नज़रियाः पूर्वोत्तर के चुनाव में भाजपा को 'एक्ट ईस्ट' नीति से क्या मिलेगा?

  • 8 फरवरी 2018
नरेंद्र मोदी इमेज कॉपीरइट PTI

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने त्रिपुरा में बृहस्पतिवार को अपने चुनावी प्रचार की शुरुआत मुख्यमंत्री माणिक सरकार पर निशाना साधकर की.

एक रैली में बोलते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि 'त्रिपुरा को माणिक नहीं, हीरा चाहिए.'

रोमन तरीक़े से लिखें तो हीरा की स्पैलिंग HIRA होगी.

बेंगलुरु में दिए गए टोमेटो, अनियन, पोटेटो (TOP) की तर्ज़ पर प्रधानमंत्री मोदी के लिए HIRA का मतलब

  • एच से हाइवे
  • आइ से आइवे
  • आर से रोडवेज़
  • और ए से एयरवेज़ है.

माणिक सरकार दो दशक से त्रिपुरा की कमान संभाले हुए हैं.

इस बार भारतीय जनता पार्टी यह यकीन दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही कि उसने भारत की 'लुक ईस्ट' पॉलिसी का नाम 'एक्ट ईस्ट' रखकर उसे और ठोस बना दिया है.

गुवाहाटी में हुई ग्लोबल इन्वेस्टर्स कॉन्फ्रेंस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि 'पूर्वोत्तर उनके सरकार की एक्ट ईस्ट नीति के केंद्र में है'.

गणतंत्र दिवस परेड के दौरान आसियान नेताओं की पूरी पंक्ति खड़ा करने से भी भाजपा को निश्चित ही पूर्वोत्तर की राजनीति में मदद मिलेगी.

त्रिपुरा, नागालैंड और मेघालय में इसी महीने चुनाव हैं तो मिजोरम में नवंबर में वोट डाले जाएंगे.

क्या आसियान में भारत का दबदबा बढ़ रहा है?

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption आसियान देश के नेताओं के साथ प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति कोविंद

सब का साथ, सब का विकास

'सब का साथ, सब का विकास' की तरह 'एक्ट ईस्ट' का नारा निम्न स्तर की राजनीति पर उच्च नैतिकता वाला कवर डाल रहा है; इसमें मौजूदा पार्टियों को तोड़ना, सामाजिक दरार पैदा करना और चमत्कार के वादों के ज़रिये राजनीतिक वफ़ादारी खरीदना शामिल हैं.

विशुद्ध आर्थिक दृष्टि से, भारत समुद्री मार्ग के ज़रिये अपनी लुक ईस्ट नीति पर कायम रह सकता है.

पूर्वोत्तर और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच ज़मीनी संपर्क की जरूरत है क्योंकि उन्होंने अविकसित और चारों ओर ज़मीन से घिरे पूर्वोत्तर इलाकों के विकास का वादा किया है.

हालांकि, लगातार यह भी संकेत मिल रहे हैं कि जो कुछ भी हो रहा है वो इतना पर्याप्त नहीं है कि एक्ट ईस्ट पॉलिसी के आधार पर भाजपा को वोट मिल सके.

Image caption मोरेह को म्यांमार और थाइलैंड में भारत के प्रवेश द्वार के तौर पर देखा जाता है

एक्ट ईस्ट पॉलिसी

2001 में मणिपुर के मोरेह से शुरू हो कर म्यामांर के तमू-कलेवा-कालेम्यो तक जाने वाली भारत-म्यांमार फ़्रेंडशिप सड़क का उद्घाटन किया गया.

मोरेह से तमू तक को छोड़कर सड़क, 71 पुलिया, द्वितीय विश्व युद्ध के समय के पुराने बेली पुलों की मरम्मत या पुनर्निमाण आज भी बाक़ी हैं.

म्यामांर ने केवल दो पुलों का निर्माण किया है, जबकि भारत के अनुदान देने के बावजूद बाक़ी 69 पुलों के पुनर्निमाण की शुरुआत अभी बाक़ी है.

यह सड़क भारत-म्यांमार-थाइलैंड के त्रिभुज राजमार्ग को साथ जोड़ेगी जिससे कलेवा-यार्गी-मोनवा-मंडाले रूट जुड़ जाएंगे. एक्ट ईस्ट के तहत यह दूसरी प्रमुख परियोजना है.

राजमार्ग के कलेवा से यार्गी के 120 किलोमीटर का भाग अभी तक पूरा नहीं हुआ है और अभी कॉन्ट्रैक्ट दिए जाने के स्तर पर ही है. यार्गी से मोनवा तक की सड़क को 2019 तक पूरा कर लिए जाने की उम्मीद है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

क्या है परियोजनाओं की वर्तमान स्थिति?

