क्या ग़रीबों को धुंए के गुबार से निकाल पाई है मोदी सरकार की उज्ज्वला योजना?

  • 4 फरवरी 2018
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केंद्र सरकार ने क़रीब डेढ़ साल पहले ग़रीब महिलाओं को गैस सिलेंडर मुफ़्त देने वाली उज्ज्वला योजना शुरू की थी.

बड़ी संख्या में गैस कनेक्शन बांटे गए. मक़सद था ऐसी महिलाओं को लकड़ी इकट्ठा करने और उससे होने वाले धुंए से राहत दिलाना.

लेकिन बहुत से लोगों को गैस कनेक्शन मिलने के बावजूद उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वो उसे दोबारा भरा सकें.

जबकि तमाम लोगों को आवेदन के बावजूद गैस सिलेंडर नहीं मिल सका.

इस बीच 2018-19 के बजट में इस योजना के तहत आठ करोड़ गैस कनेक्शन और बाँटने का लक्ष्य रखा गया है.

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Image caption ललिता

ललिता की कहानी

पटना से सटे फुलवारी शरीफ़ की रहने वाली 15 साल की ललिता स्कूल नहीं जातीं. इसी साल जनवरी में उनकी मां ने उनके छोटे भाई को जन्म दिया है.

दुबली पतली ललिता पर घर के सारे काम संभालने की जिम्मेदारी है जिसमें सबसे अहम काम है खाना बनाना.

सात लोगों के परिवार के लिए चूल्हे पर खाना बनाने के लिए जलावन इकठ्ठा करने से लेकर सब्जी काटने-धोने तक.

एक साल पहले उज्ज्वला योजना के तहत ललिता के परिवार को रसोई गैस कनेक्शन मिला था.

वो बताती हैं, "भादों में लिए थे. एक बार भराया था, ख़तम हो गया तो फिर न भरा पाए. पैसा ही नहीं था तो कहां से भराते."

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'आर्थिक साहस'

ललिता की कहानी ग़रीबी रेखा के नीचे जीवन बसर करते इलाके के क़रीब हर परिवार की कहानी है.

यानी उज्जवला योजना के तहत गैस कनेक्शन तो मिल गया लेकिन तकरीबन 800 रुपये का सिलेंडर भराने का 'आर्थिक साहस' किसी में नहीं.

ये बात कई और महिलाएं बताती हैं. सावित्री देवी नौबतपुर प्रखंड के सरिस्ताबाद गांव की हैं. उनके पति राजू रवि दास ठेला चलाते हैं.

खाना बनाने के लिए रोजाना एक रुपये में चार के हिसाब से कंडे यानी उपले ख़रीदती हैं.

महीने के हिसाब से इस पर क़रीब छह सौ रुपये ख़र्च होते हैं, लेकिन गैस सिलेंडर नहीं भरवा पातीं.

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उज्ज्वला योजना

यही नहीं, सावित्री के क्षेत्र की वॉर्ड पार्षद गुड़िया देवी तक के यहां चूल्हे पर खाना बनता है.

वहीं बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्हें पात्र होने के बावजूद उज्ज्वला योजना का लाभ नहीं मिला.

लखनऊ से सटे मोहनलालगंज के पास हुलासखेड़ा गांव की एक महिला रामरती बताने लगीं, "जब ई स्कीम निकला था तो फ़ॉर्म भरे थे लेकिन हमें मिला ही नहीं."

"पूछने पर पता चला कि कागज पूरा नही है जबकि आधार कार्ड, राशन कार्ड और वोटर कार्ड सब रखे थे."

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परिवार को चलाने की जिम्मेदारी

सरिस्ताबाद के पास अधपा गांव की रीता कुमारी लड़कियों को फुटबॉल सिखाती हैं.

फुटबॉल के जरिए वो लड़कियों के जीवन की दुश्वारियां मसलन बाल विवाह, स्कूल से ड्रॉप आउट हो जाने की मुश्किल को कम करने की कोशिश कर रही हैं.

लेकिन खुद उनका जीवन चूल्हे के धुएं में फंसा है. हर माह 5000 रुपये कमाने वाली रीता के घर में वो अकेले कमाने वाली हैं.

पति की मृत्यु हो चुकी है और 15 लोगों के भरे पूरे परिवार को चलाने की जिम्मेदारी उन पर है.

वो कहती हैं, "ये हाल सिर्फ़ कुछ एक जगहों का नहीं बल्कि ज़्यादातर का है. गांवों में कुछ लोगों के यहां पहले से ही गैस कनेक्शन थे."

"जिनके पास नहीं थे और जो ग़रीबी रेखा से नीचे आते थे, उन्हें इस योजना के तहत दिए गए."

"लेकिन दोनों ही तरह के लोगों के पास गैस भरवाने के पैसे नहीं जुट पाते और उन्हें चूल्हे में ही धुंए में खाना बनाना पड़ता है.

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गैस कनेक्शन

कुछ दिन पहले ही कुशीनगर ज़िले के दीनापट्टी गांव में ऐसे ही कुछ लोगों से मुलाक़ात हुई. इस गांव में ख़ुद मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी गैस कनेक्शन बांटने आए थे.

गांव के ही 65 वर्षीय बुज़ुर्ग शिवपूजन सिर पर लकड़ी का एक मोटा गट्ठर रखे चले आ रहे थे.

पूछने पर बताने लगे, "खाना बनाने के लिए ले जा रहे हैं अउर का. उज्ज्वला योजना वाला सिलेंडर मिला था लेकिन बहुत महंगा है."

"कहां से लाएं इत्ता पैसा जो हर महीने गैस सिलेंडर खरीदें."

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ग़रीब महिलाएं

कुछ महिलाएं ये कहते हुए भी मिलीं कि "दिक़्क़त तो बहुत है लेकिन जब गैसे मिले तब तो. सरकार ने तो एक बार मुफ़्त दे दिया लेकिन हर बार 800 रुपये कहा से आएंगे?"

बहरहाल, सरकार आठ करोड़ नए कनेक्शन जारी करने जा रही है.

लेकिन कहीं ऐसा न हो कि ये नए सिलेंडर भी खाली होने के बाद धूल धूसरित ही मिलें और ग़रीब महिलाओं को धुंए में ही खाना बनाने पर विवश होना पड़े.

ऐसा इसलिए क्योंकि ये नए लोग भी गैस ख़त्म होने पर क़रीब 850 रुपये का सिलेंडर दोबारा भरा पाएंगे, इस पर वैसे ही संशय है.

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