'कोई पाकिस्तानी कहता है तो बहुत दुख होता है'

  • 9 फरवरी 2018
प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
क्या आपने कभी किसी मुस्लिम को पाकिस्तानी कहा?

"70 साल बाद भी हमें पाकिस्तानी क्यों कहा जाता है? मैंने तो जिन्ना के पैगाम को ठुकराया था. और अब तो हम तिरंगा भी नहीं लहरा सकते."

यह सवाल हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी का था जिसे उन्होंने लोकसभा में पूछा था.

उन्होंने सरकार से एससी-एसटी एक्ट की तरह एक क़ानून लाने की मांग की, जिसके तहत किसी भी भारतीय मुस्लिम को पाकिस्तानी कहना ग़ैर-ज़मानती अपराध माना जाए. उन्होंने इसके लिए तीन साल तक की सज़ा के प्रावधान की मांग की.

हालांकि बीजेपी के नेता विनय कटियार की तरफ़ से जल्द ही इस पर प्रतिक्रिया आ गई. उन्होंने कहा, "मुसलमान को तो इस देश में रहना नहीं चाहिए. उन्होंने तो जनसंख्या के आधार पर देश का बंटवारा कर लिया, तो यहां इस देश के अंदर रहने की क्या आवश्यकता थी. जब उनकों अलग भू-भाग दे दिया गया, तो बांग्लादेश या पाकिस्तान जाएं, यहां क्या काम है उनका."

'मुस्लिम मोहल्लों में पाकिस्तान मुर्दाबाद क्यों?'

ये आवाज़ें तो जनता के चुने जनप्रतिनिधि की थी, लेकिन ऐसी बहस क्या लोगों के बीच भी है? ये जानने के लिए बीबीसी ने कुछ मुस्लिम और ग़ैर-मुस्लिमों से बात की.

Image caption आतिफ

"कोई पाकिस्तानी कहता है तो तकलीफ़ होती है"

एक मुस्लिम युवक आतिफ़ बताते हैं कि उन्हें कई बार पाकिस्तानी कहा गया. आतिफ़ के अनुसार उनके क्लासमेट ही कहते हैं कि तुम पाकिस्तानी हो. उन्होंने कहा कि जब कोई ऐसा कहता है तो बहुत बुरा लगता है.

"मैं एक भारतीय मुसलमान हूं. मुस्लिमों ने इस देश को ख़ून दिया है और बदले में इस देश ने भी मुस्लिमों को बहुत कुछ दिया है. लेकिन जब कोई पाकिस्तानी कहता है तो तकलीफ़ होती है"

आतिफ असदुद्दीन ओवैसी से इत्तेफाक रखते हैं. वो कहते हैं कि क़ानून होना चाहिए जिसके तहत किसी भारतीय मुस्लिम को पाकिस्तानी कहने वाले शख्स के ख़िलाफ़ कार्रवाई हो और उसे सज़ा मिले.

वहीं एक मुस्लिम युवती ज़किया ग़ुस्से में कहती हैं, क्या मुझे मेरे हिजाब की वजह से पाकिस्तानी बुलाया जाता है? पता नहीं उन्हें ये बोलकर क्या संतुष्टि मिलती है?

Image caption ज़किया

ज़किया ने कहा, "जब बंटवारा हुआ था तो बहुत से मुस्लिमों ने भारत में ही रहने का फ़ैसला किया, तब तो किसी ने उनको पाकिस्तानी कहकर नहीं निकाला. तो आजकल क्यों लोग ऐसा कर रहे हैं मुझे समझ नहीं आता."

ज़किया कहती हैं कि अब उन्हें पाकिस्तानी सुनने की आदत हो गई है, लेकिन उनके कुछ दोस्त हैं जिन्हें पाकिस्तानी बोले जाने पर बुहत बुरा लगता है.

वो कहती हैं कि हम भारत के नागरिक हैं, हमारे पास सारे काग़ज़ात हैं, लेकिन उसके बाद भी हमें भारतीय नहीं माना जाता. वो कुछ तेज़ आवाज़ में कहती हैं कि हम भी उसी तरह इस देश का हिस्सा हैं, जैसे कि वो हैं.

