मोदी की राह पर ही चल पड़े हैं अमित शाह भी?

  • 7 फरवरी 2018
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बुधवार का दिन अगर नरेंद्र मोदी के संसद में भाषण के नाम रहा तो सोमवार का दिन राज्य सभा में अमित शाह के भाषण के नाम था.

सोमवार को राज्य सभा में दिए गए शाह के भाषण को राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषक उनके और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच ज़िम्मेदारी के बंटवारे की तरह देखते हैं.

अमित शाह की राजनीति पर लंबे समय से नज़र रखने वालों का मानना है कि राज्यसभा में अपना पहला भाषण देने के बाद समाचारों में छाए बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह अपने असली अंदाज़ में आ गए हैं.

शाह 1996-97 से गुजरात विधानसभा के लगातार सदस्य रहे हैं. हालांकि साल 2010-2015 तक के दौरान अमित शाह विधानसभा में ज़्यादातर अनुपस्थित ही रहे.

गुजरात के कई वरिष्ठ पत्रकार उनके अब तक के राजनीतिक सफ़र के गवाह रह चुके हैं.

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अमित शाह पहली बार विधानसभा 1996-97 में अहमदाबाद की सरखेज सीट के लिए हुए उपचुनाव में जीतकर पहुंचे.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया अहमदाबाद के पूर्व राजनीतिक संपादक राजीव शाह ने तब से विधानसभा में उनका कार्यकाल देखा है.

वो कहते हैं, "शाह जब नए विधायक थे तब ज़्यादातर सदन में शांत ही बैठे रहते थे और चर्चा में भी कुछ ख़ास भाग नहीं लेते थे. उस वक़्त केशूभाई पटेल मुख्यमंत्री थे. मगर साल 2002 में उन्हें गृह राज्यमंत्री और संसदीय एवं वैधानिक कार्य मंत्री का भार दिया गया, तब से वह सदन में खुलकर बोलने लगे."

राजीव शाह बताते हैं, "कभी-कभार तो वो ऐसे विभागों के बारे में भी बात करते जो उनके कार्यक्षेत्र में नहीं थे जैसे कि नर्मदा विभाग. मोदी भी उन्हें बोलने के लिए प्रोत्साहित करते दिखते थे. इसलिए अगर भाजपा के दृष्टिकोण से देखा जाए तो विधानसभा में उनका काम प्रभावशाली रहता था. शाह भी सदन में पूरी तैयारी के साथ चर्चा के लिए आते थे. मगर उनके काम करने का तरीक़ा बिल्कुल ख़ुफ़िया रहता था."

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सोहराबुद्दीन मामले के बाद इस्तीफ़ा

हालांकि साल 2010 में सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस के विवाद के चलते उन्हें पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा और तब से विधानसभा में उनकी हाज़िरी और भूमिका बेहद सीमित रह गई.

2011 से विधानसभा कार्यवाही पर नज़र रखने वाली संस्था गुजरात सोशल वॉच के कनवीनर महेश पंड्या अमित शाह के राज्यसभा भाषण की तुलना "राष्ट्रपति के राष्ट्र के नाम संदेश" से करते हैं. क्योंकि ज़्यादातर न्यूज़ चैनलों ने इसे लाइव दिखाया था.

पंड्या कहते हैं, "बारहवीं विधानसभा की कुछ ही सत्रों में शाह ने हाज़िरी दी. 12वीं विधानसभा का आठवां सत्र जो कि बजट सत्र था, 24 फ़रवरी 2011 से 30 मार्च 2011 तक चला, इसमें उन्होंने एक दिन भी हाज़िरी नहीं दी. ऐसा ही हाल दसवें सत्र में भी हुआ."

पंड्या कहते हैं, "तेरहवीं विधानसभा में भी 20 फ़रवरी 2013 से दो अप्रैल 2013 तक के तीस दिन के सत्र में शाह ने सिर्फ़ 12 दिन हाज़िरी दी मगर एक भी चर्चा में हिस्सा नहीं लिया. इसके अलावा फरवरी 2014 में बुलाए गए आठ दिन के सत्र में उन्होंने सिर्फ़ एक दिन हाज़िरी दी जबकि इसी साल जुलाई में हुए 22 दिन के सत्र में वो पूरी तरह अनुपस्थित रहे. साल 2015 में भी 23 फ़रवरी से 31 मार्च तक चले 29 दिनों के सत्र में शाह सिर्फ़ एक ही दिन सदन आए. इसके बाद से वो जिस भी सत्र में मौजूद रहे वहां उन्होंने प्रचार जैसे भाषण दिए."

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शाह के भाषण के संकेत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब से उनकी राजनीति पर नज़र रख रहे समाजशास्त्री प्रोफ़ेसर शिव विश्वनाथन अमित शाह के राज्यसभा के भाषण को अलग तरह से देखते हैं.

उन्होंने कहा, "अमित शाह अब नेपथ्य से बाहर आकर मुख्य मंच की राजनीति करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. दूसरी बात ये है कि अब कांग्रेस पर होने वाले ज़्यादातर राजनीतिक हमले नरेंद्र मोदी नहीं बल्कि अमित शाह करेंगे. मोदी अब राजनीतिक स्टेट्समैन के जैसे व्यवहार करेंगे जबकि शाह राजनेता की तरह रणनीति में उनकी भूमिका ज़्यादा सघन बनाएंगे. ये एक तरह से दोनों नेताओं के बीच प्रतीकात्मक तरीके से काम और ज़िम्मेदारी का बंटवारा है."

उन्होंने कहा, "मोदी अब ज़्यादातर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, उदाहरण के तौर पर दावोस में, बातचीत करते रहेंगे. जबकि अमित शाह देसी पावरहोल्डर बनेंगे. आप देखिए शाह अब स्थानीय बॉस से राष्ट्रीय बॉस बन गए हैं. एक तरह से सरदार पटेल की उस मूर्ति जैसा है जिसका क़द लगातार बढ़ रहा है. शाह ने भाजपा के आंतरिक तंत्र पर पूरा नियंत्रण कर लिया है. मोदी अब संसदीय और नीति विषय के मामलों में असर दिखाएंगे जबकि अमित शाह पक्षीय राजनीति और अन्य मामलों पर पकड़ जमाए रखेंगे."

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