मोनवा और मंडाले के बीच सड़क पहले से ही मौजूद है. एक बार तमु-काले-कलेवा फ्रेंडशिप सड़क की मरम्मत कर ली जाएगी तो इम्फाल से मंडाले और आगे थाइलैंड तक सहज कनेक्टिविटी हो जाएगी.

तीसरा प्रमुख एक्ट ईस्ट कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट मिजोरम में जोख्वतर से म्यांमार के रीह तक और आगे तिद्दिम तक है. हालांकि, तिद्दिम और काले के बीच सड़क के 2020 तक ही पूरा होने की उम्मीद है.

और अंत में, कलादान मल्टी मोडल परियोजना है जो कोलकाता और पूर्वोत्तर के बीच कार्गो के परिवहन को आसान बना देगा.

कोलकाता बंदरगाह म्यांमार के सित्वे बंदरगाह से जुड़ा होगा. सित्वे से सामान कलादान नदी में माल वाहक जहाज से पलेत्वा और वहां से मिजोरम के जोरिनपुई पहुंच सकेगा.

जलमार्ग तैयार है. सित्वे बंदरगाह का निर्माण भारत ने किया है, कलादान नदी को साफ कर दिया गया है और पलेत्वा नहर भी तैयार है. हालांकि, मिजोरम में पलेत्वा से जोरिनपुई तक की सड़क अब भी तैयार नहीं है.

Image caption भारत-म्यांमार फ़्रेंडशिप गेट

कब तक पूरी होंगी परियोजनाएं?

आइज़ोल से जोरिनपुई को जोड़ने के लिए 200 किलोमीटर के राजमार्ग का काम चल रहा है.

एक बार जब यह पूरा हो जाएगा, मिजोरम, त्रिपुरा और कुछ हद तक मणिपुर को कोलकाता के बंदरगाह से सिलीगुड़ी कॉरिडोर या चिकन नेक से होकर आर्थिक रूप से सस्ते में आपूर्ति की जा सकेगी.

इनमें से अधिकांश परियोजनाएं पहले से ही चार साल की देरी से चल रहे हैं और इनके 2020 तक पूरा होने की उम्मीद है.

यहां तक कि जब एक्ट ईस्ट कनेक्टिविटी परियोजनाएं पूरी हो जाएंगी, तो पूर्वोत्तर उसे व्यापार के लिए उपयोग करने के लिए तैयार नहीं हो सकता है.

इस क्षेत्र में भीतरी सड़क संपर्क भी बहुत कम है, निर्यात के लायक उत्पादन नहीं है और ऐसे निवेश या उद्यमी भी अपर्याप्त हैं जो निर्यातोन्मुखी उद्योग स्थापित कर सकें.

वहां कुशल श्रमिकों की कमी है और किसी और क्षेत्र से इनके आने पर यहां समस्याएं पैदा हो सकती हैं.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

उद्योग, व्यापार शुरू कर पाना कितना मुश्किल?

सबसे महत्वपूर्ण बात, एक्ट ईस्ट पॉलिसी स्थानीय सक्रिय लोगों को शामिल नहीं करती, जिनका अब तक की नीति में कोई स्वामित्व नहीं है.

इसलिए उद्योग और व्यापार के लिए ज़मीन और संसाधनों तक पहुंच बना पाने में विशेष रूप से परेशानी होगी.

जनजातीय समाज और छोटे राष्ट्रवादी आंदोलन ऐसे अधिकारों को लीज पर देने को लेकर विशेष रूप से भावुक हैं.

इन सबसे ऊपर, स्थानीय राजनीतिक के खिलाड़ी यहां तक की राज्य सरकारें भी कुशलता से अपने काम नहीं करतीं और किराए मांगने वाले की तरह व्यवहार करती हैं.

बावजूद इसके केंद्रीय निधियों की उनकी मांग कभी कम नहीं होती. राजनेता, ठेकेदार और बागी सभी अपनी जेबें भरने के लिए बुनियादी ढांचे और अन्य विकास परियोजनाओं से जुड़ी सरकारी निधियों पर नज़र टिकाए रहते हैं.

और अंत में, यह ध्यान रखना चाहिए कि पूर्वोत्तर में क्षेत्रीय व्यापार प्रबल उग्रवाद के साथ नहीं पनप सकता.

सरकार को एक्ट ईस्ट पॉलिसी पर शेखी बघारने से पहले समयबद्ध तरीके से इस क्षेत्र में उग्रवाद की समस्या को हल करने की जरूरत है.

आसियान के साथ व्यापार संबंधों को मजबूत करने का वादा करते हुए भाजपा ने असम, अरुणाचल और मणिपुर राज्यों को कुछ नहीं दिया. यह सांप्रदायिक भावना और राजनीतिक सौदेबाजी निर्भर था.

यह ठीक वो ही रणनीति है जिसके आधार पर भाजपा चुनाव में इन राज्यों की सत्ता में आने की संभावना देखती है, यहां तक कि जब वो एक्ट ईस्ट की बात करती है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए