जब ठेके पर दारू ख़रीदने पहुंचीं लड़कियां

  • 6 फरवरी 2018

हमारी जैसी बहुत सी महिलाओं के लिए शराब ख़रीदना शॉपिंग के सामान्य अनुभव जैसा नहीं है.

आप आसानी से विकल्पों को नहीं देख सकती हैं. जो आपको चाहिए उसके लिए आपको बहुत स्पष्ट होना होता है और जितनी जल्दी हो सके, दुकान छोड़नी होती है.

यहां तक कि वहां आप अपनी दोस्तों के साथ शराब के विकल्पों पर आज़ादी से चर्चा भी नहीं कर सकतीं. शराब की बोतल लौटाने के बारे में तो आप सोच भी नहीं सकतीं.

अगर महिलाएं क़ानूनी तौर पर कुछ ख़रीदना चाहती हैं तो उनके लिए ख़रीदारी का ये अनुभव इतना मुश्किल क्यों होना चाहिए? पड़ोसी देश श्रीलंका में तो राष्ट्रपति ने महिलाओं के शराब ख़रीदने को ही ग़ैरक़ानूनी घोषित कर दिया है.

पिछले महीने एक रैली को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना ने कहा कि उन्होंने सरकार से उन सुधारों को वापस लेने के लिए कहा है जिनके तहत महिलाएं बार में काम कर सकती थीं. 60 सालों में पहली बार 18 से अधिक उम्र की महिलाएं शराब ख़रीद पातीं, लेकिन राष्ट्रपति ने यह फैसला रोक लिया.

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लेडीज़ स्पेशल दुकान में हमारा अनुभव

हमने भारत की राजधानी दिल्ली में शराब की दुकानों की लाइन में लगकर अनुभव किया कि जब कोई महिला शराब ख़रीदने जाती है तो क्या होता है.

हम सबसे पहले पूर्वी दिल्ली के एक मॉल में तथाकथित लेडीज़ स्पेशल दुकान पर गए. प्रमोद कुमार यादव लेडीज़ वाइन शॉप से सटी सामान्य शराब की दुकान में काम करते हैं. दोनों दुकानें एक ही मालिक की हैं. दरअसल लेडीज़ स्पेशल दुकान से एक दरवाज़ा सामान्य दुकान में जाता है.

आमतौर पर लेडीज़ स्पेशल दुकान पर महिला सेल्सगर्ल होती है लेकिन जिस दिन हम यहां गए वो छुट्टी पर थी. प्रमोद कुमार पिछले दरवाज़े से होकर हमें देखने आए. उन्होंने दावा किया कि ये पूरे देश की एकमात्र महिला स्पेशल शराब की दुकान है.

हम यहां बिक रहे विभिन्न ब्रांडों का जायज़ा लेने के लिए दुकान के भीतर आ गए. बाकी दुकानों की तरह बिना किसी जल्दबाज़ी के हमने यहां प्रदर्शित स्टॉक देखा और बिक रही शराबों, बियरों और व्हिस्की का जायज़ा लिया.

यहां एक सोफ़ा भी है जिस पर दोस्तों के साथ बैठकर बातचीत की जा सकती है. यहां शराब ख़रीदना किसी मॉल से जींस ख़रीदने जैसा है. आप इस बारे में अपने दोस्तों से बात कर सकते हैं. आप कुछ ख़रीदें या न ख़रीदें लेकिन आपको ये अनुभव अच्छा लगता है.

हमने कुछ महंगी शराब की बोतलें देखीं. पहली बार के उत्साह के साथ कुछ सेल्फ़ीं खींची और यहां आने वाली ग्राहकों के साथ बात भी की.

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लेकिन बोतल लेकर निकलें तो...

यहां पहुंची एक ग्राहक ने कहा, "मैं महिलाओं के लिए विशेष शराब की दुकान के विचार के ख़िलाफ़ हूं. जो महिला सेल्सगर्ल यहां बैठती है उसे शराबों के बारे में जानकारी ही नहीं है. उससे कोई मदद ही नहीं मिल पाती है. इसलिए ही मैं सामान्य शराब की दुकान पर जाती हूं क्योंकि वहां बैठे लोग शराबों के बारे में जानते हैं."

हालांकि जब आप यहां से शराब की बोतल लेकर बाहर निकलती हैं तो आपको फिर उन विचित्र नज़रों का सामना करना होता है जो शायद सवाल करती हैं कि एक महिला शराब लेकर कैसे जा सकती है. आपकों उन निगाहों को सहना ही पड़ता है. महिलाओं के लिए विशेष शराब की दुकानें खोलने के बजाय सुरक्षित माहौल की ज़रूरत ज़्यादा है.

