BBC SPECIAL: योगी के गढ़ में बेबस मांओं की दर्द भरी ज़िंदगी

  • प्रियंका दुबे
  • बीबीसी संवाददाता, गोरखपुर से
गोरखपुर की मांएं

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प्रेमलता अपने तीनों बेटों के साथ

गोरखपुर के 10 नंबर वार्ड का राजेंद्र नगर मोहल्ला सरकारी फ़ाइलों में तो शहरी बस्ती है, लेकिन खुले में शौच करते बच्चों और बजबजाती नालियों वाली यह बसाहट किसी रिफ्यूजी कैंप जैसी लगती है.

इसी मोहल्ले में कूड़ा फेंकने और गोबर के कंडे बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाला एक बदबूदार मैदान पार करके हम प्रेमलता देवी के घर पहुँचते हैं.

29 वर्षीय प्रेमलता यहां अपने मजदूर पति और तीन बेटों के साथ रहती हैं. एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एइएस) ने अलग-अलग समय पर उनके तीनों बेटों पर हमला बोला है.

दस साल के बड़े बेटे रितेश और 7 साल के मंझले बेटे पीयूष को अपने दोनों तरफ बिठाते हुए प्रेमलता दो साल के प्रतीक को गोद में लेकर बातचीत के लिए बैठती हैं.

एइएस के हमलों से उनका मंझला बेटा तो बच गया पर बड़ा बेटा रितेश मानसिक और शारीरिक विकलांगता का शिकार हो गया है जबकि छोटे बेटे प्रतीक पर एइएस का कितना असर हुआ है ये उसकी उम्र बढ़ने के साथ पता चलेगा.

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अपने ही 'घर' की बीमारी नहीं दूर कर पा रहे योगी?

इंसेफेलाइटिस से एक-तिहाई बच्चे हो जाते हैं विकलांग

ऐसा अनुमान है कि भारत में इंसेफेलाइटिस से ग्रसित होने वाले कुल बच्चों में लगभग एक-तिहाई जीवन भर के लिए शारीरिक या मानसिक विकलांग हो जाते हैं.

एक अनुमान के मुताबिक़ सिर्फ़ पूर्वी उत्तर प्रदेश में ही इंसेफेलाइटिस से विकलांग हुए बच्चों की संख्या दस हज़ार है. राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने कई बार उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश देते हुए राज्य में इंसेफेलाइटिस से विकलांग हुए बच्चों का आधिकारिक आंकड़ा जारी कर उनके इलाज और पुनर्वास के उपाय सुनिश्चित करने के लिए कहा है.

लेकिन अभी तक इस मामले में सरकार की तरफ़ से कोई आधिकारिक आंकड़े जारी नहीं किए गए हैं. इंसेफेलाइटिस की मार झेल चुके अपने तीन बेटों के साथ आँगन में बैठी प्रेमलता की उदास आँखें पूर्वी उत्तर प्रदेश की चरमराती हुई स्वास्थ व्यवस्था की गवाही दे रही थीं.

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प्रेमलता के घर का आंगन

तीनों बेटे हुए इंसेफेलाइटिस का शिकार

अपने बच्चों पर हुए इंसेफेलाइटिस के इन हमलों की कहानी सिलसिलेवार ढंग से शुरू करते हुए सबसे पहले बड़े बेटे रितेश का ज़िक्र करती हैं.

"2013 की सर्दियां शुरू ही हुई थीं. तब रितेश पांच साल के थे. अचानक इनको तीन-चार दिन बुखार रहा और उल्टियां हुईं. हम प्राइवेट में डॉक्टर के पास ले गए तो उन्होंने दवा दे दी. पर बुखार बना रहा. फिर अगले दिन अचानक भोर में इनको झटका आया. आंख-वाँख पलट दिए और बेहोश हो गए".

डॉक्टर ने कहा कि रितेश को तुरंत मेडिकल (बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज) ले जाएं. मेडिकल में इनको तुरंत इंसेफेलाइटिस वॉर्ड में भर्ती किया गया.

प्रेमलता बताती हैं, "25 दिन बाबू को होश नहीं था. आईसीयू में रहे. फिर जब होश आया तो हम सबको भूल गए. चिड़चिड़ापन आ गया था. जो सामान पाते वही फेंक देते. फिर जब अस्पताल से छुट्टी हुई तो इनका आधा शरीर काम नहीं कर रहा था. गर्दन भी एक तरफ लटकी रहती थी.''

''बड़ी मुश्किल से सालों मालिश करके, इलाज करवाकर, मेहनत और मिन्नतों से थोड़ा ठीक हुए हैं पर अभी भी अपना पैंट खुद नहीं पहन पाते. टॉयलेट में सफ़ाई ख़ुद नहीं कर पाते. स्कूल तो जाते हैं पर कुछ याद नहीं रहता. डॉक्टर ने बोल दिया है कि यह नॉर्मल बच्चों की तरह पढ़ाई नहीं कर पाएंगे."

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गोरखपुर में मरने वाले बच्चों की माओं से जानिए...इन मौतों के आंकड़ों में बदलने की कहानी.

