेदार चीज़ें देखने को मिलेंगी.

मैंने उसे फ़्रेंड रिक्वेस्ट भेज दी. उसने एक्सेप्ट भी कर ली.

ऐसे ही जिंदगी गुज़र रही थी कि मेरी बेटी हो गई. इसके बाद चीज़ें ठहर सी गईं. पहले दो साल तो होश ही नहीं आया कि मैं कहां हूं.

अब बेटी तीन साल की हो गई है लेकिन अब भी अपने लिए टाइम निकालना मुश्किल है.

लगता है कि किसी से बात करूं, लेकिन जैसे ही फ़ोन उठाओ, वो आ जाती है वीडियो देखने.

कभी कभी तो बहुत फ़्रस्ट्रेशन होता है कि ये क्या चल रहा है. बस एक मां और पत्नी बन कर रह गई हूं.

इसलिए मैंने तय किया है कि अपनी बेटी के साथ ये नहीं होने दूंगी. उसे कुछ बनाऊंगी ताकि वो अपनी ज़िंदगी अपनी शर्तों पर जी सके.

(यह कहानी एक महिला की ज़िंदगी पर आधारित है जिनसे बात की बीबीसी संवाददाता प्रज्ञा मानवने. महिला के आग्रह पर उनकी पहचान गुप्त रखी गई है. इस सिरीज़ की प्रोड्यूसर दिव्या आर्य हैं.)

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