नजरियाः क्या 2021 की जनगणना में गिनी जाएगी जाति?

  • 13 फरवरी 2018
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भारत में हर दस साल में जनगणना होती है. साल 2011 में आख़िरी जनगणना हुई थी और 2021 में अगली जनगणना होनी है.

2021 में होने वाली जनगणना की तैयारी की पहली बैठक पिछले महीने हुई है. इसकी अध्यक्षता केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने की.

इस बैठक में यह तय किया गया कि इस साल यानी 2018 में जनगणना से संबंधित कौन-कौन से काम पूरे कर लिए जाएंगे.

यानी 2021 में जनगणना कैसे होगी, यह इसी साल तय होना है. इसलिए यह उचित समय है जब 2021 की जनगणना पर राष्ट्रीय बहस शुरू हो.

भारत में जनगणना 1872 से हो रही है और यह सिलसिला कभी टूटा नहीं है. जनगणना का काम भारत के रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त का दफ़्तर करता है.

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जनगणना अधिनियम

यह दफ़्तर केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन काम करता है और इसका सारा ख़र्च भारत सरकार उठाती है.

भारत के आज़ाद होने के बाद जनगणना का काम साल 1948 के जनगणना अधिनियम के तहत होता है.

यह एक तय ढर्रे का काम है, जिसकी विधि और प्रक्रियाओं में बहुत कम बदलाव हुआ है. लगभग 140 साल से चली आ रही जनगणना में दो बड़े बदलाव हुए हैं.

एक, पहले जनगणना का काम देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग होता था और यह काम कई महीनों तक चलता था.

अब इसे हर दस साल पर फ़रवरी के महीने में पूरा कर लिया जाता है. दूसरा बड़ा बदलाव यह है कि 1872 से लेकर 1931 तक जनगणना में जाति गिनी गई.

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जनगणना के आंकड़ों का क्या महत्व है?

1941 में जाति गिनी गई, लेकिन दूसरे विश्वयुद्ध के कारण आंकड़े संकलित नहीं हो पाए.

आज़ादी के बाद सरकार ने तय किया कि जनगणना में अब जाति नहीं गिनी जाएगी. 1951 से लेकर 2011 तक की जनगणना में जाति नहीं गिनी गई.

देश के हर आदमी की सामाजिक, आर्थिक स्थिति का आकलन सिर्फ़ जनगणना में होता है.

वैसे तो इन जानकारियों के लिए सर्वेक्षण भी होते रहते हैं और इसके लिए भारत सरकार का नेशलन सैंपल सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) भी है.

लेकिन सर्वेक्षण में आबादी के एक छोटे हिस्से से जानकारियां ली जाती हैं. हर आदमी तक पहुंचने का काम तो जनगणना में ही होता है.

जनगणना के महत्व के बारे में जनगणना आयुक्त का कहना है, "भारत की आबादी की विविधता दस साल पर होने वाली जनगणना में ही उभरकर सामने आती है. भारत को समझने और इसका अध्ययन करने का यह एक महत्वपूर्ण ज़रिया है."

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वास्तविक स्थिति

जनगणना इस देश में नीतियां बनाने का प्रमुख आधार है. जनगणना से मिले आंकड़ों से देश की वास्तविक स्थिति सामने आती है.

इन आंकड़ों का सरकार के अलावा समाजशास्त्रियों, विचारकों, इतिहासकारों, राजनीतिशास्त्रियों आदि के लिए भी महत्व है.

इन आंकड़ों से ही पता चलता है कि देश में कुल कितने लोग हैं, किस आयु वर्ग के कितने लोग हैं, किस भाषा को बोलने वाले लोग कितने हैं, किस धर्म के कितने लोग है, लोग कितने शिक्षित हैं, देश में कितने पुरुष और कितनी औरतें हैं, कितने लोग विवाहित हैं और कितने अविवाहित, पिछले दस साल में कितने बच्चे पैदा हुए, देश में कितने तरह के रोजगार हैं और कितने लोग किस रोजगार में लगे हैं, किन लोगों ने दस साल में अपने रहने का ठिकाना बदल लिया है आदि.

2011 की जनगणना में ऐसे कुल 29 सवाल पूछे गए.

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क्यों नहीं पूछा गया जाति का सवाल?

जनगणना में धर्म की जानकारी मांगी जाती है. जबकि भारत में धर्म को लेकर बेशुमार हिंसा होती रही है.

जनगणना में भाषा का सवाल भी पूछा जाता है, जबकि भाषा को लेकर न सिर्फ भयानक दंगे हुए हैं, बल्कि यह राज्यों के बंटवारे की वजह भी बना है.

1872 के बाद से हर जनगणना में धर्म और भाषा के सवाल पूछे गए. लेकिन आजादी के बाद से जाति का सवाल पूछना बंद हो गया.

इसकी वजह यह बताई जाती है कि आजादी के बाद बनी सरकार की कल्पना यह थी कि अब भारत एक आधुनिक लोकतंत्र बन चुका है और जाति जैसी आदिम पहचान के आधार पर लोगों की गिनती करना उचित नहीं है.

तत्कालीन सरकार ने शायद यह सोचा होगा कि जाति की गिनती नहीं होने से जाति और जातिवाद ख़त्म हो जाएगा.

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भारतीय की प्राथमिक पहचान

हालांकि ऐसा न होना था, न हुआ. जाति की गिनती न होने के बावजूद जातियां कायम रहीं.

इसकी सबसे बड़ी गवाही अख़बारों के शादी के कॉलम और मेट्रोमोनियल साइट्स हैं, जहां करोड़ों लोग अपनी जाति में जीवनसाथी की तलाश कर रहे हैं.

