नज़रियाः क्या इसराइल-फ़लस्तीन के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाएगा भारत?

मई 2017 में चार दिनों के भारत दौरे पर आए थे फ़लस्तीन के राष्ट्रपति मोहम्मद अब्बास

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मई 2017 में चार दिनों के भारत दौरे पर आए थे फ़लस्तीन के राष्ट्रपति मोहम्मद अब्बास

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 9 फरवरी से मध्य पूर्व के देशों ओमान, यूएई और फ़लस्तीन के दौरे पर हैं. इनमें उनकी फ़लस्तीन यात्रा सबसे ज़्यादा अहम माना जा रहा है.

भारत ने संयुक्त राष्ट्र में अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के उस प्रस्ताव के विरोध में मतदान भी किया जिसमें तेल अवीव की जगह येरुशलम को इसराइल की राजधानी घोषित कर दिया गया. लेकिन इसराइल के प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतन्याहू भारत आकर ये कहते हैं कि संयुक्त राष्ट्र में महज एक नेगेटिव वोट से भारत के साथ हमारे मजबूत संबंधों में कमी नहीं आएगी.

बीते साल मोदी इसराइल गए थे और अब वो फ़लस्तीन का दौरा कर रहे हैं. वो इन दोनों जगहों पर जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री भी हैं. तो ऐसे में इस दौरे को कैसे देखा जाए?

साथ ही संयुक्त राष्ट्र में वोटिंग से अमरीका ने फ़लस्तीनियों की नज़र में अपनी विश्वसनीयता खो दी है. तो क्या इसे भारत के पास इसराइल और फ़लस्तीन के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने के बड़े मौके के रूप में देखा जाना चाहिए?

ऐसे में सबकी निगाहें पीएम मोदी के फ़लस्तीन दौरे पर लगी हैं. बीबीसी संवाददाता अभिजीत श्रीवास्तव ने पूर्व विदेश सचिव शशांक से इन्ही सभी मुद्दों पर विस्तार से बात की.

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इसराइल के बनने की कहानी

पढ़ें सचिव शशांक का नज़रिया

भारत की पॉलियी 'लुक ईस्ट' और 'एक्ट ईस्ट' की रही है. भारत के रिश्ते पश्चिमी देशों के साथ भी अच्छे रहे है. भारत एनर्जी सिक्युरिटी और ख़ास कर जो 80 लाख के क़रीब भारतीय मूल के लोग वहां काम कर रहे हैं उनकी सहुलियत और सुरक्षा की दृष्टि से भी काम करता रहा है. अरब देशों और भारतीयों में रिश्ते बहुत पुराने समय से अच्छे रहे हैं.

इसराइल के साथ डिफेंस या कृषि तकनीक या रिसर्च ऐंड डेवलपमेंट के क्षेत्र में रिश्ते रहे हैं. उस रिश्ते को अलग तरीके से देखा गया है.

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इसराइल के प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतन्याहू से गले मिलते भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

येरुशलम पर भारत अपने रुख़ पर कायम

संयुक्त राष्ट्र में इसराइल के ख़िलाफ़ वोट देने के बावजूद उसके साथ संबंधों में कोई कड़वाहट नहीं आई है क्योंकि भारत का येरुशलम को लेकर रुख़ बहुत पहले से स्पष्ट है.

इसराइल के साथ द्विपक्षीय रिश्ते में जो संभावनाएं हैं उसे इसराइल और भारत दोनों ही आगे बढ़ाने की चाहत रखते हैं.

फ़लस्तीन के मामले में भारत अपने टू-स्टेट के रुख़ पर कायम है. भारत के फ़लस्तीन और यासिर अराफ़ात के साथ बहुत नज़दीकी रिश्ते थे और ये आज तक कायम हैं. इस रिश्ते को और मजबूत करने के लिए ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फ़लस्तीन के दौरे पर गए हैं.

भारत की तरफ से मदद की कोशिश की जाती रही है और इस दौरे से उनको आर्थिक मदद, उनकी तकनीकी क्षमताएं बढ़ाने में भारत ज़रूर मदद का हाथ बढ़ाएगा.

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अमरीका और इसराइल की नई शुरूआत

आगे अमरीका के लिए आसान नहीं होगा

भारत हमेशा से तैयार रहा है कि इसराइल और फ़लस्तीन के बीच सुलह हो सके. भारत ने पहले से मान रखा है कि फ़लस्तीन में 'टू स्टेट सल्यूशन' होना चाहिए. इसलिए अमरीका का रुख़ बदलने के बाद भी भारत ने संयुक्त राष्ट्र में अपनी पुरानी पॉलिसी के तहत ही वोट किया था.

भारत अपने रुख़ पर कायम है. लेकिन हाल ही में पश्चिम एशिया में सुरक्षा के बदले हालात और अमरीका ने इसराइल के तरफ अपना रवैया एकतरफा बनाने का जो फ़ैसला किया है इससे उसे दोनों के बीच शांति बहाली के प्रयासों में मुश्किल होगी.

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इसराइल को लेकर मोदी की विदेश नीति कितनी बदली?

भारत को क्या करना चाहिए?

लेकिन अगर शांति प्रक्रिया में अमरीका प्रमुख भूमिका निभाए तो अच्छा है क्योंकि उसके सभी देशों को साथ संबंध अच्छे हैं. भारत को कोशिश करनी चाहिए लेकिन उसके लिए आवश्यक नहीं है.

सऊदी अरब और ईरान के रिश्ते अच्छे नहीं हैं. सऊदी अरब और इसराइल के रिश्ते इसी मामले में सुधर रहे हैं, ईरान के ऊपर दबाव बनाने के लिए. लेकिन भारत के लिए जरूरी है कि ईरान से रिश्ते अच्छे बने रहे.

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फ़लस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन के चेयरमैन यासिर अराफ़ात पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के करीबी माने जाते थे

खास कर चाबहार बंदरगार की बात करें तो अगर वो ट्रांज़िट कनेक्टिविटी बन जाती है तो अफगानिस्तान के लिए तो वहां भारत से मदद पहुंचने में और आसानी होगी जैसा कि पूरी दुनिया उम्मीद कर रही है. हालांकि पाकिस्तान होकर अफगानिस्तान के साथ सीधे संबंध बनाने में भारत को अधिक कामयाब नहीं मिल रही है.

फ़लस्तीन में समस्या वहां अंदरुनी मतभेद के कारण उभरे हैं. हमास जैसे समूहों की वजह से इसराइल के साथ संबंध ठीक नहीं हो पा रहे हैं. भारत की कोशिश होगी कि फ़लस्तीन में रहने वाले जो लोग अपनी आर्थिक और सामाजिक क्षमता बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं भारत उसमें मदद करे. और अगर वहां इस पर आम सहमति बनती है कि इसराइल के साथ संबंध सुधारने में भारत को मध्यस्थ बनाया जाए तो भारत इससे पीछे नहीं हटेगा.

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इसराइली, जो फ़लस्तीनियों के साथ है!

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