उत्तर प्रदेश: ताबड़तोड़ एनकाउंटर पर क्यों उठ रहे हैं सवाल

  • समीरात्मज मिश्र
  • लखनऊ से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
उत्तर प्रदेश पुलिस

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उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक ओपी सिंह लखनऊ में एटीएस हेडक्वॉर्टर में

गत तीन फ़रवरी को नोएडा में एक प्रशिक्षु पुलिस अधिकारी की गोली से घायल जीतेंद्र यादव के भाई और दोस्त मीडिया में ये सफ़ाई दे रहे थे कि नोएडा में जिम चलाने वाले जितेंद्र की न तो किसी से कोई रंज़िश थी और न ही उन्होंने कभी कोई आपराधिक कृत्य किया था कि पुलिस उन पर हाथ डाले.

मामले को तूल पकड़ता देख नोएडा के एसएसपी लव कुमार को सफ़ाई देनी पड़ी और कार्रवाई भी करनी पड़ी.

विजय दर्शन नाम के जिस दारोगा पर जीतेंद्र को गोली मारने का आरोप था उसे गिरफ़्तार कर लिया गया और चार अन्य पुलिसकर्मियों को सस्पेंड कर दिया गया.

एसएसपी ने साफ़तौर पर कहा कि ये एनकाउंटर का मामला नहीं था और दारोगा ने आपसी रंज़िश के चलते जीतेंद्र को गोली मारी थी.

लेकिन ये अकेला मामला नहीं है जिसकी वजह से एनकाउंटर की घटनाएं चर्चा में आई हैं.

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योगी सरकार ने पिछले दस महीनों में एनकाउंटर का जो कीर्तिमान बनाया है उससे लोग आश्चर्य में हैं.

आश्चर्य की वजह दस महीने में होने वाले 1142 एनकाउंटर और उसमें मरने वाले 34 से ज़्यादा कथित अपराधी नहीं बल्कि इसकी ज़द में आए जीतेंद्र जैसे ही कुछ बेगुनाह लोग हैं.

नोएडा की घटना से पहले भी कई मुठभेड़ों पर सवाल उठ चुके हैं.

नोएडा में ही पिछले साल सुमित गुर्जर के एनकाउंटर को लेकर काफी हंगामा हुआ था और लोगों ने धरना प्रदर्शन भी किया था.

यही नहीं, 18 जनवरी को मथुरा में एनकाउंटर के दौरान एक बच्चे की गोली लगने से मौत हो गई थी.

नोएडा में ही 15 सितंबर को मुठभेड़ के दौरान पुलिस ने तीन कथित बदमाशों को पकड़ा था.

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हाई कोर्ट में याचिका

इनमें से एक व्यक्ति आज़म को गोली लगी थी जिसके विरोध में उनके परिजनों ने एसएसपी ऑफिस पर प्रदर्शन किया था.

परिवार वालों का आरोप था कि आज़म को पहले पकड़ा गया फिर गोली मारी गई.

इसकी शिकायत लेकर परिवार वाले हाई कोर्ट भी गए लेकिन हाई कोर्ट ने याचिका ख़ारिज कर दी.

नोएडा के अलावा मेरठ, आगरा, लखनऊ, इलाहाबाद, वाराणसी, कानपुर ज़ोन में भी अब तक मुठभेड़ की कई घटनाएं हो चुकी हैं.

ताबड़तोड़ होने वाली मुठभेड़ों पर न सिर्फ़ विधान सभा और संसद में हंगामा मचा है बल्कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी सवाल उठाए हैं.

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10 दिन में दो दर्जन एनकाउंटर

क़रीब महीने भर पहले उत्तर प्रदेश में पुलिस महानिदेशक की कुर्सी सँभालने वाले ओपी सिंह के पदभार सँभालते ही लखनऊ और उसके आस-पास हुई ताबड़तोड़ डकैती की घटनाओं ने पुलिस की सक्रियता पर भले ही सवाल उठा दिए लेकिन पुलिस ने 10 दिनों के भीतर डीजीपी को क़रीब दो दर्जन एनकाउंटरों की सलामी भी दे डाली.

डीजीपी ओपी सिंह कहते हैं कि क़ानून-व्यवस्था को दुरुस्त रखने के लिए अपराधियों पर लगाम लगाना ज़रूरी है और इस दौरान आत्मरक्षा में पुलिस को कई बार हथियार भी उठाना पड़ता है.

एनएचआरसी की नोटिसों के सवाल पर वो कहते हैं, "नोटिस का जवाब दिया जाएगा."