एक लड़की के साथ शराब ख़रीदने आए आलम ख़ान कहते हैं, "अगर आपको ये सब करना ही है तो लड़कियों के साथ ही करो." हां में हां मिलाते हुए उनके साथ आई लड़की कहती है, "आप महिलाओं को शराब पीने से नहीं रोक सकते हैं, कम से कम उन्हें सुरक्षित माहौल ही मुहैया करवा दीजिए."

वो कहती हैं, शराब पीने वाली महिलाओं की तादाद बढ़ रही है, ऐसी और लेडीज़ स्पेशल दुकानें होनी चाहिए.

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प्रमोद कुमार शांति से खड़े हुए इंतज़ार कर रहे थे. वो कहते हैं, "यहां आने वाली महिला ग्राहकों को किसी तरह की दिक्कत नहीं होती है. उनके लिए ये शराब ख़रीदने का सुरक्षित ठिकाना है."

जब उनसे पूछा गया कि क्या वो अपनी सामान्य दुकान में भी महिलाओं को शराब बेचते हैं तो वो थोड़ा हिचकिचाए. उन्होंने कहा, "ऐसा नहीं है कि हम महिलाओं को शराब बेचने से मना कर देते हैं बल्कि हम उनसे कहते हैं कि आप लेडीज़ स्पेशल से ले लीजिए. ये ज़्यादा सुरक्षित भी है. ख़ासतौर पर भीड़-भाड़ वाले दिनों में. दोनों दुकानों एक जैसी भी हैं तो फिर पुरुषों के साथ लाइन में क्यों लगा जाए."

कम रोशनी वाली सामान्य दुकान का तजुर्बा

इस लेडीज़ स्पेशल शॉप के बाद हम एक कम रोशनी वाले इलाक़े में एक सामान्य शराब की दुकान पर गए.

पुरुष दोस्त पहले दुकान के पास गए और हालात का जायज़ा लिया. सब कुछ सुरक्षित होने के बाद ही उन्होंने हमे जाने दिया. शर्त ये थी कि हम दिन की रोशनी में ही जाएं.

हम पूर्वी दिल्ली के मयूर विहार के एक बेसमेंट में स्थित एक भीड़भाड़ वाली शराब की दुकान में गए. वहां अटेंडेंट ने बताया कि उसका नाम पप्पू सिंह है. हमने उससे पूछा कि क्या यहां महिलाएं शराब ख़रीदने आती हैं. उसने हमें ऐसे देखा जैसे हम एलियन हों. उसने कहा, "वो यहां क्यों आएंगी, ये महिलाओं का अड्डा नहीं है."

हमने अपना सवाल दोहराते हुए कहा कि अरे लड़कियां भी दारू पीती हैं ना, तो आती होंगी शराब ख़रीदने?

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सिंह ने जवाब दिया, हां पीती तो हैं आजकल. उसने कहा, "लड़कियां दुकान में नहीं आतीं लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि वो शराब नहीं ख़रीदतीं."

आमतौर पर वो अपने पुरुष दोस्तों को भेजती हैं. और अगर उनके साथ कोई नहीं होता तो वो किसी पुरुष ग्राहक से अपने लिए शराब ख़रीदने के लिए कह देती हैं और दुकान से दूर खड़ी हो जाती हैं.

एक रिक्शावाला जो बहुत देर से ताकझांक कर रहा था बोला, "एक दिन वो आंटी मेरे रिक्शा में बैठीं थी, उन्होंने कहा कि अगर में शराब ख़रीद कर ला दूं तो वो मुझे टिप देंगी."

उसने बताया कि उन्होंने कहा था, "बेटा पैसे की चिंता मत करना."

विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक सर्वे के मुताबिक, भारत में क़रीब पांच प्रतिशत महिलाएं शराब पीती हैं. जबकि शराब पीने वाले पुरुषों की तादाद 26 प्रतिशत है. ऐसी महिलाओं की भी बड़ी तादाद है जिन्होंने कम से कम एक बार शराब पी है या जो कभी-कभी शराब पी लेती हैं.

लेकिन भारत में महिलाओं के शराब पीने को लेकर जो पूर्वाग्रह हैं वो बहुत जल्द ख़त्म नहीं होने जा रहे हैं. प्राचीन काल से ही शराब पीने वाली महिलाओं के प्रति ख़ास पूर्वाग्रह और मर्दवादी रवैया रहा है.

हिंदुओं की प्राचनी नियमावली मनुस्मृति में लिखा है कि शराब पीने वाली महिलाएं खराब होती हैं. इस किताब के मुताबिक शराब पीना उन छह दोषों में से एक है जो किसी महिला को बर्बाद और बेकार कर देते हैं.

(दिल्ली में क़ानूनन शराब खरीदने की न्यूनतम उम्र 25 साल है. हालांकि कुछ राज्यों में ये अलग है, जैसे केरल में शराब खरीदने की न्यूनतम वैधानिक उम्र 23 है. बीबीसी का ये लेख किसी भी तरह से किसी को शराब पीने के लिए प्रोत्साहित नहीं करता है.)

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