अब 'हैप्पी' रहना सिखाएगी दिल्ली सरकार

  • 8 फरवरी 2018
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आप दफ़्तर के रास्ते में हैं और बॉस का लगातार फ़ोन आ रहा है. बात ज़रूरी है लेकिन नेटवर्क इतना ख़राब कि बात हो ही नहीं पा रही.

क्या आप ऐसी हालत में तनाव में आ जाते हैं?

क्या आप ग़लती करने के बाद और उसका अहसास होने के बाद भी माफी मांगने से हिचकिचाते हैं?

क्या आपको असफलता से इतना डर लगता है कि आप लाइफ़ में रिस्क ही नहीं लेते?

अगर ऊपर के सारे सवालों का जवाब 'हां' में है तो हो सकता है कि बचपन में आपको खुश रहने यानी हैप्पीनेस की क्लास नहीं दी गई.

जीने की इस कला को अब दिल्ली सरकार अपने छात्रों को सिखाने जा रही है.

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दिमाग की ट्रेनिंग

दिल्ली सरकार में शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने एलान किया है कि उनकी सरकार अगले शैक्षणिक सत्र से हैप्पीनेस करिकुलम लेकर आएगी.

'एक्सिलेंस इन एजुकेशन' प्रोग्राम को संबोधित करते हुए मनीष सिसोदिया ने शिक्षकों को कहा, "दिल्ली के स्कूल में चार-पांच साल का बच्चा जब एडमिशन लेता है, तो अगले दस साल हमें उसको यही सिखाने की ज़रूरत है.

लेकिन क्या हैप्पी या ख़ुश रहना सिखाया जा सकता है? इस सवाल पर मनीष सिसोदिया ने कहा कि "ख़ुश रहना जीने की एक कला है. इसे ज़रूर सिखाया जा सकता है."

उनके मुताबिक़ "दिमाग़ को इसके लिए ट्रेन करने की ज़रूरत होती है."

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मनीष कहते हैं, "जब संगीत के राग पहचाने की ट्रेनिंग दी जाती तो फिर ख़ुश रहने की ट्रेनिंग क्यों नहीं."

अपना अनुभव बताते हुए मनीष कहते हैं, "जब मैं टीवी पत्रकार था तो फ़िल्म देखते समय रोने के सीन में यही सोचता था कि कैमरा कहां लगा होगा जो चेहरे पर आने वाले जज़्बात को ऐसे फ़िल्माया जा सका. ऐसा इसलिए था क्योंकि मेरे दिमाग़ को ऐसी ट्रेनिंग दी गई थी."

आजकल तीन साल की उम्र से लेकर 14 साल तक का बच्चा स्कूल में होता है. मतलब ये कि इस दौरान बच्चे का दिमाग़ शिक्षकों के पास होता है.

शिक्षक चाहे तो इन दस सालों में बच्चे के दिमाग़ को इतना ट्रेन कर दे ताकि वो ख़ुद में ख़ुशियां ढूंढ सके.

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हैप्पीनेस की क्लास

लेकिन ये विषय पढ़ाया कैसे जाएगा?

दिल्ली सरकार ने इसका भी खाका तैयार कर लिया है.

दिल्ली सरकार में इस प्रोजेक्ट पर ऑफ़िसर ऑन स्पेशल ड्यूटी के पद पर काम कर रही मैथिली बैक्टर ने बीबीसी को बताया कि 'नर्सरी से लेकर आठवीं क्लास के छात्रों को हैप्पी रहना सिखाया जाएगा.'

'इसके लिए अंग्रेज़ी और हिन्दी जैसी किताब नहीं होगी. केवल एक्टिविटी के ज़रिये ख़ुश कैसे रहना है, ये बताया जाएगा.'

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एक्टिविटी कैसी होंगी?

इस सवाल के जवाब में मैथिली कहती हैं, "सिमुलेशन यानी आर्टिफिशियल सीन क्रिएट कर ऐसे अनुभव सिखाए जा सकते हैं. कई बार कहानी पढ़ते हुए चीज़ों को बीच में छोड़कर कहानी से जुड़े सवाल-जवाब भी 'हैप्पीनेस' सिखाने में मददगार होते हैं. इसका कोई सेट पैटर्न नहीं होता."

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कैसे मिलेगी मदद ?

पिछले साल सितंबर में गुरुग्राम के एक स्कूल में सात साल के बच्चे की टॉयलेट में हत्या कर दी गई थी.

दिल्ली के एक प्राइवेट स्कूल में चार साल की बच्ची के साथ उसी के दोस्त ने गंदी हरकत की. मामला चार महीना पुराना है.

इसी साल जनवरी में लखनऊ के एक स्कूल में छठी क्लास की छात्रा ने पहली क्लास में पढ़ने वाले छात्र को जान से मारने की कोशिश की.

तीनों मामले अलग-अलग जगह के हैं, लेकिन सबके पीछे दिक्कत एक ही है. छात्रों की मनोदशा. हर मामले में छात्र अपनी वर्तमान स्थिति में ख़ुश नहीं था.

इन सभी घटनाओं से सीख लेते हुए दिल्ली सरकार ने 'हैप्पीनेस' को करिकुलम से जोड़ने का फ़ैसला किया है.

बेंगलुरु में रहने वाली एजुकेशन साइकोलॉजिस्ट रेणु नरगुंदे के मुताबिक़, "दिल्ली सरकार की ये पहल बहुत ही सकारत्मक है. ख़बर सुन कर मैं भी हैप्पी हो गई"

बेंगलुरु के कई प्राइवेट स्कूल में रेणु भी बच्चों के 'हैप्पीनेस कोशेंट' का पता लगाती हैं.

उनके मुताबिक़, "हमारे दिमाग़ और ख़ुश रहने का सीधा संबंध होता है. शरीर में कुछ न्यूरो केमिकल (जैसे एंड्रोफ़िन और सेरोटोनिन) होते हैं, जो ख़ुश व्यक्ति में ज़्यादा मात्रा में पाए जाते हैं और दुखी आदमी में कम."

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'हैप्पीनेस कोशेंट'क्या है?

छात्रों का 'हैप्पीनेस कोशेंट' आईक्यू की ही तरह कुछ सवालों के ज़रिये आसानी से पता लगाया जा सकता है.

रेणु का कहना है कि कुछ सवालों को अचानक छात्रों से पूछा जाता है और फिर एक से दस के स्केल पर उसे मापा जाता है.

साइकोलॉजी के छात्रों को बाक़ायदा हैप्पीनेस पढ़ाया जाता है.

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'हैप्पीनेस' के कोर्स भी होते हैं

रेणु का कहना है कि हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में इसका एक कोर्स भी चलता है.

उनके मुताबिक़ "साइकोलॉजी में पढ़ाई के दो हिस्से होते हैं. एक तो साइको पैथोलॉजी होती है, जिसमें दिमाग़ से जुड़ी बीमारियों के बारे में पढ़ाया जाता है. दूसरे हिस्से में सामान्य स्तर के जीवन से अच्छे और बेहतर स्तर के जीवन की तरफ़ कैसे जाएं, उसकी पढ़ाई की जाती है. इसे नार्मल लिविंग से वेलबीइंग और एक्सिलेंस की तरफ़ जाना जाता है."

निया के कई देशों में इसका इस्तेमाल भी आज भी होता है.

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कितना ख़ुश देश है भारत?

देश में रहने वाले लोग कितने ख़ुश हैं, इसी आधार पर हर साल दुनिया में अलग अलग देशों की हैप्पीनेस इंडेक्स की रिपोर्ट भी आती है.

2017 में नॉर्वे इस लिस्ट में सबसे ऊपर था, दूसरे नम्बर पर डेनमार्क था. हमारा पड़ोसी देश भूटान भी दुनिया के टॉप के 100 देशों में है जबकि भारत 155 देशों की लिस्ट में 122 स्थान पर है.

हमारे देश में मध्य प्रदेश इकलौता राज्य है जहां खुशहाली मंत्रालय भी है.

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