इंटरनेशनल एयरपोर्ट बनाने के लिए तोड़े गए दलितों के घर

  • 4 फरवरी 2018
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"बड़ जात के पसा मिल गलै, छोट जात के न मिलल. ग़रीबन के एगो रुपइया न मिलल अ बभना सब के मिल ग. ठंडा में दुगो मौउतोल. अब गरमी में कग्गो मौत होई, के जाने. पहिले मेघे में भिजलीं, अब धूप में प्यासे मरबो हमनी के."

(ऊंची जाति के लोगों को पैसा मिला और छोटी जाति के लोगों को नहीं. गरीबों को एक रुपया तक नहीं मिला जबकि सभी ब्राह्मणों को पैसा मिल गया. मेरे टोले में ठंड से दो लोग मर गए. क्या पता अब गर्मी में कितने लोग मरेंगे? पहले बारिश और अब प्यास."

अपने टूटे घर को याद करते हुए और मुआवज़े की बात करते हुए बाबूपुर गांव की कुसमी देवी आंखों को आंचल के किनारे से पोंछती हैं और फिर एकाएक भावशून्य हो जाती हैं.

जाति से 'मुसहर' कुसमी देवी पढ़ी-लिखी नहीं हैं. न तो मायका इतना संपन्न था न ससुराल कि उन्हें पढ़ा सके.

वो सिर्फ़ खोरठा (स्थानीय बोली) ही बोल पाती हैं लेकिन रांची में बैठे अधिकतर अधिकारियों को उनकी बोली समझ नहीं आती.

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दलितों के घर टूटे

कुसमी देवी के घर से लगे ही कुछ और 'मुसहर' परिवार भी हैं. आस-पास दलितों के कुछ और मकान भी थे, जो अब मलबा बन चुके हैं.

बाबूपुर गांव झारखंड के देवघर जिले के सातर खरपोस पंचायत का हिस्सा है. गांव में अन्तरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बनने वाला है. जिसके लिए गांव के 133 घरों को तोड़ दिया गया.

जिन ज़मीनों पर ये घर थे वो सरकार ने ही भूदान आंदोलन के तहत इन लोगों को दी थी. लेकिन अब प्रशासन इसे अतिक्रमण बता रहा है.

प्रशासनिक परिभाषा के मुताबिक, इन 133 घरों की जमीनें रैयती नहीं हैं, क्योंकि भूदान के तहत मिले ज़मीन के टुकड़ों का इन लोगों ने तब सरकार से 'कन्फर्मेशन' नहीं कराया था.

हालांकि, ऐसा तर्क देने वाले अफ़सर यह नहीं बता पाते कि इस कथित 'कन्फर्मेशन' के लिए तब कोई 'स्पेशल कैंप' या 'लिट्रेसी शिविर' लगाया गया था या नहीं.

वे कहते हैं कि यह बहुत पुरानी बात है, इसलिए कुछ नहीं बता सकते.

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खुले आसमान के नीचे बच्चों का जन्म

बाबूपुर गांव में दिवाली के ठीक पहले लोगों के घर तोड़ दिए गए. जिस दिन बुल्डोज़र ने घर ढहाए, आसमान रो रहा था.

लाखो देवी की बहू खुले आसमान में, गीली ज़मीन पर प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी.

उनका दावा है कि अफ़सरों को बहू की हालत का हवाला देकर मिन्नतें भी कीं लेकिन किसी ने उस दर्द को महसूस नहीं किया.

लाखो देवी कहती हैं, "गांव की औरतों ने साड़ी का घेरा बनाया और प्रसव कराया."

अक्टूबर में घर टूटे और उसके बाद से सात बच्चे ऐसे ही मां की कोख से दुनिया में आए. जहां उनके लिए कोई छत नहीं थी.

पहले कोख में और अब गोद में अपने बच्चों के साथ मलबे पर बैठी ये मांएं कहीं न कहीं इसे नियति मान चुकी हैं.

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तीन लोगों की मौत

घर टूट गए तो लोगों ने जोड़-तोड़ करके टीन शेड डाली. लेकिन दावा है कि ठिठुरती ठंड ने तीन लोगों को लील लिया.

मरने वालों में एक पोचा मांझी भी थे. उनकी विधवा कदमी देवी आहट सुनते ही भूदान के तहत मिली ज़मीन और अपने पति की बंधुआ मज़दूरी से मुक्ति के प्रमाण पत्र लेकर खड़ी हो जाती हैं. उन्हें अब भी आस है कि सरकार उनकी सुनेगी.

उनके अस्थायी टीन शेड के सामने कागज़ के सफ़ेद प्लेट बिखरे पड़े हैं. इन प्लेटों में गांव के लोगों ने पोचा मांझी के श्राद्ध का भोज खाया था.

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क्या है मामला?

झारखंड सरकार ने एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एएआइ) और डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइज़ेशन (डीआरडीओ) के साथ एक क़रार किया है.

इसके तहत देवघर एयरपोर्ट को अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट बनाया जाना है.

इस प्रोजेक्ट में झारखंड सरकार 50 करोड़ और डीआरडीओ 200 करोड़ रुपये दे रहा है. बाकी का ख़र्च एएआइ के ज़िम्मे है.

