बचपन में 'गंदी हरक़त' के शिकार बच्चों कैसे मिले न्याय

  • 6 फरवरी 2018
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"बचपन में मेरी बहन के पति ने मेरा यौन शोषण किया." ये आपबीती है 53 साल की पूर्णिमा गोविंदाराजुलू की.

वो बताती हैं, "अक़सर रात को जब भी मेरी नींद खुलती, उन्हें अंधेरे में मैं अपने बगल में बैठा पाती. वो मेरे प्राइवेट पार्ट टटोटले. मैं चुपचाप डरी सहमी सी सब कुछ सहती."

पूर्णिमा ने change.org पर एक याचिका की शुरूआत की है, जिसमें उन्होंने इसी आपबीती का जिक्र किया है.

पूर्णिमा आगे लिखती हैं, "मारे शर्म के मैं किसी से ये बात कह ही नहीं पाई. इसी उलझन में 13 साल बीत गए. बड़े होने पर मुझे एहसास हुआ- मेरे साथ बचपन में जो हुआ, उसी को यौन उत्पीड़न कहते हैं. इस बात का भी पता चला कि ऐसा सहने वाली मैं अकेली नहीं थी."

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यौन उत्पीड़न

सालों बाद साहस जुटाकर पूर्णिमा ने इस बारे में अपने परिवार से बात की. उनकी बात का समर्थन उनके परिवार के दूसरे कज़न ने भी किया.

उसके साथ भी बहन के पति ने यौन शोषण किया था. पूर्णिमा को लगा कि आज भी वो आदमी दूसरे बच्चों के साथ वैसे ही करता होगा.

इसलिए पूर्णिमा ने फैसला किया कि अपने यौन उत्पीड़न के लिए जिम्मेदार अपने ही रिश्तेदार के खिलाफ शिकायत दर्ज कराएंगी.

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लेकिन जब वो पुलिस में शिकायत दर्ज़ कराने पहुंचीं, तो पुलिस को इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी कि किस कानून और किस प्रावधान के तहत एक वयस्क अपनी बचपन के यौन शोषण पर शिकायत दर्ज करा सकता है.

पूर्णिमा को इस बात का बेहद अफसोस हुआ कि वो अपने यौन शोषण के जिम्मेदार आदमी को उसके किए की सज़ा नहीं दिला पाई.

उससे भी ज्यादा अफसोस इस बात का हुआ कि वो बाकी बच्चों को भी उस आदमी के चंगुल से नहीं बचा पाईं.

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क्यों शुरू की याचिका?

change.org पर याचिका शुरू करने के पीछे पूर्णिमा ने अपनी मंशा भी साफ की है. उनके मुताबिक वो इस समय हताश और निराश जरूर हैं, लेकिन आसानी से हार नहीं मानना चाहती.

इस मामले को वो आगे सरकार तक लेकर जाना चाहती हैं. उनके मुताबिक बच्चों से इस बारे में अपेक्षा रखना कि वो अपने यौन शोषण करने वाले के खिलाफ खुद ही शिकायत करेंगे, वास्तविकता से परे है.

पूर्णिमा आपबीती सुनाती हैं, "मुझे तो बचपन में पता ही नहीं था कि मेरे साथ क्या हो रहा था. मुझे ये भी नहीं पता था कि मैं अपनी शिकायत लेकर किसी बड़े के पास भी जा सकती हूं. इसलिए मैं चुप रही. लेकिन मैं ऐसी अकेली लड़की नहीं हूं."

पूर्णिमा का दावा है कि इस याचिका के जरिए वो उन तमाम वयस्कों की लड़ाई लड़ रहीं हैं जो उनकी तरह बचपन में यौन शोषण के शिकार रहे हैं.

इस याचिका के जरिए वो चाहतीं हैं कि सरकार कानून में बदलाव कर वयस्कों को बचपन में हुए यौन शोषण की शिकायत दर्ज़ कराने की इज़ाजत दें.

क्या कहता है कानून ?

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साल 2012 में बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल अफेंसेस (पोक्सो) एक्ट लाया गया था.

इस कानून के तहत शिकायतकर्ता एक साल से अठारह साल की उम्र का हो सकता है. वयस्कों को इस कानून के तहत शिकायत करने का कोई अधिकार नहीं है.

नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (एनसीपीसीआर) को इस कानून के देखरेख की जिम्मेदारी सौंपी गई है.

इस कानून के तहत सेक्सुअल हैरेसमेंट, सेक्सुअल असॉल्ट और पोर्नोग्राफी जैसे अपराध से बच्चों को सुरक्षा प्रदान की जाती है.

इसमें इस बात पर ख़ास जोर दिया जाता है कि बच्चों को ऐसी घटनाएं रिपोर्ट करने, सबूत बताने के लिए अलग तरीके से हैंडल किया जाए क्योंकि बच्चों के साथ हुए गलत व्यवहार को साबित करना सबसे बड़ी चुनौती होती है.

कानून का दुरुपयोग नहीं होगा?

यही सवाल हमने एनसीपीसीआर की अध्यक्ष स्तुति कक्कड़ से किया. उनका कहना है कि बचपन में हुई यौन हिंसा का असर ताउम्र रहता है. इसलिए बड़े होने पर शिकायत न करने देने से वयस्कों को महरूम रखना भी एक तरह का अपराध ही है.

स्तुति पोक्सो कानून में इस तरह के बदलाव के पक्ष में हैं लेकिन उनका कहना है कि ये मामला उनके कार्यक्षेत्र के बाहर का है.

उनके मुताबिक पूर्णिमा ने उनसे भी मुलाकात की थी. लेकिन उम्र अठारह साल से ज्यादा होने की वजह से वो पूर्णिमा की मदद नहीं कर पाईं.

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क्या है सरकार की राय?

पूर्णिमा की याचिका पर केन्द्रीय महिला एवं बाल कल्याण मंत्री मेनका गांधी ने भी जवाब दिया है.

अपने जवाब में मेनका पूर्णिमा से इत्तफाक रखती दिखीं. उनके मुताबिक पूर्णिमा की शिकायत पर उनका मंत्रालय इस कानून में बदलाव पर विचार कर रहा है.

मेनका गांधी ने ये भी लिखा है कि बचपन में हुई यौन हिंसा की रिपोर्ट दर्ज़ कराने की अधिकतम उम्र की सीमा हटा दी जाए, इसके लिए वो रास्ते तलाश रहीं है. इस मामले को उन्होंने नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (एनसीपीसीआर) को भेज दिया है.

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मेनका गांधी की इस मुहिम को कांग्रेस सांसद शशि थरूर से भी समर्थन मिला है. उन्होंने याचिका का ट्वीट करके अपना समर्थन दिया है.

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