"अगर हिंदू धर्म का जन्म इस धरती पर हुआ है तो इसका मतलब ये तो नहीं है कि सब हिंदू हो गए. या सिर्फ हिंदू ही यहां रह सकते हैं. हिंदुस्तान एक बहुसंस्कृति वाला देश है."

'भारतीय हूं, वो पाकिस्तानी बताकर कैसे पीट सकते हैं?'

वो कहती हैं, "मुझे समझ नहीं आता कि आज के समय में भी क्यों वो लोग पाकिस्तान और भारत में उलझे हुए हैं. सियासी लड़ाई भारत और पाकिस्तान की सरकारों के बीच है ना कि जनता के बीच."

ये पूछे जाने पर कि क्या पाकिस्तानी कहने वाले को सज़ा मिलनी चाहिए, वो कहती हैं कि सज़ा के मामले में जो ठीक लगे वो किया जाए, हमारी तो कोई वैसे भी नहीं सुनता! लेकिन हां, इस पर कार्रवाई ज़रूर होनी चाहिए.

हालांकि ऐसी शिकायतें सभी मुसलमानों की नहीं है. कई मुस्लिम ऐसे भी हैं जिनके लिए कभी किसी ग़ैर-मुस्लिम ने ऐसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया.

दिल्ली के निज़ामुद्दीन इलाक़े में रहने वाले मोहम्मद इनाम कहते हैं कि यहां हिंदू-मुसलमान मिल-जुल कर रहते हैं. सारे त्योहार साथ मनाते हैं. मुझे कभी किसी ने पाकिस्तानी कहकर नहीं पुकारा.

मोहम्मद इनाम की ही तरह मोहम्मद हस्सान को भी कभी किसी ने पाकिस्तानी नहीं कहा. वो अक्सर अख़बारों और टीवी में ऐसी ख़बरें पढ़ते रहते हैं. उन्हें ऐसी ख़बरें पढ़कर बिल्कुल अच्छा नहीं लगता.

‘मैं अपनी मर्ज़ी से मुसलमान बनी हूं’

वो कहते हैं कि हम हिंदुस्तानी हैं और हिंदुस्तानी से मोहब्बत करते हैं. हिंदुस्तान एक सेक्युलर मुल्क है, यहां सब धर्मों के लोगों को रहने का बराबर अधिकार है.

हस्सान लोगों की सोच में बदलाव की ज़रूरत पर ज़ोर देते हैं. वो कहते हैं कि हिन्दुस्तान का मुसलमान वफ़ादार है. वो अपने धर्म का पालन भी करता है और अपने वतन से प्यार भी करता है.

"मज़ाक में कह देते हैं पाकिस्तानी"

मुस्लिम युवती अज़ीमा शफक कहती हैं कि मुझे सीधे तौर पर तो आज तक किसी ने पाकिस्तानी नहीं कहा. लेकिन लोग अक्सर मज़ाक में या चिढ़ाने के लिए मुझे पाकिस्तानी कह देते हैं.

"कई बार दोस्त पूछते हैं कि तुम्हारे पाकिस्तान में रिश्तेदार होंगे? तुम पाकिस्तान गई हो? उन्हें ये सुनकर ताजुब्ब होता है कि मैं कभी पाकिस्तान नहीं गई. उन्हें लगता है कि मैं पाकिस्तानी हूं तो मेरा पाकिस्तान से कोई कनेक्शन होना ज़रूरी है."

अज़ीमा ज़ोर देकर कहती हैं कि मुस्लिम और पाकिस्तान दोनों अलग-अलग चीज़ें हैं. दोनों का रिश्ता होना कोई ज़रूरी नहीं है.

Image caption अज़ीमा शफक

"सोच में बदलाव की ज़रूरत"

अज़ीमा कहती हैं कि अगर क़ानून लाने से लोगों की सोच में बदलाव आता है तो क़ानून लाया जाना चाहिए. क्योंकि ये सोच बहुत आम है और बच्चे-बच्चे में है.

