कितनी सफल होगी दुनिया की 'सबसे बड़ी' हेल्थकेयर स्कीम?

  • 4 फरवरी 2018
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भारत के करोड़ों लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराए जाने के लिए जिस हेल्थ इंश्योरेंस स्कीम का ऐलान किया गया है, उसे लेकर उत्साहित होना लाज़िमी है.

स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारत का रिकॉर्ड काफी ख़राब रहा है. भारत अपनी जीडीपी का सिर्फ एक फीसदी हिस्सा जन स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करता है. बाकी देशों के मुक़ाबले ये काफी कम है.

ख़राब स्वास्थ्य और महंगे इलाज की वजह से तीन से पांच फीसदी आबादी ग़रीबी रेखा से नीचे ज़िंदग़ी काटने को मजबूर हैं.

ग्रामीण इलाकों के वाले लोग अपनी सेहत पर ख़र्च की जाने वाली एक चौथाई रकम का इंतज़ाम उधार लेकर या संपत्ति बेचकर करते हैं.

उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के मुक़ाबले भारत में बीमारियों का बोझ ज़्यादा है. ख़ास तौर पर ग़रीबों के बीच.

11 हज़ार करोड़ रुपए ख़र्च का अनुमा

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अच्छे अस्पताल कम और ग़रीबों की पहुंच से दूर हैं. इन अस्पतालों में ख़राब प्राथमिक सुविधाएं हैं. निजी अस्पताल और क्लीनिक इतने महंगे हैं कि ग़रीब तबके के लोग इनकी शरण में नहीं जा सकते.

आम बजट में जिस इंश्योरेंस स्कीम का ऐलान हुआ, उसका फायदा 10 करोड़ ग़रीब परिवारों या 50 करोड़ नागरिकों को मिलने की बात कही जा रही है. इसके तहत प्रत्येक परिवार को सालाना पांच लाख रुपये का मेडिकल कवरेज मिलेगा.

तो क्या दुनिया की सबसे बड़ी जन स्वास्थ्य योजना कारगर साबित होगी?

सरकार का अनुमान है कि प्रत्येक परिवार के लिए मेडिकल बीमे का प्रीमियम लगभग 1100 रुपए होगा और इस योजना पर केंद्र सरकार के लगभग 11 हज़ार करोड़ रुपए ख़र्च होंगे. वित्त मंत्री अरुण जेटली के मुताबिक ये दुनिया का सबसे बड़ा सरकारी वित्त पोषित स्वास्थ्य सेवा कार्यक्रम होगा.

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'योजना का कार्यान्वयन बड़ी चुनौती'

इस योजना का उद्देश्य भारत के सबसे गरीब 29 प्रतिशत लोगों, जो या तो ग़रीबी रेखा के नीचे रहते हैं या निचले-मध्यम तबके से आते हैं, को स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराना है.

इन लोगों के पास स्थायी नौकरियां नहीं हैं, बहुत कम संपत्ति है और वे ऊंची ब्याज़ दर वाले निजी कर्ज़ों में फंसे हैं. ऊपर से उन्हें अपने स्वास्थ्य का ख़र्च भी ख़ुद ही उठाना पड़ता है. ऐसे में इस तबके को सरकार की ओर से स्वास्थ्य सेवाएं देना निश्चित तौर पर एक सही दिशा में उठाया गया क़दम है.

भारत के पूर्व स्वास्थ्य सचिव और भारतीय स्वास्थ्य सेवाओं पर किताब लिखने वाले के सुजाता राव कहते हैं, "हमारे स्वास्थ्य क्षेत्र को बहुत लंबे समय से नज़रअंदाज़ किया जाता रहा है. लेकिन सबसे बड़ी चुनौती इस योजना का कार्यान्वयन है."

वास्तव में यही सबसे बड़ी चिंता भी है.

संघीय स्वास्थ्य सेवा योजनाओं और ऐसी ही जनवित्त पोषित स्वास्थ्य बीमा योजनाओं- जिन्हें एक दर्जन से अधिक भारतीय राज्यों ने साल 2007 के बाद से लागू किया है और जिनके तहत अस्पताल में भर्ती मरीज़ों की देखभाल की जाती है; का रिकॉर्ड बहुत उत्साहवर्धक नहीं रहा है.

पहले से लागू इन योजनाओं पर किए गए तेरह में से नौ शोधों के मुताबिक इन बीमा योजनाओं के दायरे में आने वाले लोगों के स्वास्थ्य ख़र्चों में किसी तरह की कमी नहीं आई है.

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अवैध भुगतान

छत्तीसगढ़ में ग़रीबों के लिए शुरू की गई एक जनवित्त पोषित स्वास्थ्य बीमा योजना पर ऐसा ही एक शोध किया गया है. इस शोध के मुताबिक बीमे के दायरे में आने और निजी अस्पतालों में जाने वाले 95 प्रतिशत मरीज़ और सरकारी अस्पतालों में जाने वाले 66 प्रतिशत मरीज़ इलाज का ख़र्च अपनी जेब से उठा रहे हैं.

सरकारी अस्पतालों में जहां अधिकतर इलाज फ्री होता है वहां भी मरीज़ों को दवाइयां और अन्य उपभोग की वस्तुएं निजी फार्मा स्टोरों से ख़रीदनी पड़ती हैं क्योंकि अस्पतालों के पास ज़रूरी दवाओं और चीज़ों की आपूर्ति ही नहीं है. साथ ही कई बार डॉक्टरों और नर्सों को अवैध भुगतान भी करना पड़ता है.

इस शोध की लेखकों में से एक सुलक्षणा नंदी कहती हैं कि निजी अस्पताल तो सीधे मरीज़ों को कह देते हैं कि वो सरकार की तय दरों पर इलाज नहीं दे पाएंगे. अस्पताल मरीज़ों से ही अतिरिक्त दरें चुकाने के लिए कहते हैं.

निजी स्वास्थ्य क्षेत्र- अपारदर्शी और भ्रष्ट

भारत का निजी स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र बहुत हद तक अनियमित, अपारदर्शी और बहुत हद तक भ्रष्ट है. यहां बिना रोक-टोक के अधिक पैसा वसूला जाता है जिससे मरीज़ों और अस्पताल प्रबंधकों के बीच विवाद भी हो जाते हैं.

अधिक ख़र्च वाली सी-सेक्शन सर्जरी का बेतहाशा बढ़ना इसी का नतीजा है. बहुत से लोगों का मानना है कि निजी अस्पताल ग़रीबों के लिए अधिक प्रतिकूल होते हैं और वो ग़रीबों के लिए आरक्षित किए गए बिस्तर भी उन्हें नहीं देते हैं.

अशोका यूनिवर्सिटी के प्रमुख प्रताप भानु मेहता कहते हैं, "अच्छी बात ये है कि स्वास्थ्य भी अब राजनीतिक मुद्दा बन रहा है लेकिन गंभीर विनियामक ढांचे के बिना हम अब भी नींद में सोए हुए से चल रहे हैं."

साथ ही, उच्च गुणवत्ता वाले निजी अस्पताल या तो बड़े शहरों में हैं या क़स्बों में. ये देखना भी मुश्किल है कि भारत के दूरस्थ इलाक़ों में रह रहे सबसे ग़रीब लोग नई बीमा योजना के तहत ऐसे अस्पतालों में किस तरह इलाज ले पाएंगे.

अब खेल बदल जाएगा?

एक और बात जो बहुत से लोग नहीं देख पा रहे हैं वो ये है कि गरीबों की जेब पर सबसे ज़्यादा असर बाहरी रोगी ख़र्चों से पड़ता है न कि अस्पताल में भर्ती होने के बाद के खर्चों से. डायगनॉस्टिक टेस्ट, फॉलोअप, सामान्य दवाएं (उदाहरण के तौर पर दिल की बीमारी के लिए स्टेटिन या मधुमेह नियंत्रण दवाएं) और ऑपरेशन के बाद की देखभाल सेवाएं बहुत महंगी हैं.

ऐसे में सिर्फ़ अस्पताल में भर्ती होने के ख़र्चों को बीमे के दायरे में लाना पर्याप्त नहीं होगा. उदाहरण के तौर पर दक्षिण के एक राज्य में ऑपरेशन के बाद से एक साल तक ग़रीब मरीज़ों को दवाइयां मुफ्त दी जाती हैं. इस बात को केंद्र सरकार के स्वास्थ्य बीमे में भी शामिल किया जा सकता है.

इस नई योजना को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थक मोदीकेयर भी कह रहे हैं. अगर इसे सही रूप में लागू कर दिया गया तो जन स्वास्थ्य सेवाओं में क्रांतिकारी बदलाव आ सकता है और ग़रीबों के लिए हालात बदल जाएंगे.

लेकिन 2008 में शुरू की गई ऐसी ही एक जनवित्त पोषित स्वास्थ्य बीमा योजना का मूल्यांकन बताता है कि इससे ग़रीब परिवारों को कोई ख़ास आर्थिक सुरक्षा प्राप्त नहीं हुई. ये योजना 13 करोड़ लोगों को कवर करती है. ऐसे में 'मोदी केयर' को कामयाब बनाने के लिए सरकार को बहुत कुछ करना होगा.

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