वहीं जानकारों का कहना है कि मुठभेड़ की इतनी घटनाएं मुख्यमंत्री की अपराधियों को बार-बार दी गई चेतावनी को देखते हुए भी हो रही हैं ताकि पुलिस अधिकारी मुख्यमंत्री की नज़र में आ सकें.

लेकिन यूपी के पुलिस महानिदेशक रह चुके रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी प्रकाश सिंह कहते हैं कि यूपी की परिस्थितियों के लिहाज़ से ऐसा ज़रूरी हो गया था.

प्रकाश सिंह कहते हैं, "पिछले दस बारह साल में उत्तर प्रदेश में जिस तरह से अपराधियों का बोल-बाला हो गया था, अपराधी बेख़ौफ़ हो गए थे, उसे देखते हुए कड़े क़दम उठाने की ही ज़रूरत थी. हालांकि ये कोई चिंताजनक बात नहीं है."

"क़रीब एक हज़ार मुठभेड़ की घटनाओं में तीस-पैंतीस अपराधियों का और दो-चार पुलिसकर्मियों का मारा जाना कोई ऐसा नहीं है कि पुलिस बेलगाम हो गई है. हां, फ़र्ज़ी एनकाउंटर ज़रूर चिंता बढ़ाने वाले हैं और पुलिस को उनसे हरसंभव बचने की कोशिश करनी चाहिए."

हालांकि प्रकाश सिंह इस बात को स्वीकार करते हैं कि जब एनकाउंटर की घटनाएं बढ़ेंगी तो उनमें फ़र्जी होने की आशंकाएं भी बढ़ेंगी लेकिन केवल मानवाधिकार के नाम पर अपराधियों को क़ानून का डर न हो, ये भी ठीक नहीं है.

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ओ पी सिंह

क्या एनकाउंटर से अपराधियों में डर है?

इसका एक पहलू ये भी है कि मुठभेड़ बड़ी संख्या में भले ही हो रहे हों लेकिन अपराधियों में पुलिस का डर शायद ही हो.

वजह ये कि आए दिन राज्य में कोई न कोई बड़ी आपराधिक घटनाएं हो ही रही हैं.

यही नहीं, पिछले दस महीने में ऐसे कई मौक़े आए जब पुलिस को ही हमले का शिकार होना पड़ा.

दो दिन पहले ही आगरा में कुछ लोगों ने एक दारोगा को बुरी तरह पीटकर घायल कर दिया.

लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार शरद प्रधान कहते हैं, "मुठभेड़ का डर दिखाकर अपराध में कमी कर लेंगे, ये सोचना भूल है. क़ानून में ही ऐसे प्रावधानों की कमी नहीं है जिनसे अपराधियों को डराया जाए. लेकिन उसके लिए इच्छाशक्ति और सरकार का डर दोनों ज़रूरी है. मुख्यमंत्री आए दिन अपराधियों को धमकी भले ही देते रहते हैं लेकिन उनकी धमकी शायद बेअसर साबित हो रही है."

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उत्तर प्रदेश का रिकॉर्ड

लखनऊ में लंबे समय से क्राइम कवर कर रहे एक पत्रकार कहते हैं कि आमतौर पर पुलिस एनकाउंटर का सहारा तब लेती है जब किसी दुर्दांत अपराधी को अंकुश में करने या फिर गिरफ़्तार करने के दरवाज़े लगभग बंद हो जाते हैं.

उनके मुताबिक साल 2000 के दशक में इसकी संख्या में तब बढ़ोत्तरी हुई जब बदमाशों को मुठभेड़ में मारने वाले पुलिसकर्मियों को 'आउट ऑफ टर्म' प्रमोशन का लालच दिखाया गया.

कई पुलिस कर्मियों को ये फ़ायदा मिला भी लेकिन बाद में हाईकोर्ट के हस्तक्षेप से 'आउट ऑफ टर्म' प्रमोशन पर रोक लग गई जिसके बाद से एनकाउंटर की रफ़्तार भी धीमी हो गई.

हालांकि एनकाउंटर के मामले में उत्तर प्रदेश का रिकॉर्ड पहले भी कुछ ऐसा ही रहा है.

आंकड़ों के मुताबिक देश में पिछले 12 साल में फर्जी एनकाउंटर की जितनी शिकायतें राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में पहुंचीं हैं उनमें एक तिहाई से ज़्यादा मामले यूपी पुलिस के ही खिलाफ थे.

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