"मुझे याद है जब मैं छोटी थी तब स्कूल में मेरे साथ ये ज़्यादा होता था, क्योंकि स्कूल में लोगों को ये समझ नहीं होती कि सार्वजनिक तौर पर आपको क्या बोलना चाहिए और क्या नहीं. बड़े होने पर भी ये सोच उनमें है. लेकिन बस अब वो मुंह पर नहीं बोलते. इसलिए ज़रूरत है कि ये बातें रूट लेवल से दिमाग से निकाली जाएं."

अब जानते हैं कि गैर-मुस्लिम युवाओं का इस पर क्या कहना है.

मध्य प्रदेश के सतना से दिल्ली पढ़ने आए हिंदू युवक शिशिर अग्रवाल कहते हैं कि उन्होंने कभी किसी मुस्लिम को पाकिस्तानी ना समझा और ना ही कहा.

लेकिन उनका कहना है कि उनके सामने हिंदुओं ने कई बार मज़ाक में या लड़ाई होने पर मुसलमानों को पाकिस्तानी कहा.

असल से कितना अलग है पाक का 'नया जिन्ना'?

वो बताते हैं कि सतना के जिस इलाक़े में वो रहते हैं, वहां धार्मिक उन्माद के कई केस होते रहते हैं. उस दौरान उन्होंने ऐसा खुद सुना है.

शिशिर का मानना है कि ऐसा कहने वाले लोगों का नाता किसी विशेष संगठन से होता है. सभी हिंदू, मुसलमानों के लिए ऐसी सोच नहीं रखते.

Image caption शिशिर अग्रवाल

"धर्म के कारण किसी को पाकिस्तानी कहना ग़लत"

वो कहते हैं, "जिस देश में पद्मावत जैसी फ़िल्मों से किसी की भावनाएं आहत हो जाती हो, हंगामा बरपाया जाता हो, क़ानून हाथ में लिया जाता हो, वहां कोई ये क्यों नहीं सोचता है कि किसी के धर्म के कारण अपने ही मुल्क में पाकिस्तानी कह देने से भी उसकी भावनाएं आहत होती होंगी."

शिशिर अग्रवाल असदुद्दीन ओवैसी से सहमति जताते हैं और कहते हैं कि मुसलमानों को पाकिस्तानी कहने वालों के खिलाफ क़ानून लाया जाना चाहिए. लेकिन वो तीन साल की सज़ा को ज्यादा बताते हैं, वो कहते हैं कि जुर्माना लगाया जा सकता है.

"राजनीतिक फायदे लेना चाहते हैं ओवैसी"

एक अन्य हिंदू युवा मुकुंद ठाकुर कहते हैं कि ओवैसी राजनीतिक फ़ायदे के लिए क़ानून लाने की बात कह रहे हैं. वो कहते हैं कि जब कोई पार्टी विशेष किसी को पाकिस्तान भेजने की बात करती है तो उसके पीछे गंदी राजनीति होती है.

मुकुंद कहते हैं कि हिंदी, सूफ़ी साहित्य से लेकर हर तरह के क्षेत्रों में मुसलमानों का योगदान है. वो भी हमारा हिस्सा हैं, उनके साथ ग़लत व्यवहार नहीं कर सकते. बस इस देश में हैं तो यहां कि संस्कृति को जीना चाहिए.

लेकिन मुकुंद कानून बनाने के पक्ष में नहीं हैं. वो कहते हैं कि शिकायत तो भारत का कोई भी नागरिक किसी के भी ख़िलाफ़ कर सकता है. भारत का संविधान सबको ये बराबर हक देता है.

Image caption सत्यवीर सिंह

वहीं सत्यवीर सिंह कहते हैं कि उनके ज़हन में मुसलमानों के प्रति द्वेष भावना नहीं आई. बचपन से ही उनके कई मुस्लिम दोस्त है जिनके साथ वो खुब खेलते और खाते थे. सत्यवीर कहते हैं कि वो आज भी उन दोस्तों से जोश के साथ मिलते हैं. लेकिन उन्हें अजीब लगता है कि आज-कल लोग किस तरह की बाते करने लगे हैं और किस तरह के मुद्दे लेकर आए हैं.

सत्यवीर का मानना है कि ओवैसी जैसे कुछ नेता वक्त देखकर बाते करते हैं. वो कहते हैं कि ऐसे नेता देश में शांति और एकता के लिए खतरे जैसे हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए