#HerChoice: बिस्तर में जबरदस्ती करने वाले पति को मैंने छोड़ दिया

  • 10 फरवरी 2018
महिला, शादी, हिंसा, पति, पत्नी, रिश्ते

मुझे ऐसा लग रहा था कि वो रात बीतेगी नहीं. मेरा सिर फट रहा था और मैं लगातार रोए जा रही थी.

रोते-रोते जाने कब आंख लग गई. सुबह छह बजे नींद खुली तो मेरा पति सामने था. पिछली रात का सवाल लिए. उसने पूछा, "तो क्या सोचा तुमने? तुम्हारा जवाब हां है या ना?"

मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था. आखिर हिम्मत करके बोली, "आप आज ऑफ़िस जाइए प्लीज़. मैं आपको शाम तक फ़ोन करके बता दूंगी, वादा करती हूं."

उसने धमकाते हुए कहा, "ठीक है. मैं चार बजे ख़ुद तुम्हें फ़ोन करूंगा. मुझे जवाब चाहिए और हां, में जवाब चाहिए, वर्ना रात में सज़ा भुगतने के लिए तैयार रहना."

सज़ा से उसका मतलब था 'एनल सेक्स'. उसे पता था कि मुझे इससे बहुत दर्द होता है, इसीलिए उसने इसे 'टॉर्चर' करने का तरीका बना लिया था.

नौ बजे तक वो और उसकी बड़ी बहन दोनों ऑफ़िस जा चुके थे. मैं घर में अकेली थी. घंटों सोचने के बाद मैंने अपने पापा को फ़ोन लगाया और कहा कि मैं अब उसके साथ नहीं रह सकती.

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बीबीसी कीविशेष सिरीज़ #HerChoice12 भारतीय महिलाओं की वास्तविक जीवन की कहानियां हैं. ये कहानियां 'आधुनिक भारतीय महिला' के विचार और उसके सामने मौजूद विकल्प, उसकी आकांक्षाओं, उसकी प्राथमिकताओं और उसकी इच्छाओं को पेश करती हैं.

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मुझे डर था कि पापा नाराज़ होंगे लेकिन उन्होंने कहा, "तुम बैग उठाओ और निकलो वहां से."

मैं अपने 'ओरिजिनल सर्टिफ़िकेट्स' और एक किताब लेकर बस अड्डे की तरफ़ भागी. पति को मेसेज किया कि, 'मेरा जवाब ना है, मैं अपने घर जा रही हूं', और फ़ोन स्विच ऑफ़ कर लिया.

थोड़ी देर बाद मैं अपनों के बीच अपने घर थी. मैंने शादी के दो महीने में ही अपने पति का घर छोड़ दिया था. मेरा पति, साहिल. जिसे मैं आज से तक़रीबन तीन साल पहले ग्रैजुएजशन के आख़िरी साल में मिली.

वो बहुत हंसमुख था. मुझे उसका आस-पास रहना अच्छा लगता था और यूं ही आस-पास रहते हुए प्यार हो गया. हम घूमने जाते, घंटों फ़ोन पर बातें करते. ज़िंदगी कुछ ज़्यादा ही मेहरबान थी, लेकिन ये गुलाबी रोमांस ज़्यादा दिन नहीं टिक सका.

'मैंने कुंवारी मां बनने का फ़ैसला क्यों किया?'

धीरे-धीरे मुझे लगने लगा कि ये वो बराबरी वाला रिश्ता नहीं है, जो मैं चाहती थी. ये रिश्ता वैसा ही होता जा रहा था जैसा मेरे मम्मी और पापा का था. फ़र्क़ इतना कि मम्मी कुछ नहीं कहती थीं और मैं चुप रह नहीं पाती थी.

पापा छोटी-छोटी बातों को लेकर मम्मी पर चीख़ते, हाथ उठाते. मम्मी बस रोती रहतीं. साहिल के साथ बहस होती तो वो अक़्सर धक्का-मुक्की पर उतर आता और ज़बरदस्ती क़रीब आने की कोशिश करता. मैं मना करती तो चीख़ता चिल्लाता.

एक बार उसने मुझसे पूछा, "अच्छा बताओ, अगर मैं कभी तुम पर हाथ उठाऊं तो...?" मैं हैरान रह गई. बमुश्किल अपने ग़ुस्से को क़ाबू में कर बोली, "मैं उसी दिन तुमसे अलग हो जाऊंगी."

उसने तपाक से कहा, "इसका मतलब तुम मुझसे प्यार ही नहीं करती. प्यार में तो कोई शर्त नहीं होनी चाहिए." इसके बाद तक़रीबन एक महीने तक हमारी बोलचाल बंद रही.

धीरे-धीरे लड़ाइयां बढ़ने लगीं. कई बार मैंने रिश्ता ख़त्म करने की कोशिश की लेकिन हर बार वो माफ़ी मांग लेता था.

मैं ख़ुद को हमेशा के लिए साहिल से दूर करना चाहती थी लेकिन पता नहीं क्यों ऐसा कर नहीं पा रही थी. इस बीच मुझ पर शादी का दबाव बनाया जा रहा था. मैं अब टीचर बन गई थी. मैं क्लास में होती और मम्मी-पापा का फ़ोन आ जाता.

फ़ोन पर हर बार वही बात होती, "शादी के बारे में क्या सोचा? साहिल से ही कर लो. उससे नहीं करनी तो हमारी पसंद के लड़के से कर लो. अपनी दो छोटी बहनों के बारे में भी सोचो..." वगैरह वगैरह.

घर में कुछ भी गड़बड़ होती तो उसे मेरे शादी ना करने से जोड़ दिया जाता. मम्मी की तबीयत ख़राब इसलिए हुई क्योंकि मैं शादी नहीं कर रही हूं. पापा को बिज़नेस में नुक़सान हुआ क्योंकि मैं शादी नहीं कर रही हूं.

'हां, मैं ग़ैर-मर्दों के साथ चैट करती हूं, तो?'

मैं इतनी परेशान हो गई कि आख़िर मैंने शादी के लिए हामी भर दी. मैं तैयार तब भी नहीं थी और साहिल का वादा, कि वो कोई ऐसा काम नहीं करेगा जिससे मुझे दुख हो, पर भरोसा भी नहीं था.

शादी के बाद मेरा डर सच बनकर सामने आने लगा. साहिल मुझे कठपुतली की तरह अपने इशारों पर नचाने लगा.

मुझे कविताएं लिखने का शौक़ था. मैं फ़ेसबुक पर अपनी कविताएं शेयर करती थी. उसने इस पर रोक लगा दी. मैं वही कपड़े पहन सकती थी जो वो चाहता था.

मुझे याद है एक बार उसने कहा था, "रात तक अपनी पढ़ाई-लिखाई का काम निबटाकर बैठा करो. मुझे ख़ुश नहीं रखोगी तो मैं कहीं और जाऊंगा."

वो कहता था कि मैं उसे ख़ुश नहीं कर पाती हूं. इसलिए पॉर्न देखकर कुछ सीखने की नसीहत देता. और फिर उसके सिर पर हीरो बनने का शौक़ सवार हो गया. वो मुझे छोड़कर मुंबई जाना चाहता था.

उसने कहा, "तुम यहीं रहकर नौकरी करो और मुझे पैसे भेजना. फिर मैं तुम्हारे नाम पर लोन लेकर घर भी ख़रीदूंगा."

इसी के लिए उसे मेरे हामी चाहिए था. उस रात 'हां' सुनने के लिए उसने मुझे धक्का देकर बेड पर गिरा दिया और फिर ज़बरदस्ती करने की कोशिश की.

बस एक हद पार हो गई. उसी रात की अगली सुबह मैंने अपने पति को छोड़ दिया. मैं पढ़ी-लिखी लड़की थी, ख़ुद कमा सकती थी, अपने दम पर जी सकती थी. फिर भी जब मैं साहिल का घर छोड़कर निकली तो लगा जैसे मेरा कलेजा मुंह को आ रहा था.

#HerChoice जब मुझे मालूम चला कि नपुंसक से मेरी शादी हुई है

समाज का डर था और अपनों का भी. लेकिन मेरे सीने में जमा दर्द इस डर से ज्यादा बड़ा था. मम्मी-पापा और दो बहनों से घिरी मैं अपने घर पहुंची. मेरे बाल बिखरे हुए थे और आंखें रात भर रोने की वजह से सूजी हुई.

शादी के दो महीने बाद लड़कियां जब मायके आती हैं तो उनके चेहरे पर अलग ही निखार होता है. लेकिन मेरा चेहरा मुर्झाया हुआ था. पड़ोसियों की चतुर आंखों को सच्चाई भांपते देर नहीं लगी.

मेरे घर आने वालों का तांता लग गया. सब कह रहे थे, हमारे साथ बहुत बुरा हुआ. कुछ लोग उम्मीद बंधा रहे थे कि साहिल ख़द मुझे वापस ले जाने आएगा.

कुछ का कहना था कि इतनी छोटी-छोटी वजह से इतना बड़ा फ़ैसला नहीं लेना चाहिए. जितने मुंह, उतनी बातें. लेकिन ये बातें मेरा फ़ैसला नहीं बदल सकीं.

साहिल का घर छोड़े मुझे सात महीने हो चुके हैं और अब मैं अपने रास्ते खुद तय कर रही हूं. मुझे फ़ेलोशिप मिली है, मैं नौकरी कर रही हूं और साथ में पढ़ाई भी.

इन सब के साथ पुलिस थानों और कोर्ट के चक्कर लगते रहते हैं क्योंकि अभी क़ानूनी तौर पर तलाक़ की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है.

अब भी मैं कई बार सोते-सोते चौंककर उठ जाती हूं. अब भी मुझे बुरे सपने आते है. जो कुछ मेरे साथ हुआ उसे मैं अब भी भूल नहीं पाई हूं लेकिन आगे बढ़ने की मेरी कोशिश जारी है.

#HerChoice आख़िर क्यों मैंने एक औरत के साथ रहने का फ़ैसला किया?

रिश्तों और प्यार से मेरा भरोसा डगमगाया ज़रूर है लेकिन टूटा नहीं है. मैंने सोचा है कि खुद को कम से कम तीन साल का वक़्त दूंगी. इस दौरान मैं अपना सारा प्यार ख़ुद पर लुटाऊंगी और ख़ुद को मजबूत बनाऊंगी.

मुझे खुद पर फ़ख्र है कि मैं चुप नहीं रही, घुटती नहीं रही बल्कि वक़्त रहते इस रिश्ते को तोड़ दिया. इसीलिए मुझे यक़ीन है कि मेरा आने वाला कल मेरे अतीत और वर्तमान से बेहतर होगा.

(ये भारत के पश्चिमी हिस्से में रहने वाली एक महिला की वास्तविक कहानी है जो बीबीसी संवाददातासिन्धुवासिनी से बातचीत पर आधारित है. महिला के आग्रह पर नाम बदल दिए गए हैं. इस सिरीज़ की प्रोड्यूसर दिव्या आर्य हैं.)

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