अफ़ज़ल गुरू की बरसी पर भाजपा की साझीदार पीडीपी का अफ़सोस

  • 9 फरवरी 2018
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संसद पर 2001 में हुए हमले में दोषी पाए गए अफ़ज़ल गुरू को जम्मू-कश्मीर की सत्ताधारी पार्टी पीडीपी 'शहीद' मानती रही है, उसने अफ़ज़ल गुरू को फांसी दिए जाने का ज़ोरदार विरोध किया था और सरकार में आने से पहले तक गुरू की बरसी पर कई आयोजन करती रही है.

भाजपा से साथ मिलकर राज्य में गठबंधन सरकार चला रही पीडीपी अब पहले की तरह बंद का आयोजन तो नहीं करती लेकिन उसके नेता और प्रवक्ता ये ज़रूर कहते हैं कि फाँसी दिया जाना ग़लत था.

9 फ़रवरी को अफज़ल गुरू की बरसी पर जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी पार्टियों ने बंद का आह्वान किया और ये दिन सत्ताधारी गठबंधन के लिए काफ़ी चुनौती भरा होता है क्योंकि यह दोनों की साझीदारी से जुड़े सबसे असहज सवाल की याद दिलाता है.

अफ़ज़ल गुरू के मामले पर देशभक्ति का दावा करने वाली भाजपा और गुरू की फाँसी को अन्याय बताने वाली पीडीपी का रुख़ एक-दूसरे के बिल्कुल उलट है.

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अफ़ज़ल गुरू को साल 2013 में भारतीय संसद पर हमले के आरोप में दिल्ली के तिहाड़ जेल में फाँसी दी गई थी.

अफ़ज़ल की फांसी से पहले जम्मू-कश्मीर की मौजूदा सरकार पीडीपी विपक्ष में थी. अफ़ज़ल को फाँसी को वो एक राजनीतिक मुद्दा कहती रही है. पीडीपी की दलील थी कि अफ़ज़ल को फांसी सिलेक्टिव बुनियादों पर दी गई थी.

जम्मू-कश्मीर में फिलहाल बीजेपी और पीडीपी की गठबंधन सरकार है. जहं बीजेपी अफ़ज़ल को फाँसी देने की मांग करती रही है वहीं सरकार में उनकी साझेदार जबकि पीडीपी, अफ़ज़ल की फांसी का विरोध करती रही है.

लेकिन सत्ता में आने के बाद से पीडीपी ने इस मुद्दे पर खामोशी अख़्तियार कर ली है. हालाँकि पीडीपी का आज भी ये कहना है कि उन्हें अफ़ज़ल की फाँसी पर अफ़सोस है और अफ़ज़ल के परिवार के साथ उन्हें हमदर्दी है.

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पीडीपी के प्रवक्ता रफ़ी अहमद मीर कहते हैं, "जब अफ़ज़ल गुरू को फाँसी हुई थी, तो हमने उस पर हंगामा किया था. अब तो अफ़ज़ल को फाँसी हो चुकी है, अब तो इस पर फ़र्क पड़ेगा ही. हमने उस समय इस बात पर विरोध किया था कि अफ़ज़ल का नंबर तो 29 है, और हमें ये लगा था कि ये राजनीति के खेल है. आज के दिन में इस पर और क्या किया जा सकता है?"

ये पूछने पर कि क्या बीजेपी के साथ सरकार बनाने के बाद पीडीपी ने अपना रुख़ बदल दिया, तो मीर कहते हैं, "अफ़ज़ल गुरू तो अब ज़िंदा हैं नहीं. अब तो हम ये नहीं कहेंगे कि अफ़ज़ल को क्यों फाँसी दी? फांसी तो हो गई, हमने उन वक्त इस पर सवाल खड़े किए. लेकिन हम घूम-फिर कर वहीं आ जाते हैं. हम इससे आगे बढ़ना चाहते हैं. हमें अफ़सोस है. उस वक्त जो हुआ सो हुआ. इसके लिए उस वक्त की सरकार ज़िम्मेदार है."

मीर का ये भी कहना था कि अफ़ज़ल को फाँसी देने का मतलब ये नहीं कि मामला दफ़न हो गया. वो कहते हैं, "हमारा ये कहना है कि ऐसा दोबारा नहीं होना चाहिए."

पीडीपी ने अफ़ज़ल को फाँसी देने के बाद हमेशा ये मांग की कि वो तिहाड़ जेल से उनक शव वापस लाने की मांग करती रहेगी.

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वहीं बीजेपी के नेता और विधायक रविंदर रैना का कहना है कि अफ़ज़ल गुरू के मामले में उनका स्टैंड ये है कि "जो भी देश के ख़िलाफ़ कुछ करेगा, आम लोगों का क़त्ल करेगा, संसद पर हमला करेगा, ये सब किसी क़ीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता."

अगर पीडीपी ने अफ़ज़ल के शव की मांग की तो इस बारे में वो क्या कहेंगे. इस सवाल के उत्तर में उनका कहना था, "ये तो गई-गुज़री बात है. आज सरकार में हर कोई ज़िम्मेदारी के साथ काम कर रहा है."

सरकार ने अलगावादियों के प्रदर्शन की अपील से निपटने के लिए कश्मीर के कई इलाकों में प्रतिबंध लगाए हैं और भारी तादाद में सुरक्षाबलों को तैनात किया गया है. बंद की अपील के कारण सभी दुकानें बंद कर दी गई हैं और सड़कों पर गाड़ियों की आवाजाही भी ठप है.

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अलगावादी नेता सैय्यद अली शाह गीलानी और मीरवाइज़ उमर फ़ारूख़ को उनके घरों में नज़रबंद कर दिया गया है जबकि यासीन मालिक को श्रीनगर की सेंट्रल जेल में बंद रखा गया है.

किसी प्रकार के चरमपंथी हमले की आशंका के कारण शुक्रवार को कश्मीर को हाई अलर्ट पर रखा गया है.

खबरों के मुताबिक़, पुलिस को इस बात की आशंका है कि जैश का अफ़ज़ल गुरू स्क्वाड इस दिन कश्मीर में कहीं पर भी हमला कर सकता है, जिसके मद्देनज़र सुरक्षा को भी अधिक चुस्त किया गया है.

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