प्रेमलता बताती हैं कि उनके मंझले बेटे पीयूष को अभी एक महीना पहले ही एइएस का झटका आया था. "जैसे ही उसका मुँह टेढ़ा हुआ और लार टपकने लगा, हम तुरंत मेडिकल ले गए. आठ दिन बाद छुट्टी हो गया. अभी दवा चल रहा है पर वो ठीक है. छोटे वाले प्रतीक को छह महीने पहले इंसेफेलाइटिस का झटका आया. पहले बुखार आया, फिर उल्टी और थोड़ी ही देर में बच्चे ने आंख पलट दिया. हम लोग मेडिकल ले गए. अभी तो ठीक है पर डॉक्टर ने कहा है कि इंसेफेलाइटिस का पूरा असर क्या हुआ है, बच्चे पर यह तो बड़ा होने पर ही पता चलेगा."

इंसेफेलाइटिस से विकलांग होने वाले बच्चों में संपूर्ण शारीरिक और मानसिक अपंगता के साथ-साथ आंशिक विकलांगता के मामले भी सामने आते हैं. इनमें दृष्टि दोष, भाषा दोष, हाथ-पैरों में टेढ़ापन, अनियंत्रित व्यवहार, अनियंत्रित शौच, हथेलियों और पंजों का निष्क्रिय होना जैसे लक्षण शामिल हैं. किसी भी तरह के संस्थागत समर्थन और चिकित्सकीय सहयोग के अभाव में इन बच्चों का भविष्य अंधकारमय ही रहा है.

उत्तर प्रदेश सरकार ने इंसेफेलाइटिस के कारण विकलांग हुए बच्चों को एक लाख रूपये की सहायता राशि देने की घोषणा तो की है लेकिन इसके तहत प्रेमलता को कोई मुआवजा नहीं मिला है.

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प्रेमलता के घर का पड़ोस

पूछने पर वे कहती हैं, "मेरे तीनों बच्चों को इंसेफेलाइटिस हुआ. मेरा बड़ा बेटा विकलांग है फिर भी हमें कहीं से कोई मदद नहीं मिली. एक रुपया भी नहीं. ऊपर से पहले जो दवाइयां मेडिकल कॉलेज के अंदर से मुफ़्त में मिल जाया करती थीं, अब उन्हें पैसे देकर बाहर से खरीदना पड़ता है. बताइए, इनके पापा मजदूरी करते हैं. मजदूर आदमी दिन का 300 रुपया कमाएगा तो उसमें अपने परिवार का पेट भरेगा या दवा खरीदेगा?"

घर के आसपास फैली गंदगी के बारे में बात करते हुए प्रेमलता कहती हैं, "डॉक्टर कहते हैं कि घर साफ़ रखा करो. मगर जब आसपास इतनी गंदगी हो तो सिर्फ घर साफ़ रखकर क्या हम बच्चों को बचा सकते हैं? हम गरीब लोग यहां रहते हैं इसलिए नगरपालिका वाले यहां कभी सफाई करने नहीं आते." स्थानीय रहवासी बताते हैं कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जब भी गोरखपुर आते हैं, तब उनका हेलीकॉप्टर गोरखनाथ मंदिर के पास ही बेस वार्ड नंबर 10 में ही उतरता है.

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गोरखपुर का राजेंद्र नगर मोहल्ला

अपने बच्चों के मेडिकल कागज़ात दिखाते हुए प्रेमलता की आंखों में आंसू भर आते हैं. तीनों बेटों के इंसेफेलाइटिस कार्ड दिखाते हुए वह कहती हैं, "हमें विश्वास नहीं होता कि हमारे तीनों बच्चों को यह बीमारी हो गई. ऐसी किस्मत भी किसी की होती है क्या ?"

गोरखपुर से लगभग 60 किलोमीटर दूर रहने वाली अनीता सिंह के आंगन में वक़्त आज भी रुका हुआ सा है. महाराजगंज ज़िले के परतावल ब्लॉक के बडहरा गांव में मौजूद उनके घर पहुंचते ही सबसे पहले नज़र उनके 10 साल का बेटे सूरज पर पड़ती है. आंगन में पड़ी एक चारपाई पर लेटा हुआ सूरज घड़ी की बंद सुइयों की तरह पूरा दिन आसमान में टिमटिमाते सर्दियों के सूरज को देखता रहता है.

सूरज अपनी जगह से हिल-डुल नहीं सकता. बोल भी नहीं सकता. आसपास से गुज़र रहे लोगों को देखते हुए सिर्फ रोता रहता है. सूरज का शरीर जन्म से ही सौ प्रतिशत विकलांगता से जूझ रहा है.

अगस्त 2008 में पैदा हुए सूरज के जन्म के कुछ ही देर बाद उन्हें एइएस के लक्षणों वाला तेज़ बुखार और झटका आया. इलाज के दौरान उनकी जान तो बचा ली गई पर वह जिंदगी भर के लिए सौ प्रतिशत विकलांग हो गए.