प्रस्तावित एयरपोर्ट को इस लायक बनाया जाएगा ताकि यहां से 'ए-320' और 'सी-130' जैसे एयरक्राफ़्ट उड़ान भर सकें. इसके लिए देवघर प्रखंड के 13 गांवों की 600 एकड़ जमीन खाली कराई गई है.

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तोड़ दिए 500 घर

इसमें से करीब 438 एकड़ जमीन रैयती है, जबकि 144 एकड़ सरकारी और 18 एकड़ ज़मीन वन विभाग की है.

रैयती ज़मीनों के अधिग्रहण के क्रम में 500 से अधिक घर तोड़े गए हैं. इनमें बाबूपुर और कटिया गांव के करीब 150 घर भी शामिल हैं. बाबूपुर दलितों का गांव है, वहीं कटिया में तोड़े गए करीब बीस घर मुसलमानों के हैं.

बाबूपुर के लोग अपने टूटे घरों के मलबों के बगल में टीन के शेड बनाकर रह रहे हैं, वहीं कटिया वालों ने अपने संबंधियों के यहां शरण ले रखी है. इनका आरोप है कि दलित और मुसलमान होने के कारण इन्हें मुआवज़ा नहीं दिया गया.

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'जान देने के सिवा कोई रास्ता नहीं'

कटिया की गुलबान बीबी की उम्र करीब 65 साल है. जिस घर में वो ब्याह कर आई थीं अब वो मलबा बन चुका है. उनकी एक एकड़ ज़मीन भी अधिग्रहित कर ली गई है.

गुलबान बीबी ने बीबीसी से कहा, "घर तोड़ने के पहले हाक़िम लोग बोले थे कि नया घर बना देंगे. ज़मीन का पैसा भी देंगे. मेरी एक एकड़ ज़मीन चली गयी और हम मुआवज़े का इंतज़ार कर रहे हैं. मुझे एक करोड़ मिलना चाहिए था लेकिन एक चॉकलेट भी नहीं खा सके. अब हम दुमका जाते हैं, आते हैं लेकिन पैसा नहीं मिलता."

गुलबान बीबी के बेटे जलालुद्दीन अंसारी मज़दूरी करते हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "मुआवज़ा मांगने पर अधिकारी उन्हें हड़काने लगते हैं. हमने रिश्वत नहीं दी तो विवाद में फंसाकर दुमका का चक्कर लगवा दिया. हम लोग हर तारीख़ पर दुमका कोर्ट जाते हैं और अगली तारीख़ लेकर वापस लौट आते हैं. अब हमारे पास जान देने के सिवा और कोई रास्ता नहीं बचा है. अगर पैसा नहीं मिला, तो एयरपोर्ट के उद्घाटन के दिन ही जान दे देंगे."

कानून के तहत अधिग्रहण?

वहीं देवघर में एडिशनल डीएम अंजनी कुमार दुबे का दावा है कि झारखंड सरकार की ज़मीन अधिग्रहण नीति के तहत ज़मीनें ली गई हैं और लोगों को उसके मुताबिक मुआवज़ा भी मिला है.

कटिया के लोगों को मुआवज़े न मिलने की बात पर वो कहते हैं कि उन्हीं लोगों के मुआवज़े का मामला लंबित है, जिनकी ज़मीनों के एक से अधिक दावेदार हैं.

लिहाज़ा, ऐसे लोगों का मामला दुमका कोर्ट भेज दिया गया है. अब कोर्ट तय करेगा कि वह राशि किसे मिलेगी.

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कानून के उल्लंघन का आरोप

हालांकि झारखंड मुक्ति मोर्चा के देवघर प्रखंड अध्यक्ष सुरेश साह इससे इत्तेफ़ाक नहीं रखते.

उनका कहना है कि अधिग्रहण नीति के मुताबिक, किसी का घर तोड़ने से पहले उसे बसाना ज़रूरी है, लेकिन बाबूपुर में इस पर अमल नहीं किया गया है.

वहीं, कांग्रेस की वरिष्ठ नेता दीपिका पांडेय सिंह ने इस मामले में अधिकारियों के खिलाफ़ गैर-इरादतन हत्या का मुकदमा चलाने की मांग की है.

उन्होंने बीबीसी से कहा कि अगर इन्हें बसा दिया गया होता, तो तीन लोगों की ठंड से जान नहीं जाती. इसके लिए सरकार और उनके अधिकारी दोषी हैं.

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'घर बनाकर देंगे'

इधर, देवघर जिले के भू अर्जन पदाधिकारी अनिल कुमार यादव ने बीबीसी से कहा, ''भूदान के तहत मिली ज़मीनों का मुआवजा नहीं दे सकते. क्योंकि, कानूनन वह जमीन सरकार की थी.

  • अलबत्ता उनकी पीड़ा को देखते हुए हमने 61 लोगों को प्रति व्यक्ति 700 वर्गफीट ज़मीन और प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत उस पर पक्का घर बनाकर देने की योजना बनाई है.
  • मंजूरी मिलते ही हम उनके लिए घर बना देंगे. हमारा सर्वे अभी जारी है, अगर कुछ और लोग छूटे होंगे तो उन्हें भी इस प्रक्रिया में शामिल कर लिया जाएगा.
  • लेकिन, उन्हें अपना गांव छोड़कर बगल के नैयाडीह में शिफ्ट होना पड़ेगा.

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