वैलेंटाइन डे को भगत सिंह की सज़ा से जोड़ना कितना सही?

  • 14 फरवरी 2018
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बीते कई सालों से लगभग हर साल भारत में 14 फ़रवरी यानी वैलेंटाइन डे के दिन कुछ विवाद जन्म लेता है.

जहां प्रेमी जोड़े एक दूसरे से मिलते हैं और उपहार देते हैं, वहीं कई और इसे संस्कृति के नाम पर धब्बा बताते हैं और इस दिन सोशल मीडिया पर और सड़कों पर इसका विरोध करते हैं.

भारत में सोशल मीडिया पर कई लोग 14 फ़रवरी को 'शहीद दिवस' की तरह मनाने की बातें कर रहे हैं.

भारत चौधरी नाम के एक ट्विटर हैंडल ने लिखा, "आज अमर शहीद भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव को फाँसी की सज़ा सुनाई गई थी."

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रंजीत कुमार हरित्रा लिखते हैं, "करोड़ों भारतीय 14 फरवरी को वेलेंटाइन डे मनाते हैं, पर इसी दिन अमर शहीद भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव को लाहौर में फांसी की सजा सुनाई थी. यह बात हमारे युवा पीढ़ी व मीडिया चैनल भूल गए, इन शहीदों को शत शत नमन."

सचिन वर्मा ने लिखा "अगर विदेशी फूहड़ वैलेंटाइन डे मनाने से फ़ुर्सत मिली हो तो इसे हर भारतीय तक पहुँचाने की कोशिश करें."

सोशल मीडिया पर कुछ लोग 14 फरवरी को मातृ-पितृ दिवस से रूप में मनाने की बात कर रहे हैं. रवि प्रकाश ने फ़ेसबुक पर पोस्ट किया कि '14 फरवरी को वेलंटाइन डे नहीं बल्कि मातृ-पितृ पूजन दिवस मनाएं.'

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भगत सिंह को कब सुनाई गई थी सज़ा?

बीबीसी ने कोशिश ये जानने की कि सोशल मीडिया पर किया जा रहा दावा '14 फ़रवरी को भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव को फांसी की सज़ा सुनाई गई थी' कितना सही है.

एम एस गिल अपनी किताब 'ट्रायल्स दैट चेन्ज्ड हिस्ट्री: फ्रॉम सोक्रेट्स टू सद्दाम हुसैन' ने लिखा है, "स्पेशल ट्राइब्युनल कोर्ट ने 7 अक्तूबर 1930 को भारतीय दंड संहिता की धारा 121 और 302 और एक्सप्लोसिव सबस्टैंस ऐक्ट 1908 की धारा 4(बी) और 6(एफ़) के तहत बेहद ठंडी और संजीदा आवाज़ में ज़हर उगला और भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव की मौत की सज़ा का एलान किया."

वो लिखते हैं, "प्रेम दत्त को पांच साल की जेल की सज़ा सुनाई गई और कुंदन लाल को सात साल की सज़ा दी गई. मामले में शामिल अन्य आरोपियों को निर्वासित कर दिया गया."

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'हिस्ट्री ऑफ़ सिरसा टाउन'में जुगल किशोर गुप्ता ने लिखा है, "लाहौर षड्यंत्र मामले में 7 अक्तूबर 1930 को ट्राइब्युनल ने सज़ा का एलान किया. 18 फरवरी 1931 में सिरसा के लोगों ने एक बड़ी सभा का आयोजन किया जिसमें मूल चंद कडारिया ने भगत सिंह को याद करते हुए अपनी कविता सुनाई."

वो लिखते हैं, "इसके बाद हज़ारों की संख्या में लोगों ने एक मेमोरैंडम पर दस्तखत किया जिसे वाइसरॉय के पास भेजा जाना था. लोगों ने इसके ज़रिए सरकार से गुजारिश की कि भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव को माफी दी जाए. लेकिन इन अपीलों का ब्रितानी सरकार पर कोई असर नहीं पड़ा और इन तीनों को 23 मार्च 1931 को फांसी दे दी गई."

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'रिवोल्यूश्नरी एंड द ब्रिटिश राज' में श्रीराम बक्शी लिखते हैं. "14 फ़रवरी 1931 में पंडित मदन मोहन मालवीय ने वायसराय को टेलीग्राम किया और अपील की कि भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव को दी गई फांसी की सज़ा को उम्रक़ैद की सज़ा में बदल दिया जाए."

'हज डू यूटोपिया: हा द गदर मूवमेन्ट चार्टेड ग्लोबल रेडिकलिज़्म एंड एटेम्पटेड टू ओवरथ्रो द ब्रिटिश एंपायर' में माइया रामनाथ ने लिखा है कि 7 अक्तूबर 1930 को भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव को फांसी की सज़ा सुनाई गई थी.

यानी इन ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि सोशल मी़डिया पर भगत सिंह को सज़ा सुनाए जाने और वैलेंटाइन डे से जोड़कर देखने की जो बातें की जा रही हैं, उनका कोई तार्किक संबंध नहीं है.

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