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अपने बेटे सूरज के साथ अनीता

मुझे देखते ही सूरज एक लम्बी साँस भर कर लगभग चीख मारते हुए रोता है. कानों में गर्म सीसे की तरह घुलती उसकी दर्द भरी रुलाई, किसी तीर की तरह दिल में धंसती है. तभी बच्चे की चीख सुनकर सुनहरे फूलों वाली बैंगनी साड़ी में लिपटी अनीता दौड़ती हुई बाहर आती हैं. सूरज की लटकी हुई गरदन को गोद में लेकर उनके आंसू और लार को अपने आंचल से पोंछती हुई अनीता ने जैसे अपने बच्चे की चीखों में भी सुर ढूंढ लिया था.

सूरज को गोद में संभालने कि कोशिश करते हुए अनीता कहती हैं, "इसके पैदा होने के वक़्त हमको दर्द शुरू होने से पहले ही तेज़ बुखार हो गया था. बच्चा घर पर ही पैदा हुआ, नॉर्मल डिलीवरी थी. पैदा होने के तुरंत बाद हमने देखा कि बच्चे को तेज़ बुखार है."

सूरज ऐसी भयानक आवाज़ में रो रहा था कि अनीता बुरी तरह घबरा गईं. उस रात को याद करते हुए अनीता कहती हैं, "फिर हम रात को ही इसे गोद में लेकर निकले. उस रात बहुत ठंड थी और तेज़ हवा चल रही थी. हमें कोई साधन नहीं मिला तो 5 किलोमीटर तक इसे पैदल ही गोद में लेकर आगे बढ़ते रहे. फिर एक बस मिली तो लेकर गोरखपुर पहुंचे. वहां 9 दिन भर्ती रखा. फिर जैसे-जैसे ये बड़ा होता गया वैसे-वैसे हमें पता चला कि इसके शरीर का कोई भी अंग ठीक से काम नहीं करता. इसका दिमाग ही नहीं है".

बेटे की देखभाल में गुज़रता है दिन

बातचीत के दौरान सूरज लगातार रोता रहा. बच्चे को चुप कराने का प्रयास करते हुए अनीता गहरे दुःख में भी मुस्कुराने लगती हैं. सूरज के बालों में हाथ फेरते हुए कहती हैं, "मुझे इसकी बहुत चिंता रहती है. पानी-खाना कुछ भी मांग नहीं पाता है. मैं खुद ही अपनी समझ से पानी पिलाती हूं और दाल-रोटी खिला देती हूँ. जब तक मैं ज़िंदा हूँ, इसको खिला जिला रही हूँ. यही सोच-सोच के दिल बैठा जाता है कि हमारे बाद इसका आगे क्या होगा. ये तो यह भी नहीं बोल सकता कि मैं धूप में पड़ा हूं, मुझे छाया में बिठा दो".

एइएस के स्पष्ट लक्षणों के बाद भी अनीता के पास ऐसा कोई मेडिकल दस्तावेज़ नहीं है जो कागज़ पर सूरज को एइएस का मरीज़ घोषित कर सके. मांगने पर वह सिर्फ 'सौ प्रतिशत विकलांगता' का प्रमाणपत्र दिखा पाती हैं. "तब हम लोगों को बच्चे के दुःख में इतना होश ही नहीं था कि कागज़-पत्तर का ध्यान करें. आज से दस साल पहले इंसेफेलाइटिस को लेकर इतना हल्ला भी नहीं थी. कागज़ नहीं है इसलिए हमें कोई सरकारी मदद भी नहीं मिली. हमारे जैसे बहुत से लोग हैं जिनको पूरे कागज़ न होने की वजह से सरकारी मदद नहीं मिली".

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बेटे सूरज का विकलांगता प्रमाण पत्र दिखातीं मां अनीता

"कैसे करेंगे इसका निबाह?"

सूरज का रोना लगतार जारी है और अब अनीता की आंखें में भी आंसू छलछला गए हैं. कुछ देर शून्य में देखते हुए वह किसी गहरी सोच में डूब जाती हैं. फिर मद्धम आवाज़ में कहती हैं, "अब ये इतना बड़ा हो गया है कि अगर चाहें भी तो इसको फिज़ेयोथेरेपी के लिए लेकर जाना हमारे लिए मुश्किल है. अब तो मुझसे अकेले उठता भी नहीं है. बिना किसी मदद के हम कैसे इसका निबाह करेंगे?"

बीआरडी मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल गणेश कुमार का कहना है कि अस्पताल विकलांग बच्चों की मदद के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है. "मैंने तो अभी अभी यह अस्पताल ज्वाइन किया है. पर हम इंसेफेलाइटिस से विकलांग हुए बच्चों की हर संभव मदद कर रहे हैं "

गोरखपुर के इन बच्चों को देखकर लगता है जैसे बीच यात्रा में वे कहीं अपने ही शरीरों में फंस गए हैं. निकलने को बेचैन हैं पर किसी भी तरह के संस्थागत और सरकारी समर्थन के आभाव में उनकी जिंदगियां हर साल इंसेफेलाइटिस से जुड़े 'अनुमानित' आकंड़ों में तब्दील होकर रह गई है.

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