जाति संस्थाएं अपनी तमाम विकृतियों के साथ मौजूद हैं और अब भी एक भारतीय की प्राथमिक पहचान जाति के बिना शायद ही कभी पूरी होती है.

आधुनिक संस्थाओं, शहरों और कॉरपोरेट वातावरण में बेशक जाति के कुछ लक्षण छिप जाते हैं. जैसे कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट में सफर करने वाले छुआछुत नहीं मान सकते.

रेस्टोरेंट में जाति पूछकर खाना न तो खाया जा सकता है और न ही परोसा जा सकता है.

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आधुनिकता का मतलब

रोजगार के मामले में भी जाति की सीमाएं कमजोर हुई हैं और तमाम जातियां तमाम तरह के काम कर रही हैं. शिक्षा भी अब कुछ जातियों के दायरे से बाहर निकल चुकी है.

लेकिन इस आधुनिकता के साथ परंपरा भी कदमताल कर रही है. इस मायने में भारतीय आधुनिकता अपने आप में एक वर्णसंकर या बास्टर्ड श्रेणी में रखे जाने के योग्य है.

यहां आधुनिकता का मतलब परंपरा से मुक्ति नहीं बल्कि परंपरा के साथ चलना है.

जनगणना के संदर्भ में देखा जाए, तो आजादी के बाद बदला सिर्फ इतना कि जातियां कायम रहीं, लेकिन जाति की गिनती बंद हो गई.

ऐसा भी नहीं है कि जनगणना में जाति का सवाल बिल्कुल नहीं पूछा जाता. हर जनगणना में एक सवाल यह जरूर पूछा जाता है कि क्या आप अनुसूचित जाति से हैं.

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मंडल कमीशन की रिपोर्ट

इसके अलावा यह भी पूछा जाता है कि आप इस कैटेगरी में किस जाति से हैं.

चूंकि संविधान में प्रावधान है कि अनुसूचित जाति को आबादी के अनुपात में राजनीतिक आरक्षण दिया जाएगा. इसलिए उनकी आबादी को जानना एक संवैधानिक जरूरत है.

यह सवाल एक बार फिर सामने आया जब यह तय करना था कि ओबीसी यानी अन्य पिछड़े वर्ग को कितना आरक्षण देना है.

दूसरे पिछड़ा वर्ग आयोग यानी मंडल कमीशन ने जब अपनी रिपोर्ट के लिए काम शुरू किया तो उसके पास जातियों के आंकड़े नहीं थे.

मंडल कमीशन ने मजबूरी में 1931 की जनगणना से काम चलाया और सिफारिश की कि भारत में जाति जनगणना कराई जाए.

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केंद्र और राज्य

मंडल कमीशन की रिपोर्ट 1991 में लागू की गई, लेकिन 2001 की जनगणना में जाति नहीं गिनी गई.

सुप्रीम कोर्ट कई बार कह चुका है कि आरक्षण के बारे में कोई भी फैसला आंकड़ों के बिना कैसे हो सकता है और सरकार को आंकड़ा लेकर आना चाहिए.

लेकिन आंकड़ा जुटाने का काम टलता रहा. भारत में केंद्र और राज्य सरकारें जाति को केंद्र में रखकर कई नीतियां बनाती हैं.

जैसे कि केंद्र सरकार ओबीसी फाइनेंस कमीशन चलाती है. इसके अलावा राज्यों को भी ओबीसी विकास के लिए फंड दिया जाता है.

लेकिन केंद्र सरकार तो क्या, देश में किसी को नहीं मालूम कि किस राज्य में कितने ओबीसी हैं.

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जाति की गिनती न होने का नुक़सान

इस वजह से केंद्र से ओबीसी विकास के लिए जाने वाला पैसा राज्य की कुल आबादी के अनुपात में भेजा जाता है.

यह एक अजीब स्थिति है. समस्या को जाने बगैर, उसे देखे बगैर, समस्या से लड़ने की कोशिश की जा रही है. ओबीसी इस देश की जनसंख्या का सबसे बड़ा समूह है.

मंडल कमीशन के मुताबिक इसकी आबादी 52% है. इतनी बड़ी आबादी के बारे में जानकारियां जुटाए बगैर, उनके विकास के लिए योजनाएं बनाना असंभव है.

केंद्र और राज्य सरकारें कई दशक से यह असंभव काम कर रही हैं. जाति के आंकड़े आने से जातिवाद बढ़ जाएगा, जैसे तर्क का कोई मतलब नहीं है.

क्योंकि दुनिया के तमाम विकसित देश अपनी आबादी के बारे में तमाम तरह के आंकड़े जुटाते हैं और उन आंकड़ों के आधार पर नीतियां बनाते हैं.

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भारतीय समाज की समस्या

अगर नस्ल की जनगणना से अमेरिका में नस्लवाद बढ़ने का खतरा नहीं है, अगर धर्म की गिनती से भारत में सांप्रदायिकता नहीं बढ़ती, तो जाति की गिनती से जातिवाद कैसे बढ़ेगा?

जाति भारतीय समाज की एक समस्या है और इस समस्या को न देखने से यह समस्या खत्म नहीं हो रही है.

बल्कि इस समस्या को तह तक देखने और वास्तविकता के आकलन के बाद शायद इससे लड़ने की कोई सुसंगत रणनीति बन सके.

इसलिए जरूरी है कि 2021 की जनगणना में जाति का कॉलम जोड़ा जाए और जाति के आंकड़े जुटाए जाएं.

इन आंकड़ों से जातिवाद से लड़ने में मदद मिलेगी.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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